शनिवार, 7 अगस्त 2010

उँगली छुड़ा लें


' मेरे गीत लम्मे ने या गमाँ दी रात लम्मी ऐ
न मेरे गीत मुकदे ने न भैड़ी रात मुकदी ऐ '
मेरे गीत लम्बे हैं या ग़मों की रात लम्बी है
न मेरे गीत चुकते हैं न पगली रात चुकती है


रात ने जैसे गीतों का आधार ले लिया होकौन जाने ये ग़मों की रात कितनी लम्बी होती हैशिशु को चलने के लिए ऊँगली पकड़ चलना सिखाया जाता है पर जैसे ही उसके अपने क़दमों में दम जाता है फिर धीरे से उँगली छुड़ा ली जाती है यानि अब आधार उसके अपने दम का हैऐसे ही हमने ये आधार पकड़ तो लिए हैं पर धीरे से हमें अपने स्वरूप में लौटना होगायही बात ब्लॉग लेखन पर भी लागू होती है , इसने हमें परिचय दिलाया , रचनात्मकता का सँसार दिखाया , अपने अस्तित्व की पहचान कराई ; मगर हर तरफ से मुँह मोड़ कर यही तो सब कुछ नहीं हैइतना सहारा लेंगे तो ये उँगली या बाँह छूटते ही चारों खाने चित्त जा गिरेंगेटिप्पणियों की चाह , इकतरफा भ्रम , अनचाहे विवाद ...मायूस ही करेंगेताकत की बजाय ये तो कमजोरी हो गई


ब्लोगवाणी बन्द हो गई जैसे कितनी ही रचनाओं से मेल-जोल का रास्ता बन्द हो गयापरिवर्तन तो जीवन का नियम है , अब चिट्ठा-जगत ज़िन्दाबाद । एक ढर्रे पर चलते चलते अचानक रास्ता बदलना पड़े तो फर्क तो पड़ता है कैसे कहें कि फर्क नहीं पड़तातलब , तड़प , प्यास ...एड्किशन ...लत या फिर नशा ... एक ही ग्रुप के कितने ही शब्द हैं अन्दाज़े-बयाँ के लिएइन्हें अदब में रखना आना चाहिएकोई भी सहारा छूटता है तो लेखक लोग माहिर होते हैं मातम के बखान को शब्दों में ढालने के लिएहमारा आधार तो बाहरी ही हुआ


निरुद्देश्य लेखन दिशाहीनता का सूचक हैजो लेखन किसी के आँसू पोंछ सके , दर्द बाँट सके , दिल बाग-बाग कर सके , मूक परिस्थितियों को शब्द दे सके , असलियत से परिचय करा सके या हल निकाले ...वो ही सार्थक हैबिना कारण जगह घेरने से क्या फायदाअच्छा हो कि हम अपनी अपनी सामर्थ्य भर औरों को भी सही दिशा देने की कोशिश करेंहर व्यक्ति के जीवन में ग़मों की रात यानि भारी वक्त आता तो जरुर है बस उस वक्त को कैसे संभालना है , बाहरी आधार लेते हुए जब जीवन चलने लग जाय तो अपनी हिम्मत को संरक्षित कर लो , यही तो प्राण-शक्ति है ... यूँ ही ज़ाया नहीं करतेएक एक दिन मन कटरे में खड़ा करके जिरह जरुर करेगासहारा तो सहारा होता है , जिसके बिना काम चले , वो तो पंगु हो गए ? आधार तो तो वो है जो हर हाल में जीवन से भरपूर रहना सिखाये


पानी दे , पानी दे
थोड़ी सी जिंदगानी दे
तपती हुई धरती है
कुछ बूँद जरुरी है
पतझड़ के मौसम में
तेरा फ़िक्र जरुरी है
नदिया का किनारों सँग
रहना भी जरुरी है
धरती पर चलने को
कुछ बात जरुरी है
प्यास की नदिया से
दूरी भी जरुरी है

5 टिप्‍पणियां:

  1. जो लेखन किसी के आँसू पोंछ सके , दर्द बाँट सके , दिल बाग-बाग कर सके , मूक परिस्थितियों को शब्द दे सके , असलियत से परिचय करा सके या हल निकाले ...वो ही सार्थक है ।
    Badi sahi baat kah dee aapne!

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  2. आपके ब्लॉग में पहली बार आया. आपके बच्चों की सफलता बता रही है कि आप वाकई अच्छी होम मेकर हैं. समाज और राष्ट्र निर्माण की आपकी कोशिश सफल हो और उग्रवादी ताकतों का ह्रदय परिवर्तित हो यही कामना है.
    ..जो लेखन किसी के आँसू पोंछ सके , दर्द बाँट सके , दिल बाग-बाग कर सके , मूक परिस्थितियों को शब्द दे सके , असलियत से परिचय करा सके या हल निकाले ...वो ही सार्थक है..
    ..सार्थक लेखन के लिए प्रेरित करती आपकी यह पोस्ट अच्छी है.
    ..धरती पर चलने को कुछ बात जरुरी है..सुदंर कविता.

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  3. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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  4. निरुद्देश्य लेखन दिशाहीनता का सूचक है । जो लेखन किसी के आँसू पोंछ सके , दर्द बाँट सके , दिल बाग-बाग कर सके , मूक परिस्थितियों को शब्द दे सके , असलियत से परिचय करा सके या हल निकाले ...वो ही सार्थक है ।

    आपके इस लेख का एक एक शब्द झकझोरता हुआ ...बहुत अच्छा लगा पढ़ना ....आभार

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  5. शिवम् जी आपकी टिप्पणी कॉलम में रिसीव ही नहीं हुई ,मेल में आई ..इसलिए मैं ही इसे पोस्ट कर दे रही हूँ , .....
    शिवम् मिश्रा ने आपकी पोस्ट " उँगली छुड़ा लें " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !
    शिवम् मिश्रा द्वारा जीवन यात्रा , एक दृष्टिकोण के लिए ९ अगस्त २०१० ५:२७ PM को पोस्ट किया गया

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