बुधवार, 21 जून 2017

हर कोई अपनी-अपनी मनःस्थिति में जीता है

हम सभी लोग ज्यादातर अपनी अपनी परिस्थितियों के गुलाम हैं। ऐसा क्यों होता है कि कई बार किसी से बात करते हैं तो वो अचनाक ऐसी प्रतिक्रिया देता है जो हमारी आशा के विपरीत होती है। हमें हैरान कर देने वाले नतीजों का सामना करना पड़ता है। किसी के दिल में क्या चल रहा है , कोई नहीं जानता।


हमारी अपनी पूर्व-निर्धारित धारणाएँ , सँस्कार ,आस्थाएँ और विष्वास हमें चलाते हैं। हमने धोखे खाये हैं तो सारी दुनिया के लिये एक ही दृष्टिकोण बना लेते हैं। अचानक विस्फोट जैसी प्रतिक्रिया ये बताती है कि उसका मन विक्षोभ से भरा हुआ है , और ये किसी एक दिन की सोच का नतीजा नहीं होता। किसी के बारे में हम एक बार कोई राय कायम कर लेते हैं तो फिर टस से मस नहीं होते। जबकि हमारा अपना मन पल-पल बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदलते देर नहीं लगती , मगर हम पर कैसे-कैसे प्रभाव छोड़ कर जाती हैं।मकड़ी की तरह अपने ही ख्यालों के बुने हुए जाल में फँसना नहीं चाहिए। 

हमारी सकारात्मक भावनाएँ (इमोशन्स ) ख़ुशी , अपनत्व , प्रेरणा और प्रफुल्लता लाते हैं। नकरात्मक भावनाएँ द्वेष , झगड़ा , तुलना ,आत्म-हीनता का बोध हमेशा गुस्सा और उदासी लाते हैं। हर भावना एक केमिकल रिएक्शन करती है। हमारे शरीर में ऐसे केमिकल सिकरीट करती है जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करते हैं। नकारात्मक भावों के साथ सिर दर्द ,ब्लड-प्रेशर , डायबिटीज , मोटापा, गैस ,अल्सर , डिप्रेशन आदि तनाव जनित बीमारियाँ हो सकती हैं। कोई भी रोग हो नकारात्मकता के साथ तेजी से बढ़ता है। यदि भावनाएँ सकारात्मक हों तो बीमारी जल्दी ठीक हो जाती है। सकारात्मक सोच रखने वाले को बीमारी जल्दी पकड़ती ही नहीं। 

जब तक हम परिस्थितिओं , व्यक्तिओं , वस्तुओं के प्रति जैसी वो हैं , वैसा ही स्वीकार भाव नहीं रखते ; हम सहज हो ही नहीं सकते। जो सहज और सरल नहीं है वो खुश नहीं रह सकता क्योंकि वो बनावटी है ,उसका व्यवहार आडम्बर-पूर्ण है। सहजता ही तनाव-मुक्त रखती है। तनाव के कारण ही भूलने की बीमारी भी होने लगती है। मस्तिष्क में तनाव ने जगह घेर रखी है तो रचनात्मकता कैसे आयेगी।तनाव-रहित बुद्धि ही नये आइडियाज ,नई खोजें और क्रिएटिव काम कर सकती है। काम में परफेक्शन ला सकती है। ये वैसे ही है जैसे आपको यात्रा पर जाना हो और यदि आपकी हर वस्तु यथास्थान रखी है तो आप सूटकेस खोल कर अपनी वस्तुएँ उठा कर सूटकेस में रखेंगे और चल पड़ेंगे अपने गन्तव्य की ओर , कोई टेन्शन नहीं। मगर अगर सब गड्ड-मड्ड है तो आप घबरायेंगे। दरअसल ऐसा ही हमारे मस्तिष्क का हाल है , बहुत ज्यादा चीजें अपने-अपने खाने में नहीं हैं और हम घबरा रहे हैं। जो स्मृतियाँ आपको नकारात्मकता दे रही हैं  , उन्हें दिल से निकाल दीजिये , भूल जाइये , माफ़ कर दीजिये । लोगों की मजबूरियां होती हैं , बेबसी भी हो सकती है वो अपने अपने दृष्टिकोण से देखते हैं। उनकी भी कड़वी यादें हैं , वो भी भटके हुए हैं। उनके अपने सँस्कार  हैं। इसलिए अपने मन की डेस्क को साफ़-सुथरा रखें ,तभी मन शान्त रहेगा।खुद को अशान्त रखना बीमारियों को दावत देना है। 

