बुधवार, 29 अगस्त 2012

नहीं हूँ मैं मन ...

चार महीने की लम्बी यातना सह कर जब खड़ी हुई तो क़दमों के साथ साथ मन ने भी चलने से इन्कार कर दिया । लगा कि अब आगे की ज़िन्दगी इसी असहाय सी अवस्था में काटनी पड़ेगी । वक्त कैसे कटेगा और मन ने अपनी पुरानी कमजोरियाँ भी उभार लीं ।मुझे पानी के नीचे जाने और बन्द कमरे में दम घुटने से डर लगता था ,इसीलिए मैं समुद्र में स्नौर्कलिंग भी नहीं कर पाई थी । मुझे समझ में आने लगा कि  मैं फिर से अवसाद की तरफ जा रही हूँ । छोटी से छोटी बात भी मन में खलबली मचा रही थी , घर में अकेले पड़ जाने से तो बेहद घबराहट हो रही थी ।यहाँ तक कि मौत का डर भी सता रहा था ...तो क्या हमारी मंजिल मौत है ...जब वक्त इतना भारी है तो क्या करेंगे जी कर ...मन ने दीन दुनिया से आँखें फेरनी चाहीं ।जब कि चार महीने जब तकलीफ़ ज्यादा थी तो एक अजब सी स्थिरता थी मन में ...तो फिर ये क्या मेरी सकारात्मक ऊर्जा खत्म होती जा रही थी।

मैंने हिम्मत कर के खुद से कहा कि ये तो मन है जो मुझे गुमराह कर रहा है ...और मैं मन नहीं हूँ ...नहीं हूँ मैं मन ...मैं तो इस मन को भी चलाने वाली चेतना हूँ । अपने आप को मैंने एक चपत लगाई ...जब मैं उस वृहत चेतना से अलग हो कर आई हुई उसी का अँश हूँ तो मैं अपनी ताकत क्यों भुला रही हूँ । मुझे याद आया कि अभी कुछ ही दिन पहले मैंने एक अखबार में पढ़ा था कि एक लेखक के एक्सीडेन्ट के बाद पीठ में गूमड़ और हाथ में डंडा आ गया था और किस तरह तैर-तैर कर उन्होंने अपना गूमड़ ठीक कर लिया था और डंडा त्याग दिया था । आदमी की इच्छा-शक्ति से तो असंभव काम भी संभव हो जाते हैं । इसके साथ ही याद आई पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की , वो क्या जानतीं थीं कि इतनी उम्र में वो प्रेजीडेंट बनेंगी । कौन जानता है कि कब ज़िन्दगी उसे उमँग से भरी एक नई दिशा दे देगी । राजनीति या कीर्ति में मेरी रूचि नहीं है , मगर ऐसे उदाहरण तो मन को उठाने वाले हैं और किसी भी क्षेत्र में हो सकते हैं । 

अगर हमारी किस्मत पहले से लिखी होती है तो मैंने समझा कि किसी बड़े अवाँछित कर्म का फल भोग लिया और दुःख से सही सलामत बाहर आ पाई यानि कर्म कटा । हमसे सीधे तौर पर जुड़े या अपरोक्ष रूप से जुड़े लोगों के साथ कर्मों का एकाउन्ट हम यूँ ही नहीं बन्द कर सकते । ये हम पर है कि हम वातावरण को बोझिल बनायें या खुशनुमा । ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में हर चेहरा भरमाया हुआ , घबराया हुआ ...हमें क्या देगा ,जब उसके पास ही वो नहीं है ...जिसकी उसे तलाश है और जो हम भी ढूँढ रहे हैं । और अगर हम ये सोच सकें कि मेरे आस पास की आत्माओं के प्रति जो मेरी जिम्मेदारी है उसे पूरा करने के लिए ही मुझे भेजा गया है , बेशक मैं बहुत सुविधा संपन्न या सक्षम न होऊं , मगर एक नैतिक भावना पूर्ण थपकी तो दे ही सकता हूँ । देने के लिए उठा हाथ ही मन को तृप्त कर देता है , मन को उद्देश्य मिलते ही दिशा मिल जाती है और दिशा मिलते ही मन सहज होने लगता है।

तो हाँ , कुछ दिन लगे मुझे सँभलने में। इस लेख को मैं इसलिए भी लिख रही हूँ कि ये किसी और के भी काम का हो सकता है ।मैंने समझा कि  मन किसी भी सीमा तक आदमी को भटका सकता है , पीड़ा में कुछ सूझता ही नहीं । अध्यात्म ही वो आईना है जो हमारी चेतना से हमारा परिचय करवाता है । हम तो इस मन को भी चलाने वाले हैं फिर हम इसका ही कहना क्यों मान लेते हैं । ज़िन्दगी जैसा उपहार पा कर भी हम उसका सम्मान नहीं करते । 

और याद आया , जो मुश्किल हालात तुम्हें मार न सकें , वही तुम्हारी ताकत बन कर उभर आयेंगे , क्योंकि तुम उनसे गुजर पाए यानि उतना तनाव तुम्हारी बर्दाश्त के अन्दर था । दुख के बहाव में बह जाना एक सीमित दृष्टिकोण से जीना है । ज़िन्दगी को अगर यज्ञ कहें तो कभी कभी ज़िन्दगी हमारी बड़ी ही प्यारी चीजों की आहुति भी माँग लेती है ,जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इक आग का दरिया है और तैर के जाना है , सूफिआना अन्दाज़ से ज़िन्दगी को देखें । 


ज़िन्दगी दरअसल लगाव और विरक्ति का मिला जुला रूप है यानि मध्यम मार्ग ही सुखी रख सकता है । लगाव पूरी दुनिया को अपना समझने का और विरक्ति इतनी कि एक दूरी बना कर चलना । ताकि दुख ज्यादा असर न कर पायें । सब ठीक है , बस अपना रास्ता चुन लें । 

कोई भी व्यक्ति जिसके पास सुन्दरता देखने की योग्यता हो , वह कभी वृद्ध नहीं हो सकता ..........फ्रेंक काफ्का 

सुन्दरता माने क्या ...जीवन सुन्दर बनता है सुन्दर विचारों से ...और विचार तो आपके हाथ की बात है । वीणा से सुन्दर स्वर निकालिये या बेसुरे ......






