शुक्रवार, 17 जून 2011

क़दमों तले दुनिया सारी


५-जून-११
छोटी बेटी के बेंगलोर जाने का दिन आ गया । घर से निकलते ही वो नम आँखों से इधर-उधर देख रही थी । भाई का अगले दिन इम्तिहान था , इसलिए एयरपोर्ट तक छोड़ने न आ सका , गाड़ी तक आया और एक दम पलट कर चला गया , जैसे आँखें मन की चुगली कर देंगीं ..इस बात से बच रहा हो । रास्ते में मैंने कहा , आज ये दूसरी चिड़िया भी पहली बार उड़ने जा रही है । बड़ी बेटी ने कहा ' और वो आपका चिड़ा ! , वो तो पंख उगने से पहले ही उड़ गया है , प्रीमैच्योर बेबी है न ' ( उसका इशारा बेटे की तरफ था , जो आधा सी.ए.आधा बी .कोंम.करके ही , इन्डसट्रिअल ट्रेनिंग में मुम्बई में अच्छी खासी सैलरी ले रहा है )। हम सब हँस पड़े । माहौल को हल्का करने की कोशिश जैसी लग रही थी ।
छोटी बेटी ने सुबह से कुछ खाया न था । चाकलेट मिल्क भी लिया तो दो घूँट भर कर रख दिया , कहा कि मन नहीं है । एयरपोर्ट पर उसके बोर्डिंग पास लेने तक ग्लास के पार से हम देखते खड़े रहे । जब मोबाइल पर अलविदा कहने लगे तो बेटी ने मुँह दूसरी तरफ कर के बात की , जैसे छलछलाती हुई आँखों को छिपा रही हो । सबकी जिन्दगी में ये दिन जरुर आता है , जब छात्र जीवन को , माँ-बाप के साथ को और न जाने कितनी यादों को अलविदा कहनी पड़ती है । ये जंक्शन कभी बड़ा सुहाना लगता है , फिर भी डर सा लगता है । ये भी लगता है कि हम क्यों बड़े हो गए ।


एक बार फिर जा रही हो , दूर तुम अपनों के साथ से
तन्हा चलना नहीं जिन्दगी का नाम
सितारे हिलने लगे
किस्मत के नज़ारे मिलने लगे
मिलती है जिन्दगी अपनी शर्तों पर
नर्म पड़ने लगा है खुदा , इशारे मिलने लगे


वो कुवैत की लड़की सा धूप में , स्टोल से चेहरे गर्दन को लपेटे तुम
प्यूमा की चप्पलें पहन हवाई उड़ान को तैयार तुम
नन्ही चिड़िया कब बड़ी हो गई
बाहें फैलाए हुए , बुलाते हुए आसमान लगे



वो मैंगो-शेक की दूकान पर मुझे ले जातीं हुईं तुम
वो बैग-पैक लिये मुझे घर की खरीद-दारी करातीं हुईं तुम
भाई से गुप-चुप बातें करतीं हुईं तुम
अपनी दीदी के लिये फ़्लैट ढूँढतीं हुईं तुम
और दीदी का नेट पर तुम्हारे लिये परदेस में आसरा तलाशना
किस किस को करें याद

याद आयेंगे जब जब गुजरे लम्हे
आँखें हो जायेंगी नम
मेरी बिटिया , गम नहीं करना
होता है सबके साथ यही
ये तो जंक्शन है नए पुराने का
वो खजाना है तुम्हारी यादों का
और ये है आगे चलने की डगर

घर लौटी तो याद आया
कान दर्द करते हैं तुम्हारे हवाई उड़ानों में
तय करने होंगे अब ऊंचाई के सफ़र ,
आगे है तुम्हारा सुनहरा भविष्य

और क़दमों तले दुनिया सारी
सजदे में खड़ी हैं दुनिया की न्यामतें
बारिश हो तुम पर मेहरबानियों की
रौशनी ही रौशनी से भरा ये जहान लगे 

तुम्हे अपने दम पर

रविवार, 12 जून 2011

खुला आसमान चाहिए



पन्द्रह मई २०११


एक मुट्ठी में गोटियों को शफल करके डिस्पर्स कर देगा खुदा ...यानि ये पच्चीस तीस दिन मिले हैं हमें न्यामत से , हम सब साथ हैं । बड़ी बेटी ने कहा कि हम सबको एक साथ जैसे मुट्ठी में ले कर बस अब डिस्पर्स कर देगा ऊपर वाला । एक बैंगलोर , एक मुम्बई , एक दिल्ली और हम नैनीताल में ...छोटी बेटी ऍम.ए.इकोनोमिक्स के एग्जाम दे चुकी है , बेंगलोर पहली पोस्टिंग मिली है , इस बीच एक महीने की छुट्टियाँ हैं ..बेटा भी मुम्बई से इन्डसट्रिअल ट्रेनिंग के दौरान बी कॉम ऑनर्स के इम्तिहान देने दिल्ली आया हुआ हैमेरे पति भी एक महीने के लिये डेप्युटेशन पर दिल्ली में हैं ...इस तरह हम सब इक्कठे हुए और अलग होंगे तो दिल्ली में बड़ी बेटी अकेली रह जायेगीपहले दिन ही उसने इस मिलन से परे होकर कुछ सूँघ लिया हैमुझे मालूम है , इक दिन उसे भी लेखनी चलानी है ...वरना वो इस गन्ध को शब्द दे पाती

मेरे बच्चों , संजों लें ये यादें
इक दिन ये उग आयेंगी
मन की मिट्टी में नज्मों की तरह
मुझे मालूम है , खुदा इक हाथ से लेता है तो
दूसरी मुट्ठी में न्यामत सी कोई रख देता है
आगे चलने को बहाने चाहियें
उम्मीद पे दुनिया कायम है
हम भी कोई अपवाद नहीं हैं
कोई सूरज है , कोई तारा है
आसमाँ पे चमका अपना भी सितारा है
मेरे घर के जुगनू बड़े हो गए हैं
इनकी रौशनी से आँखें चौंधियाने लगी हैं
मेरे घर का आँगन छोटा पड़ गया है
इन्हें अब खुला आसमान चाहिए

खुला आसमान चाहिए