जिसे तुम आज दुश्मन मान कर बैठे हो , वो कल तुम्हारा दोस्त भी हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे जो कल तुम्हारा दोस्त था आज दुश्मन है। स्वीकार भाव से विचारों का मतभेद मिटाया जा सकता है। इस बात पर भरोसा रखो कि आदमी का मन बदलने में देर नहीं लगती। ऐतबार के दरवाजे खुले रखो। ऐतबार ही मन की खुराक है। अपनी ज़ुबान से सुकून ही बाँटो।ज़िन्दगी अनमोल है। कभी भी किसी अनहोनी का सबब न बनो।  इस जन्म को ,अपने होने को सार्थक करें।     


गुरुवार, 25 मई 2017

क्या साथ चलने का बहाना एक नहीं

न साथ चलने के सौ बहाने 
साथ चलने का बहाना एक नहीं  

जब रिश्ते में दरारें पड़ने लगतीं हैं तो ऐसा ही होता है। प्यार का पौधा भी पानी माँगता है। वही रिश्ता जो सबसे हसीन था वही कब चुभने लगता है कि नश्तर बन जाता है , पता ही नहीं चलता। वही साथी जिसके बिना रहा नहीं जाता था आज साथ रहा नहीं जाता ; सौ कमियाँ दिखती हैं। कितने ही कारण परिस्थिति-जन्य होते हैं जिनमें हम अपनी अज्ञानता से बढ़ोत्तरी कर लेते हैं। बात उतनी बड़ी नहीं होती, जितनी बहस से बड़ी हो जाती है , और फिर शब्द पकड़ लिए जाते हैं। किसी ने कुछ कहा और हम उसका एक्स-रे निकाल लेते हैं। हर बात में उसका कोई उद्देश्य ढूँढ लेते हैं , और फिर शुरू हो जाते हैं उसे गलत सिद्ध करने में। 

घर जब टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं , हम कितनी ही ज़िन्दगियों के साथ नाइन्साफी कर बैठते हैं। सिर्फ साथी नहीं , हमसे जुड़े सारे रिश्ते उसे भोगते हैं। अपनी आज़ादी ,अपनी ज़िन्दगी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने से कुछ नहीं होता।  अगर आप अपना सँसार ही न सँभाल पाये तो आपके पास कुछ भी नहीं बचता। आप अपने ही दुश्मन बने हुए हैं ,ये वक़्त निकल जाने के बाद समझ आएगा। आप किसी भूचाल से गुजर रहे हैं , ये कहाँ जाकर थमेगा ,कह नहीं सकते। शादी के बाद बच्चे भी हैं और आप अलग होना चाहते हैं तो जरा सोचें कि उस बच्चे की क्या गलती थी जो आपके यहाँ पैदा हो गया। बचपन की हर बात गम की या ख़ुशी की , ताउम्र अपनी छाप छोड़ती है ; वही व्यक्तित्व बन कर उभरती है। एक फूल को आपने रेगिस्तान में किसके सहारे छोड़ दिया। जिसे एक समृद्ध बचपन देना था ,  उसके सारे हक़ ,अधिकार छीन लिये। बच्चा हमेशा अपने पेरेन्ट्स के साथ सुरक्षित महसूस करता है। कुण्ठित व्यक्तित्व अपने परिवार को क्या देगा , समाज को क्या देगा। वैसे भी अतीत सारी उम्र हावी रहेगा ,आप चाह कर भी ये सब भुला न पायेंगे। हम अपनी ज़िन्दगी के खुदा हो सकते हैं , बशर्ते परिस्थितियों का शिकार न बनें ,अपनी बागडोर अपने हाथ रखें।  