सोमवार, 13 अगस्त 2012

मन की महिमा

प्रिय बेटी ,
इस बार जब तुम कुछ दिन घर बिता कर वापिस जा रहीं थीं , मन बार-बार भर आ रहा था जब तुम मुझे कम्बल ओढ़ातीं थीं , मुझे लेटे रहने की हिदायतें देतीं थीं , स्टीम्ड तौलिये से मेरी पीठ सेंकतीं थीं ....मेरा इतना ध्यान रखतीं थीं तो लगता था जैसे प्यार छलक-छलक सा रहा हो अँधा क्या मांगे दो आँखें ...बीमार तो शायद यही ढूंढ रहा होता है
मैंने बहुत सोचा कि मैं क्या अपने स्वार्थ के लिए रो रही हूँ ....नहीं मगर मैं तो तुम्हारी  मुहब्बत के लिए रो रही थी बीमारी में अगर किसी की मुहब्बत साथ हो तो सुबह का रँग कुछ और ही होता है बीमारी जल्दी भाग जाती है ऐसे ही पलों में मैंने लिखा ...
ऐ मुहब्बत मेरे साथ चलो 
के तन्हा सफ़र कटता नहीं  

 

दम घुटता है के
साहिल का पता मिलता नहीं   

जगमगाते हुए इश्क के मन्जर 

रूह को ऐसा भी घर मिलता नहीं 

 
तुम जो आओ तो गुजर हो जाए 

मेरे घर में मेरा पता मिलता नहीं 

 
लू है या सर्द तन्हाई है

एक पत्ता भी कहीं हिलता नहीं 


ऐ मुहब्बत मेरे साथ चलो 

बुझे दिल में चराग जलता नहीं  


तुम्हीं तो छोड़ गई हो यहाँ मुझको 

ज़िन्दगी का निशाँ मिलता नहीं


लेटे लेटे मैंने तुम्हारी टेंथ के कोर्स की प्रेमचंद की लिखी हुई लघु कहानियों की किताब ' मानसरोवर ' भी पढ़ी , जिसे मैंने सालों-साल संभाल कर रखा था कि कभी वक्त मिलेगा तो पढूँगी और अब जब बिस्तर पर पडी हूँ तो पढ़ा ...इसके पहले ही पन्ने पर तुम्हारे हाथ से लिखा हुआ है ...प्रेम जीवन में सच्ची प्रसन्नता और विकास का कारण है ...Love ..the foundation of true progress and happiness.
ये कितना बड़ा सच है ...जिस कर्म की जड़ में स्वार्थ हो वो कभी सच्ची ख़ुशी नहीं देगा ...जिसकी नीँव में प्रेम हो वो स्वतः ही आनन्द का फल देगा ...बड़े बड़े कर्मों के पीछे प्रेरणा का स्त्रोत प्रेम ही होता है

एक और शिक्षा जो मैंने इस लम्बी बीमारी में पाई वो ये कि हर हालत पर कर्म से काबू पाने का मेरा विष्वास हिल सा गया है ; कर्म से भी कहीं ज्यादा महत्व-पूर्ण हमारा भाव होता है अहसास पर नियंत्रण मामूली बात नहीं है , पर यही सब कुछ है . . अहसास ही राई को पहाड़ बना लेता है और अहसास ही पहाड़ को राई बना सकता है ..मैंने दिन भर में कभी दस मिनट से ज्यादा आराम नहीं किया था ..अब ये चौथा महीना है ...वही  सूनी दीवारें है और छत पर टकटकी लगाए आँखें हैं दिन तारीख कहने को सब बदलते हैं पर मेरे हालात नहीं बदलते माँ  कहतीं थीं कार्तिक में पैदा हुए बच्चों का दुःख चीढ़ा होता है , आसानी से पीछा ही नहीं छोड़ता मैं जानती हूँ मेरे सारे घर को मुझे इस हालत में झेलना आसान नहीं रहा होगा .. ऐसे ही पलों में मैंने खुद को समझाते हुए लिखा ...
हड्डी हड्डी टूट जुड़े 
इन्सां का हौसला परवान चढ़े 
दूर खुदा बैठा ये सोचे 
किसके नाम का मन्तर  ये
मेरे जैसा काम करे 
जब तुम मेरे पास आ रहीं थीं मन ने तुम्हारे लिए एक कविता लिख ली थी
मेरी सोन चिरैय्या 
रँग में भी और ढँग में भी 
भीतर भी और बाहर भी  
उजली-उजली प्यारी-प्यारी 
मेरी नेह की छैयाँ 

आ बैठी घर की मुंडेर पर 
यादों के रँग बिखेर लिए 
धरती नाची , अम्बर नाचा
ता ता थैय्या , ता ता थैय्या 
तेरी जीत पे सारा घर नाचा 
मेरी सोन चिरैय्या 

अम्बर की बाहें बुलाती लगें 
तू पँख फैलाये गाती लगे 
मन्द हवाएं छू आयें तुझे 
धीरे से मुझे सहलातीं लगें 
धूप सुनहरी आती लगे 
मेरी सोन चिरैय्या

तुमने देखी मन की महिमा कैसे ये कभी रोने लगता है तो कभी हँसने-गाने लगता है जानती हो भाव ही मेरी पूँजी है , जैसे ही मैं लिखती हूँ तो जैसे कोई बदली बरस कर चली जाती है और आसमान खिल उठता है , बस वैसे ही मैं भी हल्की हो उठती हूँ
असीम प्यार के साथ 
तुम्हारी मम्मी 
3-जून-2012


गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

अन्डमान ( कैमरे की नजर से )



कारबाइन कोव बीच

सेल्युलर जेल की बाहरी इमारत

सेल्युलर जेल
लाइट एंड साउण्ड शो
पीपल के पेड़ की टहनियाँ दिखाई दे रहीं हैं ...जिसकी जुबानी आँखों देखी कही गई है ...ऊपर लाइट हाउस दिख रहा है जहाँ से चारों तरफ समुद्र में निगरानी की जाती थी ....
ये पहली कोठरी वीर सावरकर की , जिसके नाम पर यहाँ का हवाई अड्डा बना है ।

कानवाय में जारवा देखने के लिये घने जंगल की ओर जाते हुए ...

जारवा की फोटो न खींचने का नियम हम तोड़ नहीं सकते थे ...और अब पहुंचे बाराटाँग ....



लाइम स्टोन केव
मड वोल्केनो
हैवलॉक आयलैंड
सफ़ेद रेत , नीला पानी , इठलाती हुई नाव , समन्दर का किनारा , और कैमरे ने कैद किया ये हसीन नजारा ....
हमारी बीच साइड कौटेजेज
राधा नगर बीच

इसी तट से सूर्यास्त का नजारा

एलीफैंटा बीच की ओर

एलीफैंटा बीच

चल मन देसवा की ओर 

इससे निचली दो पोस्ट्स भी अन्डमान पर ही हैं .....सिर्फ चित्र यहाँ पर हैं  । 

अण्डमान , एक यादगार यात्रा

http://shardaa.blogspot.in/2012/01/blog-post_4265.html

अण्डमान , काला पानी या नीला पानी

http://shardaa.blogspot.in/2012/01/blog-post.html

























शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

अण्डमान , एक यादगार यात्रा

आठ साल पहले अन्डमान से वापिसी पर ये जरुर सोचा था कि जगह बड़ी सुन्दर है , हो सका तो कभी दुबारा यहाँ आयेंगे । मगर इतनी जल्दी आयेंगे , ये मालूम न था । हमारी व् बच्चों की छुट्टियाँ स्वीकृत हो चुकीं थीं , लक्ष-दीप जाने की योजना थी , एजेंट ने कहा सरकार और रिसौर्ट मालिकों के बीच एग्रीमेंट के झगड़े की वजह से अगाति की बुकिंग नहीं मिल पा रही , जैसे ही दिसंबर में कोर्ट का फैसला आएगा , बुकिंग कर ली जायेगी । हमारी छुट्टियाँ शुरू होने के दस दिन पहले एजेंट ने कहा कि इन तारीखों की टिकटें नहीं मिल सकतीं । अब सोचा कि चलो किसी और जगह घूम आया जाए । बच्चे साउथ में जाने के लिये बिल्कुल तैय्यार न थे । साउथ , गोवा , मुम्बई , कोलकाता , राजस्थान आदि जगहों के देशाटन का लुत्फ़ हम पहले ही उठा चुके थे । हिमालय दर्शन के बारे में सर्दियों में सोचा भी नहीं जा सकता । रह गया गुजरात , तो बच्चों को मंदिरों के दर्शन में कोई दिलचस्पी नहीं होती , ध्यान आया कि क्यों न अन्डमान ही चलें ; हैवलॉक आयलैंड और जारवा ट्राइब देखने के लिये जंगल की सैर , पिछली बार हमसे छूट गए थे । बच्चों से पूछा , खैर चाही हुई तारीखों की सारी व्यवस्थाएँ हो गईं ।
बेंगलोर से बेटियाँ , मुम्बई से बेटा , नैनीताल से हम लोग , सब चेन्नई में इकट्ठे हुए । इक्कतीस दिसम्बर की सुबह चार बजे पोर्ट ब्लेयर की फ्लाईट थी ।हमारी इकॉनोमी क्लास
की फ़्लाइट्स बहुत इकोनौमिकल हो गईं हैं । अरे ये क्या , फ्लाईट स्टीवर्ड्स तो दुकान ही लगाये खड़े हैं , पैसे ले कर चाय कॉफी नाश्ता पेश करते हैं ।
दुनिया के नक़्शे में भारत के नक़्शे के ठीक नीचे बँगाल की खाड़ी वाले सागर में उतर जाइए , तो करीब ३५८ छोटे छोटे टापू नजर आयेंगे , बस वही अण्डमान निकोबार द्वीपों का समूह है । यहाँ पहुँचने का रास्ता सिर्फ समुद्री व हवाई हो सकता है । चेन्नई व कोलकाता से सीधी उड़ानें हैं । पोर्ट ब्लेयर पर हवाई अड्डा है और यही यहाँ का सबसे ज्यादा क्षेत्रफल वाला व विकसित दीप है । थोड़ा पहाड़ी सा इलाका , ढलवाँ छतों वाले दूर दूर बिखरे से घर , सारे साल गर्म मौसम , ऊँचे ऊँचे नारियल व सुपारी के पेड़ , चारों तरफ समुद्री तट पर चलतीं ठण्डी हवाएँ यहाँ की खासियत है । यहाँ बसने वाले अधिकाँश दक्षिण भारत के व बँगाल के लोग हैं । यूनियन टेरिटरी होने की वजह से यहाँ दारु सस्ती है । खाद्यान्न से ले कर कारों तक सब चीजें समुद्री जहाज़ों में लाद कर यहाँ लाई जाती हैं , इसीलिए महंगी हैं । यहाँ कोई भिखारी नहीं पायेंगे ।
