सोमवार, 12 जनवरी 2009

मन का सुख

आत्मा का असली स्वरूप है सतचित आनन्द स्वरूप , उसे आनन्द में ही रहना अच्छा लगता है | आनन्द में रहने में उत्तेजना नहीं होती , चित्त हल्का-फुल्का होने का अनुभव करता है | दुःख मन को भारी कर देता है , इसीलिये दुःख बर्दाश्त नहीं होते | मन दुःख से दूर रहना चाहता है | सुख दुःख प्रारब्धानुसार आयेंगे ही ; अगर हम इन्हें आत्मा पर या मन पर असर न करने दें , तभी ये हमें व्यापेंगें नहीं | दुखों को हम एक परिस्थिति की तरह लें , जो बीत जाने वाली है , हम दर्शक हैं | जीवन एक नाटक है , कई बार हम दर्शक बनते हैं और अक्सर हम नाटक के पात्र बनते हैं , तो अपना अभिनय , अपना पात्र हम बखूबी निभायें | जीवन एक चुनौती है , इसे स्वीकार करें | विषम से विषम परिस्थिति भी आपके मन का कुछ न बिगाड़ सकेगी , अगर आप साक्षी भाव से जीवन को देखें | जो बीत रहा है बाहर बीत रहा है , मनस्थिति पर न बीतने दें | नकारात्मक विचार से कहें सौरी (माफ़ करना )मेरे पास इस विचार के लिए कोई जगह नहीं है | मन बेकाबू होने लगे तो उसे शुभ कर्मों की तरफ़ लगाओ और जीतो अपने मन को ;अपने आपको कर्म करते हुए , कर्म ही जीवन का आधार है |

दुःख की तरफ़ भागने की जो मन को आदत पड़ चुकी है , इसे काटो , तर्क से समझाओ | अन्तर्मन में सुखद अनुभूतियों को , आशा को , आनन्द को जगह दो | It is darkest before the dawn . सुबह से पहले अँधेरा बहुत गहरा होता है | दुःख को बीत जाना है , दुःख की रात कितनी भी लम्बी क्यों न हो , बीत जाने वाली है | सिर्फ़ दुःख की रात ही पूरा जीवन नहीं है | बहुत सारे उजाले आपके जीवन में आए हैं | सुख दुःख मिल कर जीवन बना है | इसे चुनौती के रूप में स्वीकारें | जीतें या हारें , बस मुस्करायें |

जीवन ये आनन्द भरा है , सबमें आनन्द घोल दो

चुन लो कोई सच का मोती , बाकी सारा छोड़ दो

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