हम सब सॉरी बोलने से बचते हैं। छोटी-छोटी बातों में तो एटिकेट्स निभाते हैं , और रिश्ते बचाने में ' सॉरी ' बोलने से बचने के लिये सौ बहाने खोज लेते हैं।और हाँ , अब पहली-पहली सी कोई बात नहीं होगी। उम्मीदें और ईगो की वजह से ही क्लैश ( टकराव ) होते हैं। ईगो को ' न ' सुनना बिलकुल पसंद नहीं होता।जिसे हम स्वाभिमान समझते हैं , वो ईगो होती है।  ये सिर्फ तब जायेगी जब हम बड़ी ईगो से जुड़ेगें  ,साथी भी अपना आप ही है , अपने जीवन का हिस्सा। ऐसा समझेंगे तभी प्यार कर सकेंगे , माफ़ कर सकेंगे। क्या उस मीठे वक़्त की मीठी यादों का एक भीबहाना ऐसा नहीं है जो आपको साथ चला सके ? दूर जाने के सौ बहाने करने वाले , क्या साथ चलने का एक भी बहाना नहीं बचा है  ? 

एक खता पर ज़िन्दगी वारी 
होते न लम्हें इतने भारी 
हार जाओगे नसीब से लड़ते हुए 
ज़िन्दगी तुम्हें बख़्शेगी नहीं 
माज़ी तुम्हें कभी चैन से सोने नहीं देगा 
और तुम कितने सहिष्णु हो 
ये तय होगा ,जब सहेज रखोगे रिश्तों को 

किसी की भी राह में गुलाब नहीं बिछे होते , आपको अपनी राह खुद बनानी होती है। कई बार दोनों पक्ष एक पहल का इन्तिज़ार करते रहते हैं। एक पहल और बाँध टूट सकता है। कोई छोटा नहीं होता , इसे तो समझदारी कहेंगे। जो भरा होता है वही छलकता है। ज़िन्दगी को गले लगाना सीखें।  प्रगति कभी जिन्दगी से बड़ी नहीं हो सकती। संभालें अपने सफर को , अपने हालात को , जो आपको मिला है सहेजें उसको।

इश्क की आग से सबेरा कर लेना
ये सूरज सी आब रखता है
इसकी तपिश से है दुनिया का चलन
इस पर भरोसा कर लेना
ख्वाब सी है जमीन ,ख्वाब सा है आसमान
रेशमी से ख्वाब बुन लेना
चलना वैसे भी है,चाहत का मोड़ देकर
इक हसीन मंज़र देना

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

अपनत्व से चमकती निगाहें

सफर में साथी , समां और सामाँ सब तय है , सब वही रहेगा ; अब ये समन्दर की मर्जी है के वो भँवर में तुझे गर्क कर दे या ज़िन्दगी के किनारों पर ला पटके।  इस सारी छटपटाहट को अर्थपूर्ण बना। किस ओर तेरी मन्जिल और किधर जा रहा है तू। ऐ नादान मुसाफिर , अनमोल तेरा जीवन , कौड़ियों के भाव जा रहा है। इतना भी न कमतर समझना राहगीरों को , जगमगाता हुआ जीवन तेरे साथ चल रहा है। कौन जाने किस-किस पर है क्या-क्या गुज़री ; आधी-अधूरी धूप छाँव में ,किस के हिस्से क्या-क्या आया। मुंदी-मुंदी पलकों में सपने भी थे , बड़े अपने भी थे , ये और बात है मुट्ठी से वक़्त फिसलता ही रहा , सपनों की मानिन्द। 

अपनत्व से चमकती निगाहें माहौल में जान फूँक देतीं हैं। दिलासे ,बहाने सब छलावे से लगते हैं। किसी की पीड़ा कोई नहीं बाँट सकता। हाथ पकड़ कर चलता हुआ भी कितना सगा हुआ है।  मुसीबत के वक़्त देख लो क्या क्या टूटा हुआ है। बात इतनी सी है कि वक़्त चाहे जितना मिटा डाले ;जीने के लिये बहाना तो चाहिये।  अँगारों पे नींद किसे आती है। मुस्करा कर कोई जो साथ चले , पल भर में ज़िन्दगी सँवर जाती है। 