अण्डमान क़ी रफ्तार मुझे उतनी ही लगी जितनी आठ साल पहले लगी थी । अपने मेट्रो सिटीज की रफ्तार जिस अनुपात से बढ़ी है ....यहाँ सब शान्त सा लगा । कार्बाइन कोव बीच पर ' पियर लेस ' होटल , ' वेव 'रेस्टो रेंट आज भी उसी अन्दाज़ में खड़े थे जैसे आठ साल पहले देखे थे । हाँ यातायात के लिये जो सड़क समुद्री तट और इनके मध्य थी , उसे जरुर इनके पीछे की तरफ निकाल दिया गया है । शायद इस बीच सुनामी की वजह से ये सड़क कुछ क्षतिग्रस्त सी हो गई होगी । और हाँ इस बीच पर अब उतनी भीड़ भी नहीं दिखी ।
इस बार के ट्रिप में हमने पहले देखे हुए गाँधी पार्क , एक्वेरियम म्युजियम , एग्रीकल्चरल फ़ार्म , चिड़िया टापू , वाइपर आयलैंड , रॉस आयलैंड , नॉर्थ एंड बीच , चाथम सा मिल ( जो की ब्रिटिश राज्य के वक्त की सबसे बड़ी लकड़ी क़ी फैक्ट्री है व जो पास वाले आयलैंड पर बनी है और एक पुल से पोर्ट ब्लेयर से जुडी है ) और जॉली बाय आयलैंड को छोड़ दिया ।
सेल्युलर जेल का लाईट एंड साउंड शो हमने इस बार भी देखा । जॉली बॉय बीच जैसा बीच तो हम सिर्फ डिस्कवरी चैनल पर ही देख सकते हैं । नीला पानी , सफ़ेद रेत , सफ़ेद कोरल , पिंक , पीच स्टार फिश , पर्पल नीली पीली मछलियाँ , और कुछ भी मडी नहीं ; जैसे किसी और ही दुनिया में आ गए हों । स्नौर्क्लिंग , जिसमें तीस मीटर दूर की चीज भी बहुत करीब दिखती है , यहाँ का असली आकर्षण है । कहते हैं कि छः महीने के लिये जॉली बाय बीच खुलता है और छः महीने के लिये रेड स्किन आयलैंड पर जाना परमिट किया जाता है ।
पहले दिन यानि ३१ दिसंबर , बच्चे पार्टी चाहते थे । हमारे होटल में कोई पार्टी नहीं थी , कुछ और जगह पता किया , वहां सिर्फ वहीँ रुके हुए लोगों के लिये पार्टी थी । एक जगह कुछ म्यूजिकल शो था , , ड्राइवर ने कहा कि यहाँ फैमिली के साथ आना ठीक नहीं रहेगा । इसी शाम हमारे एक मित्र का बेटा हमसे मिलने आया , वो और उसकी पत्नी पोर्ट ब्लेयर में ही एविएशन में ख़ास ओहदों पर हैं । " क्या कर रहे हैं , अँकल हमारे यहाँ इन्फौर्मल पार्टी है , आइयेगा " उसने कहा । बस हमें क्या चाहिए था । बच्चों के मन की मुराद पूरी हो गई , झटपट तैय्यार । बच्चों ने नए साल का आगाज़ पोर्ट ब्लेयर के मिनी बे की पार्टी के डांस फ्लोर पर नाचते हुए किया ।
दूसरे दिन हम लोग कॉनवाय में जँगल में जारवा ट्राइब देखने निकले । तकरीबन दो घंटे जँगल में ड्राइव , हमारे आगे आगे डिगली पुर वाली बस जा रही थी , ढेरों गाड़ियाँ काफिले में ।कहीं कहीं हमें आदिवासी सड़क पर खड़े मिले । ऐसा लगा हम इन्हें देखने आए हैं या ये लोग पिंजरों में घूमते हम लोगों को देखने आए हैं । उनके चेहरों पर कोई भाव नहीं था , हमारी सभ्यता से कोसों दूर , सचमुच ऐसा लगा कि हम आदि मानव के युग में पहुँच गए हैं , उनके लिये हम अजूबा और हमारे लिये वो अजूबा । हम सोच भी नहीं सकते , आज के इतने विकसित युग में अन्डमान के कई द्वीपों पर अब भी मनुष्य उसी आदिम युग में जी रहा है ; जहाँ न भाषा का कोई मतलब है , न हमारे इतने सारे अविष्कारों का ।
एक बच्चा कबूतर मार कर उल्टा लटकाए खड़ा था , कुछ के पास तीर कमान थे , औरतों के पास कुछ खुरदरी सी टोकरियाँ पीठ पर लदी थीं । कुछ पुलिस वाले इन लोगों के बीच आते जाते हैं , जो इनकी भाषा समझते हैं । एक जगह तो दो पुलिस वाले और दो जारवा खड़े थे ,
जैसे पुलिस वाले इन्हें हमें दिखाने के लिये सड़क पर ले आए हों । ये अपनी पारम्परिक वेशभूषा में थे , कमर के गिर्द लाल लटकती कतरनों का बैन्ड निसंदेह वो कपड़े का बना नहीं था । यहाँ खाने पीने की चीजें व् कपड़े देना अब पर्यटकों को मना कर दिया गया है । पहले कुछ लोग कपड़े खाना छोड़ जाते रहे होंगे , इसीलिए कुछ औरतें व बच्चे शौर्ट्स ( निक्करें ) पहने दिखे । एक तेरह चौदह साल का बच्चा तो गांधी टोपी लगाए खड़ा था , भाव शून्य चेहरा , कंधे से आधी नीचे उतारी टी शर्ट पहने ...हमारे हाथ हिलाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं की उसने । एक पच्चीस तीस साल की युवती चलती गाड़ी के पास से गुजरी तो बच्चों के हाथ हिलाने पर मुस्कराई भी और होंठों के पास हाथ ले जाकर फ़्लाइंग किस भी दे मारी । ' अरे बेब , बेब ' बच्चे चिल्लाये , खूब हँसे ।


