शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

सँस्कार-शीलता

दिल दिमाग बुद्धि के लिये अंग्रेजी के शब्द-कोष में शब्द हैं , मगर मन के लिये कोई शब्द नहीं है।  इसी तरह सँस्कार व सँस्कार-शीलता के लिये के लिये  भी अंग्रेजी में कोई सटीक शब्द नहीं है।  हर भाषा की अपनी विशेषता होती है , बात कहने का अपना अन्दाज़ होता है ;दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय अनुवादक को विशेष ख्याल रखना होता है कि वो कही गई बात का हू-ब-हू चित्रण सटीक शब्दों के माध्यम से कर सके। 

सँस्कार मायने आदत....... सँस्कार-शीलता को अच्छी आदतों व इन्सानियत से जुड़ा माना जाता है। अंग्रेजियत को बढ़ावा देते आज के सभ्य समाज में सँस्कार-शीलता पुरानी व आउट-डेटेड चीज हो गई है , जिसे हर कोई जल्द से जल्द घर से बाहर बुहार देना चाहता है।  हर धर्म ने हमें एक ही चीज सिखाई , हालांकि आदमी बाहरी आडंबरों में उलझ कर धर्म के नाम पर भी आपस में लड़ लेता है।  कहते हैं दूसरा धर्म अपनाने से अच्छा होता है कि अपना धर्म निबाहें , मानें , जो हमें जन्म से मिला है।ऐसा इसलिये भी कहते हैं कि जो बात हमारे बचपन से चली आ रही हो या हमने तब से सीखी हो वो हम पर .... हमारे अवचेतन पर ताउम्र प्रभावी रहती है। उसे समझना आसान होता है ,अनुसरण करना भी आसान होता है। इसका असर पूरी उम्र रहता है और इस तरह आस्था पक्की होती है। हर धर्म के किस्से-कहानियाँ अलग-अलग होते हैं मगर इशारा या सार एक ही होता है।  एक खुदा और एक ही आधार , इन्सानियत और आत्म-उन्नति।  

धर्म की जरुरत हमें उस वक़्त पड़ती है जब सँसार की ठोकरें या नश्वरता हमें डाँवाडोल कर देती है।  आह कोई चीज , कोई बात हमें इस कष्ट से निकाल ले। धर्म पंगु नहीं बनाता वरन आधार देता है।  सँस्कार-शीलता , in long term pays .,कोई भी विचार ,कोई भी भाव खाली नहीं जाता , हम तक वापस लौट कर आता है।   रिश्तों की गरिमा निभाना , इंसानियत कोई यूँ ही नहीं सीख जाता। सँस्कार-शीलता झाड़ू से बाहर बुहारने वाली चीज नहीं होनी चाहिये ,जिस तरह घर में एन्टीक पीस सजाये जाते हैं ,उसी तरह सँस्कार-शीलता हमारे व्यक्तित्व में सजाने लायक एन्टीक पीस होना चाहिये जिसे दुर्लभ होने पर भी हमने सुलभ कर लिया हो।  भले ही उसके लिये हमें कितने ही महँगे सौदे करने पड़े हों , सार्थक हैं।