बुधवार, 25 मार्च 2015

अपनत्व का दायरा बड़ा कीजिये

समाज में अपराधों का बढ़ता ग्राफ लगातार ये कह रहा है कि आदमी मन के तल पर बीमार है। उपचार भी मन के तल पर ही करना होगा। प्राण-शक्ति की कमी या तो उसे भरमा कर , भटका कर अपराध की दुनिया में सुकून या कहो मजा तलाशने धकेल देती है या अवसाद की तरफ धकेल देती है। लगातार बदलती हुई इस दुनिया में मन भी लगातार ऊपर नीचे हुए जा रहा है , इसीलिये बेचैन है , उद्विग्न है , असहज है। कुछ है जो इस सब को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है , कभी लड़ना चाहता है , कभी सामना करना चाहता है तो कभी भागना चाहता है।  गहरी परतों में कुछ ऐसा भी है जो बदला नहीं है , सब कुछ देख रहा है पर उसका जोर कोई नहीं चलता।

सुखी और सन्तुलित मन का मूल-मन्त्र है आत्मीयता का दायरा बढ़ा कर रखना। जैसा भाव होगा वैसा ही मन होगा और वैसी ही मानसिक स्थिति बन जायेगी। अपनत्व दिखाने की चीज नहीं है , ये खुद ही आँखों से टपक पड़ेगा।  आपको किसी के भी आगे बिछने की जरुरत नहीं है , ना ही पैसा-धेला खर्चने की जरुरत है ; बस उसे अपना समझना है।  अपना मानते ही आप उसके साथ नाइन्साफ़ी नहीं कर पायेंगे।  जिस तरह आप अपने साथ सहज-सरल हैं  वैसे ही रहना है। कहा जाता है कि आप बिना प्यार के भी किसी को कुछ भी दे सकते हैं मगर जिसे आप प्यार करते हैं उसे बिना कुछ दिये रह नहीं पाते हैं । प्यार का रास्ता इकतरफा होता है , हमें सिर्फ अपना पता होना चाहिये कि हमें क्या करना है।  अपनत्व ही वो शय है जो हम अपने लिये दूसरों से खोजते फिर रहे हैं और हमें नहीं मिलती।  इस दुर्लभ चीज का अभ्यास अगर हम सुलभ कर लेते हैं तो एक दूसरी ही बत्ती जल उठेगी ; जिसके प्रकाश में हम सारी दुनिया को एक छत के नीचे एक समग्र दृष्टिकोण से देख सकेंगे।

सबको अपना मान चलने वाला व्यक्ति , समाज सभ्यता नैतिकता के नियम नहीं तोड़ता। हालाँकि एक बारीक लाइन ही होती है मन को इधर या उधर ले जाने वाली , फिर भी मन अगर सजग है तो ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर भी सन्तुलित रहने वाली बाउण्ड्री लाइन क्रॉस नहीं करेगा। ये बिल्कुल तीसरी आँख खुलने जैसा है। जितने भी पहुँचे हुये पीर पैगम्बर हुये हैं सबके पास ये जादू की छड़ी थी।  अपनत्व का ये भाव गहरा विष्वास और आस्था ले आता है और व्यक्ति की प्राण-शक्ति असीम होने लगती है। प्राण-शक्ति बढ़ते ही मन तनाव रहित हो जाता है। रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ जाती है।  उस चेतना से जब तक परिचय नहीं हो जाता , हम सन्तुलित रह ही नहीं सकते। वही चेतनता हमें नश्वरता के बीच भी स्थिर और अटूट रख सकती है।

जब भी मन विध्वंस की तरफ जाता है या भागना चाहता है ,रुक कर जरा सोचें कि हालात बदलते रहेंगे तो क्या आप झूले की तरह हिलते हुये अपने आपको इतना कष्ट देते रहेंगे। सोचें कि रोज ऐसा नहीं होगा , बुरा आपके अहम को लगता है , वो भी इसलिये क्योंकि आप सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं , कारणों को नहीं देख पाते। अवसाद है तो क्यूँ है , मन के कपड़े बदलवा दीजिये , इसे कोई और सोच दीजिये , रोज वही कमीज थोड़ी न पहनेंगे। अपनी छोटी सोच से ऊपर उठें । अपनी बीमार सोच को स्वस्थ्य करें। अपनत्व का दायरा बड़ा कीजिये। ये काम हमारे अध्यापक लोग , बच्चों के माँ-बाप बखूबी कर सकते हैं ; ताकि हमारी नई फसलें यानि हमारे बच्चे इसको जीवन में उतार सकें ; मगर शिक्षा देने से पहले ये उन्हें अपने जीवन में उतारना होगा। तभी शायद हमारे हालात बेहतर हो सकेंगे। 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