खाना कपडे देने पर रोक सरकार ने इसलिए भी लगाई होगी कि उनके शान्त और पारम्परिक जीवन में खलबली न मच जाए । विकास धीरे धीरे क्रम वार हो तो बर्दाश्त के अन्दर होता है । विकसित दुनिया का छल प्रपँच उन्हें किसी भी कगार पर ले जा सकता है । एक और कारण भी है जारवा के पर्यटन में ही सरकार लाखों रुपये एक दिन में ही कमा रही होगी ।
ये लोग बिलकुल अफ्रीकियों जैसे थे , बस बाल घुंघराले नहीं थे , बाल छोटे छोटे कटे हुए , पता नहीं किस चीज से ये उन्हें काटते होंगे । हो सकता है यहाँ की गर्म जलवायु के सीधे सम्पर्क में रहने की वजह से जारवा काले हो गए हों ।
जल्दी ही हम समुद्र तट पर पहुँच गए , जहाँ एक जहाज हमें बारा टाँग द्वीप ले जाने का इंतज़ार कर रहा था । सब गाड़ियों से उतरे और जहाज में चढ़ गए , हमारे आगे आगे चल रही बस भी शिप में चढ़ गई । करीब करीब आधे घन्टे बाद बारा टाँग के तट पर पहुंचे , यहाँ से छोटी नौकाओं द्वारा हमें लाइम स्टोन केवज दिखाने ले जाया गया । अगले तट पर उतर कर कुछ चल कर चूने की जो गुफाएं हमने देखीं वो पानी के जमने से बनी हुईं थीं , विभिन्न आकृतियों के रूप में सफ़ेद पत्थर सीं । हम नौका से ही वापिस बारा टाँग लौटे । यहाँ जीप से ' मड वौल्कैनो ' देखने गए । रह रह कर थोड़े बुलबुले उठते और थोडा कीचड़ बहता हुआ दिखता । वापिस तट की ओर गए । ये आयलैंड रिहाइशी था , जो बस पोर्ट ब्लेयर से आई थी वो यहाँ चल रही थी , शायद शाम तक वापिस लौट जाती होगी । तट पर दस बारह दुकानें थीं , भूख लग आई थी , यहीं दोपहर का खाना खाया ।
कुछ देर बाद शिप आ गया , हमारा ड्राइवर और सब पोर्ट ब्लेयर के उसी तट की ओर बढे जहाँ गाड़ियाँ छोड़ कर आए थे । दूर से देखा कुछ जारवा बच्चे समुद्र में नहा रहे थे । हम अपनी अपनी गाड़ियों में सवार हो कर फिर काफिले में जँगल के बीच से गुजरे । फिर कुछ और जारवा बच्चे आदमी औरतें देखे । कुछ बच्चे तो हमसे आगे चल रही गाडी को रोकने की कोशिश कर रहे थे , और इशारे से खाने की चीज मांग रहे थे ।
खैर रात तक हम वापिस होटल पहुंचे । लगा कि जारवा देखे बिना हमारी अंडमान यात्रा अधूरी ही रहती । आदि मानव और हमारे बीच युगों के फासले हैं । कुछ देर के लिये जैसे हम उसी युग में पहुँच गए थे , जहाँ न दिन न तारीखें होती हैं , जहाँ न मखमली बिछौने होते हैं , न कोई चोंचले होते हैं । उफ़ , जैसे समय की रील रिवाइंड कर दी गई हो । यकीन नहीं होता , मगर ये सच है कि आदि मानव आज भी अपने उस कच्चे खालिस रूप में उन द्वीपों पर उपस्थित है , जहाँ दुनिया की हवा ने उसे अपने से दूर रक्खा है ।
तीसरे दिन सुबह मैक्रूज़ से हैव्लौक आयलैंड के लिये रवाना हुए । रास्ते के दृश्यों में समुद्र में एक आयलैंड खत्म होता तो दूसरा शुरू हो जाता । हैव लॉक का क्षेत्रफल केवल पन्द्रह किलोमीटर है । मैक्रूज़ में ही हमें अण्डमान के विभिन्न द्वीपों पर बसे आदिवासियों के बारे में डॉक्युमेंट्री दिखाई गई । कुछ द्वीपों पर जाना मना है , ताकि उन पर बसे आदिवासियों के जीवन में खलल न पड़े । निकोबार आयलैंड के निकोबारी जाती के लोगों के लिये भारत की फोर्मर प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने घर व् पाठ शालाएं खुल्वाईं , उन्हीं के बीच के लोगों को शिक्षित कर के वहीँ नियुक्त किया और ग्रामोद्योग को विकसित किया । ओंगी जाति भी किसी द्वीप पर है ।
हैवलॉक से सिंगापुर की समुद्री दूरी केवल १५०किलोमीटर है । अंग्रेजों के भारत छोड़ कर जाने के बाद जल्दी ही जापानियों ने अण्डमान पर कब्ज़ा कर लिया था , कहते हैं बहुत खून खराबा हुआ था । खैर जल्दी ही कमान भारत के हाथ आ गई थी ।


