गुरुवार, 10 जनवरी 2013

संवेदनाएँ जगा के देख ...

उसने अपनी माँ से पूछा कि " माँ , हमारे रिश्तेदारों को तो इस बारे में पता नहीं  चला है ?" 
उसे क्या पता कि कितने प्रदर्शन , धरने , मौन सभाएँ व कैंडल-मार्च उसके लिए किये गये हैं  अखबारों में , टेलीविजन , नेट सारी दुनिया की ख़बरों में है वो  उसकी वेदना सारे देश की वेदना है । नारी ही नहीं पुरुष वर्ग भी आहत है , ऐसा किसी की भी बेटी या बहन के साथ भी हो सकता था , नारी उपभोग की वस्तु नहीं है । पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे सुरक्षित माध्यम में भी नारी असुरक्षित है । संवेदना की ऐसी लहर उठी कि सारा देश सड़कों पर आ गया  जिससे सरकार को  सख्त कदम उठाने के बारे में सोचने के लिए विवश होना पड़ा 

माँ अपनी बेटी से क्या कहे ...कि  हाय मेरी बेटी ...दोष तेरा तो कुछ भी नहीं था ...सांत्वना भी नहीं दे सकती कि कहीं उन शब्दों से तेरा हौसला कम न हो जाए ..माली फूलों की सँभाल करता है ...ये दिन देखने के लिए नहीं ....रौंदा पड़ा है गुलशन ...मूक हो गये हैं शब्द ...भारी हो गये हैं कदम ...मगर तेरे लिए चलना है ...कलेजे का टुकड़ा है तू ...गर तू हिफाज़त से है ...तभी मुझे चैन है 

इतना दर्दनाक हादसा निर्भया के साथ हुआ , 'निर्भया ' नाम उसे किसी चैनल ने दिया था  हमारे यहाँ तो ऐसे किसी हादसे के साथ नाम जुड़ते ही , आम तौर पर लोग उसका जीना ही मुश्किल कर देते हैं । हादसे से उबरने में ही उसे कितनी ताकत लगानी पड़ती है , फिर दुनिया का उसे नजरों से चीरना , उसके तन मन का पोस्ट-मार्टम कर देता है 

इसी वजह से कई मामलों की रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं कराई जाती कि इज्जत बची रहे । दूसरी वजह लम्बी न्याय-प्रक्रिया है , अपराधी बच निकलते हैं , फिर पहले से भी ज्यादा जुल्म ढाते हैं । वकीलों की तगड़ी फीस , पुलिस-वालों की कड़ी पूछताछ भी रिपोर्ट दर्ज न कराने की वजह बनती है । ये ठीक है कि बेगुनाह को दण्ड नहीं मिलना चाहिए ...मगर जब सुबूत , साक्ष्य और परिणाम चीख-चीख कर कह रहे हों कि अपराधी गुनाहगार है तो वो माफी का हकदार नहीं है । 

महज़ हाड़-माँस का पुतला नहीं थी वो 
तेरी तरह ही इन्सान थी 
हो सकती थी वो तेरी बेटी या बहन भी 
रिश्तों की लाज रखता है , संवेदनाएँ जगा के देख 
चुभ जाती है सुई भी , तो दर्द होता है 
ये कैसे वार हैं नासूर से , ज़िन्दगी भर को दे दिए 
सोयेगा क्या चैन से किसी पल , किसी घड़ी भी 
हाय , मेरे समाज में नारी का मान क्या 
करवा-चौथ , वट-सावित्री के व्रतों का भान क्या 
गिर गये हैं मूल्य सभी , खो गई ख़ुशी कहीं 
बीमार हो गये हैं हम , अपने कारनामे गिना के देख 
बनता है तू शिकारी सदा , 
कभी शिकार की आँख से देख 
संवेदनाएँ जगा के देख ...

9 टिप्‍पणियां:

  1. सच जब अपने पर गुजरती हैं तब पता चलता है दर्द का ....
    गहरे संवेदना से भरी प्रस्तुति हेतु आभार !

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  2. अमन की आशा या अमन का तमाशा - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. संवेदना को झकझोरती रचना

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  4. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
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  5. वाह!
    आपकी यह पोस्ट कल दिनांक 21-01-2013 के चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  6. लाजबाब संवेदनशील रचना ...

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