सँस्कार-शीलता

दिल दिमाग बुद्धि के लिये अंग्रेजी के शब्द-कोष में शब्द हैं , मगर मन के लिये कोई शब्द नहीं है।  इसी तरह सँस्कार व सँस्कार-शीलता के लिये के लिये  भी अंग्रेजी में कोई सटीक शब्द नहीं है।  हर भाषा की अपनी विशेषता होती है , बात कहने का अपना अन्दाज़ होता है ;दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय अनुवादक को विशेष ख्याल रखना होता है कि वो कही गई बात का हू-ब-हू चित्रण सटीक शब्दों के माध्यम से कर सके। 

सँस्कार मायने आदत....... सँस्कार-शीलता को अच्छी आदतों व इन्सानियत से जुड़ा माना जाता है। अंग्रेजियत को बढ़ावा देते आज के सभ्य समाज में सँस्कार-शीलता पुरानी व आउट-डेटेड चीज हो गई है , जिसे हर कोई जल्द से जल्द घर से बाहर बुहार देना चाहता है।  हर धर्म ने हमें एक ही चीज सिखाई , हालांकि आदमी बाहरी आडंबरों में उलझ कर धर्म के नाम पर भी आपस में लड़ लेता है।  कहते हैं दूसरा धर्म अपनाने से अच्छा होता है कि अपना धर्म निबाहें , मानें , जो हमें जन्म से मिला है।ऐसा इसलिये भी कहते हैं कि जो बात हमारे बचपन से चली आ रही हो या हमने तब से सीखी हो वो हम पर .... हमारे अवचेतन पर ताउम्र प्रभावी रहती है। उसे समझना आसान होता है ,अनुसरण करना भी आसान होता है। इसका असर पूरी उम्र रहता है और इस तरह आस्था पक्की होती है। हर धर्म के किस्से-कहानियाँ अलग-अलग होते हैं मगर इशारा या सार एक ही होता है।  एक खुदा और एक ही आधार , इन्सानियत और आत्म-उन्नति।  

धर्म की जरुरत हमें उस वक़्त पड़ती है जब सँसार की ठोकरें या नश्वरता हमें डाँवाडोल कर देती है।  आह कोई चीज , कोई बात हमें इस कष्ट से निकाल ले। धर्म पंगु नहीं बनाता वरन आधार देता है।  सँस्कार-शीलता , in long term pays .,कोई भी विचार ,कोई भी भाव खाली नहीं जाता , हम तक वापस लौट कर आता है।   रिश्तों की गरिमा निभाना , इंसानियत कोई यूँ ही नहीं सीख जाता। सँस्कार-शीलता झाड़ू से बाहर बुहारने वाली चीज नहीं होनी चाहिये ,जिस तरह घर में एन्टीक पीस सजाये जाते हैं ,उसी तरह सँस्कार-शीलता हमारे व्यक्तित्व में सजाने लायक एन्टीक पीस होना चाहिये जिसे दुर्लभ होने पर भी हमने सुलभ कर लिया हो।  भले ही उसके लिये हमें कितने ही महँगे सौदे करने पड़े हों , सार्थक हैं।  

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

जितनी ज्यादा नकारात्मकता ,उतनी ज्यादा सकरात्मकता

क़ैद में है बुलबुल , सैय्याद मुस्कुराये 
फँसी है जान पिंजरे में , हाय कोई तो बचाये 