यहाँ तट की ओर बनी कौटेजेज में हमें ठहराया गया , अद्भुत दृश्य था , सफ़ेद रेत के किनारे समुद्र में बंधी नाव , लहरों में हिचकोले खाती । जल क्रीडा और फोटो खिचवाने के लिये अद्भुत संयोग थे । दोपहर से शाम हमने ' राधा नगर बीच ' पर गुजारी । समुद्र में उठती लहरें , सूर्यास्त का नजारा , यहाँ की खुशनुमा यादें हैं ।
चौथे दिन सुबह ही हम स्पीड बोट से ' एलिफैन्टा आयलैंड ' की ओर गए । यहाँ स्नौर्क्लिंग , ग्लास बोट में ले जा कर मछलियाँ दिखाना , स्कूटर ड्राइविंग व् अन्य वाटर स्पोर्ट्स करवाए जाते हैं । यहाँ काफी हद तक जॉली बॉय बीच जैसा लगा । स्पीड
बोट से ही हम वापिस लौटेनाश्ता पैक करवाया , ग्यारह बजे हमें मैक्रूज से वापिस जाना थापोर्ट ब्लेयर पहुंचे , अब सिटी टूअर के नाम पर हमने मार्केट से कुछ खरीदाएक मंदिर में प्रवचन चल रहा था , सुना । ' पुलिस गुरु द्वारे ' गए , ये गुरुद्वारा एक मात्र ऐसा गुरुद्वारा है जिसका प्रबंधन पुलिस करती हैफिर पहुंचे हम अपनी चहेती कार्बाइन कोव बीच , जहाँ हम पहले दिन भी गए थे और अपनी आठ साल पहले वाली विजिट में जब हम ' हौर्न बिल नेस्ट ' में रुके थे , हर दिन गए थेपांचवे दिन सुबह ही हमारी वापिसी थी


अण्डमान का महत्व सिर्फ खूबसूरत और शांत होने की वजह से नहीं है , अपितु ऐतिहासिक दृष्टि से भी हैवाइपर और रॉस आयलैंड पर ब्रिटिश राज के वक्त की चर्च , क्लब और जेल के अवशेष , पोर्ट ब्लेयर पर सात विंग्स वाली , छोटी छोटी कोठरियों वाली , लम्बे मजबूत कुण्डों वाली तीन मन्जिली सेल्युलर जेल , जहाँ हमारे देश भक्त क्रांति कारियों को भेज कर उन से कड़ी मेहनत कराई जाती थी , मसलन नारियल से तेल निकलवाने के लिये कोल्हू पर बै की जगह आदमी को चलानाऔर जहाँ से कैदियों के लौटने की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि चारों तरफ था समुद्र , कड़ा पहरा और सख्त अनुशासनहमारे वीरों की यादें , खूबसूरत जलचरों की दुनिया के अलावा हमारे आदिम युग की झलकियाँ हमें सिर्फ यहाँ मिल सकतीं हैं


बुधवार, 18 जनवरी 2012

अण्डमान , काला पानी या नीला पानी

३१-दिसंबर-२०११

नीचे गहरे स्लेटी बादल जल्दी ही बर्फ के रँग में बदल गए , जैसे किसी ने मक्खन या क्रीम फेंट कर ऊँची-नीची सी चारों तरफ बिखरा दी होसामने हल्की पीली और नारंगी दो रँगों की लकीर सी सूर्योदय की तरफ अग्रसर होती हुई सुबह की सूचना दे रही थीप्लेन की खिड़की से दिखता अदभुत दृश्य थासुबह साढ़े पाँच से पौने छः के बीच का वक्त ....जल्दी ही बादलों के ऊपर धूप निखर आई थीपीली नारंगी रँग की लकीर अब गायब हो गई थीबस पन्द्रह मिनट बाद ही बादलों की मोटी परत को चीरता हुआ प्लेन अण्डमान निकोबार द्वीप समूह के ऊपर चक्कर काट रहा थाएक एक टापू हरा भरा चारों तरफ पानी से घिरा हुआ नजर रहा थायहाँ तक कि तट के किनारों की तरफ उठती हुईं समुद्र की लहरों को भी साफ़ साफ़ देख पा रहे थे हम

पोर्ट ब्लेयर यहाँ का एकमात्र ऐसा टापू है जिस पर हवाई अड्डा हैवीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा , ये नाम इसे इसलिए दिया गया कि वीर सावरकर महान देश भक्त और क्रांतिकारी यहीं सेल्युलर जेल में बंद रहेजेल की अँधेरी कोठरी पल पल आगे बढ़ती काल की आहट किसी का भी मन विचलित करने के लिये काफी होती हैकिस जज्बे से वो हर सख्ती का सामना कर सके और अपने साथियों के लिये जोश का एक उदाहरण बन सकेपोर्ट ब्लेयर की धरती ये कहाँ जानती थी कि इसी वीर सावरकर के नाम से हवाई अड्डा बनेगा और ये नाम हमेशा के लिये अमर हो जाएगा

जेल के प्रांगण में यहाँ आने वाले पर्यटकों की जानकारी के लिये रोज .३०बजे शाम एक लाईट एंड साउंड शो दिखाया जाता हैजिसमें बाईं तरफ उगे पेड़ की नजर से उस वक्त की आँखों देखी कहानी कही गई है , जो कि पुरी की आवाज में हैप्रस्तुति मार्मिक है , हमारी राष्ट्रीय धरोहर सेल्युलर जेल के निर्माण , ब्रिटिश राज और कैदियों पर सख्ती व् बर्बरता की कहानी के बारे में है

अण्डमान का कोना कोना खूबसूरत , जिस एंगल से भी फोटो खीचो , अदभुत ही होती है । इतनी खूबसूरत जगह और नाम दिया गया था काला पानीसच ही है अपने घर से दूर , अपनी धरती से दूर , जहाँ से कभी वापसी की उम्मीद ही न हो , जहाँ का नीला पानी कैदियों के लाल खून से काला नजर आता हो , उस जगह को और क्या नाम दिया जा सकता था

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मिटने वालों का , यही बस आखिरी निशाँ होगा

दूर दूर से आने वाले पर्यटक जब यहाँ इकट्ठा होते हैं तो किसी मेले से कम नहीं लगतामन जैसे द्रवित हो कर देश भक्ति से ओत प्रोत हो जाता है

बुधवार, 16 नवंबर 2011

हमारे विष्वास , हमारी आस्थाएँ हमें चलाती हैं ....




ज़िन्दगी को गति देने के लिये मन को कोई न कोई बात चाहिए होती है । हमारी परवरिश , माहौल , हमारे सम्पर्क में आने वाले लोग , हमारी प्रतिक्रियाएँ लगातार हमें गढ़ते जाते हैं । बचपन तो कच्ची मिट्टी की तरह होता है , कोई रँग डालो या किसी भी आकार में ढाल लो । मन के साफ़ सफ्हे पर कुछ भी लिखने की गुँजाइश रहती है , बहुत कुछ लिखा हो तो सब गड्ड मड्ड हो जाता है । अगर हर बात व्यवस्थित रखी हो तो मन तनाव रहित हो कर नये को ...हर गुजरते बदलाव को बड़े प्यार से स्वीकार कर लेता है ।




इक आशा की किरण झाड़ पर खड़ा कर देती है और इक छोटी सी निराशा ढहा देती है । मन कहाँ दुख में रहना चाहता है , फिर भी दुख का ही सौदा कर लेता है । मैं अपनी एक अजीज दोस्त के साथ मन्दिर में देवी जी के दर्शन करने गई , वहाँ पास की ही दुकानों से हमने नारियल व चढ़ावे की अन्य सामाग्री खरीदी । प्रशाद चढ़ाया , पहले पण्डित जी नारियल माँ को छुआ कर वापिस हमें दे दिया करते थे । इस बार उन्हों ने वापिस नहीं दिया और वहाँ पर कई सारे चढ़े हुए नारियल रखे हुए थे। मेरी दोस्त ने नारियल वापिस माँग लिया कि हम प्रशाद में चाहते हैं , मैंने भी माँग लिया । घर जा कर फोड़ने पर दोनों के नारियल खराब निकले । मेरी दोस्त ने फोन पर बताया कि शायद माँ ने मेरा नारियल स्वीकार नहीं किया । हम ऐसी बातों से भी परेशान हो जाते हैं , जबकि ऐसा समझ में आ रहा है कि पूरी संभावना है कि पण्डित जी चढ़ावे के नारियलों को वापिस पास की दुकानों में बेच देते होंगे । और वही नारियल रोटेट हो कर चढ़ रहे होंगे । बहुत पुराने होने पर खराब तो निकलेंगे ही । अब भगवान के बन्दे ही जब यही कुछ करेंगे तो आस्था कहाँ बची ? हमारे यहाँ जब मेड ने नारियल तोड़ा तो कहने लगी कि जब नारियल खराब निकलता है तो समझो कि भगवान ने स्वीकार कर लिया । मैंने अपनी दोस्त से कहा कि अब मन तगड़ा कर लो , हमारी कामना पूरी हो जायेगी । मन टके टके की बात में हिलने लग जाता है । मन को विष्वास का पानी चाहिए होता है बस । बिल्ली का रास्ता काटना , तेल गिरना , आँख फड़कना , ऐसे कितने ही शकुनों अपशकुनों में हमारे विष्वास जड़ पकड़ लेते हैं और हम डोलते ही रहते हैं ।




ब्रह्मा कुमारी सिस्टर शिवानी ने कहा कि हमारा विष्वास का ताना-बाना बिलकुल वैसा ही है जैसे कि कम्प्युटर पर प्रोग्राम का होना । जैसी प्रोग्रामिंग होती है वैसे ही हमारा सिस्टम ऑपरेट करता है । और अगर प्रोग्राम ही न किया गया हो तो फिर क्या काम करेंगे , आप जान ही न पायेंगे कि और क्या क्या काम हो सकता था । और उँगलियाँ चला चला कर यानि बेवजह टक्करें मार मार कर आप सिस्टम को ही क्रैश कर लेंगे ।




ये बहुत बड़ा सच है कि मन ही अगुआ है हमारी प्रवृत्तियों का । हमारे विचार ही एक सृष्टि रच लेते हैं , हर सम्भव बुराई को हर आयाम से देख लेते हैं । यहीं से हमारे विष्वासों और आस्थाओं का जन्म होना शुरू होता है । अब ये हमारी मर्जी होती है कि हम उस प्रबल विचार को कितना पानी पिलाते हैं या उसको महज़ गुजरता हुआ देखते हैं और अपनी स्वयम की अडोल स्थिति को कायम रखते हैं ।




आस्था विष्वास ...मानवता को बल देने वाले होने चाहियें । जैसा कि श्री श्री रवि शंकर जी भी कहते हैं कि हम स्वयम एक बड़ी ताकत हैं तो किसी भी नकारात्मकता का हम पर असर क्यों पडेगा ; पर इसे महसूस किये बिना हम जान नहीं पायेंगे । सारी मैली विद्याएँ उस आदमी के लिये बेअसर हैं जो अपनी ऊर्जा को भगवान से जुड़ी पाता है । सिर्फ यही रास्ता है जो हमारे अंतर्मन को शांत स्थिति में रख सकता है , आनन्द की अनुभूति दे सकता हैआस्था , विष्वास पालो तो ऐसा पालो , ऐसा नहीं कि ज़र्रे ज़र्रे में तिनके की तरह हिलते रहो