कोई तो हाथ-पैर छोड़ कर दुबक कर बैठ जाता है और कोई सारी रात टुक-टुक कर पिंजरे की तारों को या हाथ आई हुई लकड़ी की सतह या कपड़े को सारी रात कुतर-कुतर कर काटता रहता है ;जिस रोटी के टुकड़े के लिये वो इस पिंजरे में फँसा था , वो अब यूँ ही लटका मुँह चिढ़ाता हुआ नजर आता है।  जाहिर है अब चूहे की सारी कवायदें इस मुसीबत से स्वतन्त्र होने के लिये हैं।  ठीक ऐसा ही तो आदमी का हाल है।  कोई तो मुश्किलों से हार मान कर हथियार डाल देता है और कोई सारी ताकत उससे लड़ने में लगा देता है।  जितनी ज्यादा नकारात्मकता हो उतने ज्यादा सकारात्मक बनो , तभी नकारात्मकता अपना असर खो देगी।  ये सच है कि मन शरीर से भी ज्यादा शक्तिवान है और मन से भी ज्यादा शक्ति बुद्धि के पास है।  बुद्धि यानि विवेक , विवेक-पूर्ण मन क्या नहीं कर सकता , बाहरी उपद्रव हमारे मन का सन्तुलन भंग नहीं कर सकते , इतनी शक्ति हमारे अन्दर ही विद्यमान है।  

अगर जीवन में संघर्ष नहीं होगा तो यकीन मानिये विकास का कार्य भी रुक जायेगा। ......फ्रेडरिक डकलस 

यदि आप विफल हो रहे हों , तो समझिये कि सफलता के बीज बोने का सर्वश्रेष्ठ समय आ गया है...... परमहँस योगानंद 

दबाव और चुनौतियाँ आगे बढ़ने के अवसर की तरह होते हैं।  इन्हें रूकावट मानने की भूल न करें।... कोबे ब्रायंट 

बहुत सारे तरीके हैं मन को समझाने के , मेरे साथ कुछ भी नया नहीं हुआ है , Nothing is new under the sun.असफलताएँ ही आदमी को माँजती हैं।  बेशक तुम्हारी उमंगें टुकड़ा-टुकड़ा हो जायें , जीने के सारे मक्सद खो जायें , खुद को चुनौती दें कि मैं अन्दर से नहीं हिलूँगा। ये मुझ पर है कि अपने हाथों की लकीरों में मैं कौन सा रँग भरता हूँ। मुझे तो खुश होना चाहिये कि तनाव मेरी बर्दाश्त के अन्दर ही है। ये अनुभव बहुत कुछ सिखा के जायेगा। अपनी कामनाओं की नकेल अपने हाथ रखें।  ज़िन्दगी का उद्देश्य शान्ति प्राप्त करना है , पैसे या दुख में अटकना नहीं।  इसीलिये हमें अपने कर्तव्य प्रसन्नता-पूर्वक निभाने चाहिये , ये पृथ्वी स्वर्ग नजर आयेगी। 

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

विष्वास करना कला है , साथ ही विज्ञानं भी...

बड़ी कोशिशों से पासपोर्ट रिन्यू करवाने के लिए अपोइन्टमेंट मिला था। सारी औपचारिकताएँ पूरी हुईं तो एक एफ़िडेबिट बनवाने की क्वैरी निकल ही आई।  टीना काउन्टर से एफ़िडेबिट कहाँ से और कैसे बनेगा पूछ कर जैसे ही मुड़ी , ऑफिसर पास ही खड़ी दूसरी लड़की के लिए कह रहा था कि इन मैडम को भी एफ़िडेबिट बनवाना है। जिसे सुनकर वो लड़की मायूस हो गयी थी ,कि अब फिर लटक गया , दुबारा से अपोइन्टमेंट लेना पड़ेगा।  टीना ने उसका उतरा चेहरा देख कर बात करने की पहल की। कहा " टेन्शन मत लो ,मुझे भी बनवाना है , मैं यहाँ नई हूँ , चलो दोनों साथ चलते हैं ,एक ऑटो करते हैं , इससे पहले कि ऑफिस बन्द होने का वक्त हो जाए ? जल्दी करते हैं। " खैर दोनों जल्दी-जल्दी काम करवा कर लाये। अब इस ऑफिस में आखिरी काउन्टर पर दो हजार रूपये देने थे।  रूबी ने पैसे गिनने शुरू किये , अरे ये क्या १९०० रूपये यानि १०० रूपये कम.... अब क्या करे ,यहाँ तो कोई उसे जानता भी न था।  और आसपास कहीं A.T.M.भी नहीं था। एक बार फिर उसका मुहँ उतर गया।  टीना ने दूर से उसे पशो-पेश में देखा , पास जा कर पूछा कि क्या बात है।  टीना को १०० रूपये का नोट निकाल कर रूबी को देने में देर नहीं लगी।  रूबी का काम हो गया और वो रसीद ले कर बाहर चली गई।  टीना अभी क्लीयरेंस का इन्तज़ार कर रही थी , सोच रही थी कि सौ रूपये तो यूँ ही खर्च हो जाते हैं , कितना तो हम अपने खाने-पीने पर मौज-मस्ती पर खर्च करते हैं ,कपड़ों पर न जाने कितना प्रॉफिट दुकानदार हमसे ऐंठते हैं।  रूबी को सिर्फ सौ रूपये की वजह से वो सारी औपचारिकताएँ दुबारा करनी पड़तीं।  पैसे वापिस आयेँ या न आयेँ ,क्या फर्क पड़ता है।  छह बजते न बजते टीना का काम भी हो चुका था। जैसे ही वो ऑफिस से बाहर निकली , रूबी उसका इन्तज़ार कर रही थी , रूबी दोनों बाहें बढ़ा कर उसके गले लगी। उसके दिल की नमी उसकी आँखों से ज़ाहिर हो रही थी।  उसने बताया कि तीन महीने पहले ही उसकी शादी हुई है और उसका नौशा दुबई में उसका इन्तज़ार कर रहा है।  पासपोर्ट बनने के बाद ही वीज़ा की औपचारिकताएँ पूरी हो सकेंगी।  उस वक्त सौ रूपये की कमी से काम रुक जाना था।  दोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर एक्सचेंज किये।  टीना को रात की ट्रेन से अपने शहर वापिस जाना था। अब उसे अपना काम पूरा होने के साथ-साथ रूबी के काम पूरा करने में थोड़ी सी मदद-गार बन पाने की भी ख़ुशी थी।  

विष्वास करना एक कला है।  हम अपने आपको किस तरह समझाते हैं कि आँखें खुली रखते हुए हमें दूसरे पर विष्वास करना है।बिना ऐतबार के आप दो कदम भी नहीं चल सकते। ये दुनिया आपको काँटों की बाड़ी ही नजर आयेगी।  लोगों की आँखों में सन्देह और अविष्वास ही तैरता नजर आयेगा। काँटों पर चल कर भी आपको फूल उगाने हैं।  विष्वास ही वो शय है जो हर विपरीत परिस्थिति में भी फल-फूल सकती है , आश्चर्य जनक नतीजे ला कर असम्भव को सम्भव कर सकती है। सभी लोग अगर स्वार्थी हो जायेंगे तो सामाजिकता के सारे दावे खोखले साबित हो जायेंगे। किसी की भी आँखें अविष्वास को बड़ी आसानी से पढ़ लेती हैं।  हमें अपने मन को समझाने का आर्ट आना चाहिए ताकि हम थोड़े बहुत नुक्सान पर भी किसी बड़ी चीज को कमा सकें। 

हम इसे साइन्स इस लिए कह सकते हैं कि साइन्स तो प्रयोग का नाम है। विष्वास का प्रयोग कर के देखें ,अपना मन ठण्डा ,रिश्तों में प्रगाढ़ता और अपने आस पास खुशिओं का वातावरण इसी का नतीजा है। सहजता , सरलता ,सरसता इसी का नाम है।  हाँ , सजगता अपने आप आ जाएगी। दुनिया चाहे इसे भावनात्मक बेवकूफी कहे मगर मेरी नजर में इसे भावनात्मक समझदारी या अक्लमन्दी कहा जाना चाहिये। 

बेशक आदमी ही आदमी की काट करता है और उसका दिमाग इस राह पर इतनी तेज चलता है कि वो हर मुमकिन तरीके से दूसरे को छलता नजर आता है मगर ....
वो बन सकता था खुदा 
अपनी कीमत उसने खुद ही कमतर आँक ली होगी ....