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कुछ नमूने ये भी

शैलजा बरामदे में बैठी अपनी बेटी की फ्रॉक सिल रही थी , माँ जी-पिता जी आज किसी को मिलने चले गए थे और बेटी स्कूल गई थी । बाहर खुला अहाता था , कुछ पेड़-पौधे उगे हुए थे और सड़क की ओर आठ दस खुली सीढ़ियाँ चढ़ कर घर तक पहुंचा जा सकता था । एक आठ दस साल का लड़का ऊपर चढ़ आया और अपने झोले से एक पिताम्बरी का पैकेट निकाल कर , उस पाउडर को हाथ में लेकर शैलजा के हाथों में पहने हुए कंगनों की तरफ इशारा करके कहने लगा ....आंटी जी ये पैकेट खरीद लो इससे चूड़ी चमक जायेंगी । शैलजा के मना करने पर भी कई बार मिन्नत कर के कहने लगा कि मैं लगा के दिखाता हूँ , उसका कोई पैसा नहीं लगेगा । बस हाथों में पहने हुए कंगनों पर ही उसने वो पाउडर लगा दिया । अब कंगनों को उतारना जरुरी हो गया । उस बच्चे ने पाउडर को कंगनों के ऊपर रगड़ना शुरू किया , कंगन अजीब लाल लाल से हो गए । अब पांच -सात मिनट बाद ही २२, २४ साल के दो और युवक ऊपर चढ़ आए , ये दोनों भी इस लड़के के साथी थे । बस अब शैलजा को लगा वो इन के काबू में आ गई है , कैसे पीछा छुड़ाया जाए । पड़ोस वाले घर से आवाज लगा कर आंटी और उनकी बेटी को बुलाया । इन लोगों ने अब कंगन धोने के लिये पानी माँगा । जितना सोना उतार सके होंगे उतार लिया होगा । कंगन चमके भी नहीं , हाँ दो चार दिन बाद कंगन टेढ़े -मेढ़े हो गए । नुक्सान कर बैठने और ठगे जाने का दर्द बहुत समय तक शैलजा पर हावी रहा ।
लखनऊ में अक्सर सेल्स गर्ल्ज और सेल्स मैनज नकली सामान बाज़ार से कम कीमत पर घरों में बेच जाते थे । दो चार बार धोखा खाने के बाद नीमा ने सोचा , घंटी बजते ही इन लोगों को सीधा मना कर देना है । फिर एक दिन घंटी बजी , एक सेल्स मैन दो लाइटर और एक चाकू का पैकेट उठाए खडा था , कहने लगा ....११० रूपये में है कम्पनी की स्कीम में है , आपका नाम लिख लिया है , बारह लोगों को कम्पनी ने लिस्ट में रखा है , मैं खुद इसी महीने की तेरह तारीख को एक प्लास्टिक का फ़िल्टर आपके पास पहुंचा कर जाऊँगा । एक बार तो नीमा ने सोचा कि पड़ोसियों की घंटी बजा कर सलाह ले लूँ , फिर सोचा दोपहर का वक्त है , गर्मी में तंग न करूँ । एक लाइटर की कीमत कम से कम ६० रूपये तो होगी ही , घाटे का सौदा नहीं है , खरीद लिये । मगर ये क्या लुभावनी पैकिंग वाला लाइटर महीना डेढ़ महीना मुश्किल से चला । चाकू भी पतले टिन का निकला , और फ़िल्टर तो कभी पहुंचा ही नहीं । बाद में नीमा को पता चला कि लाइटर तो दस दस रूपये में भी बिकते हैं ।
रश्मि ने दरवाजा खोला , एक युवक गुरुद्वारे के लंगर के लिये दान राशि एकत्र करने के लिये कह रहा था । वाहेगुरु में अगाध श्रद्धा होने की वजह से और दरवाजे पर आए को खाली न मोडूँ ... सोचते हुए रश्मि ने कुछ रूपये दे दिए । अब इस युवक ने कहना शुरू किया ..वाहे गुरु आपके सब दुःख दूर कर देगा , आपका प्रोमोशन होने वाला है ...सुखमनी का पाठ करवाओ , लंगर कराओ , ११०० रूपये का खर्चा होगा । इस तरह के लोग सामने वाले को अच्छी तरह पढ़ लेते हैं , फिर कमजोर रग पर हाथ रख कर फायदा उठाना चाहते हैं । इस युवक को टरकाने में रश्मि को बड़ा दम लगाना पड़ा । गुरूद्वारे मंदिर आदि धर्म-स्थलों के लोग कभी मांगने नहीं जाते , उन के नाम से कुछ लोग अपना उल्लू साधते हैं ।
निम्मी , रीमा अपनी माँ के साथ घर में ही थीं । घंटी बजी , रीमा ने दरवाजा खोला । दो आदमी हाथ में काला बैग लिये और एक विजिटिंग कार्ड लिये ...दिखाते हुए बोले , हम गैस ऑफिस से आए हैं , चेक करने आए हैं गैस की लीकेज वगैरह । जब तक रीमा मुड़ कर मम्मी से पूछने पहुंची : उनमे से एक आदमी पीछे पीछे ड्राइंग रूम पार कर के किचन के पास आ खडा हुआ । अब लगा कि अगर आदमी जेनुइन है तो देख ले , दिखाने में क्या जा रहा है , मगर गैस की तो कोई समस्या है ही नहीं । इस आदमी ने सख्त लहजे में कहा ...आप लोग रेग्युलेटर बंद नहीं रखते हो । फिर रेग्युलेटर बंद किया , गैस का पाइप बर्नर की साइड घुमाते हुए कहने लगा कि लीक हो रही है ...पाइप ढीला है ..और फिर पाइप को चूल्हे से अलग कर दिया । फिर बोला चाकू लाओ , चाकू से काटने लगा । ये पाइप काटने वाला था ही नहीं क्योंकि उसमें अन्दर से स्टील की लेयर लगी होती है । ये बात वो भी जानता था , क्योंकि फिर उसने अपना ग्रीन पाइप निकाल कर दिखाया कि देखो ये तो कट जाता है । अब माँ को समझ आने लगा कि ये आदमी या तो अपना पाइप बेचने के इरादे से आया है या किसी और उद्देश्य से । बेटियों ने तो पहले ही उसकी नेक नीयती समझ ली थी और माँ को इशारे से समझा रहीं थीं कि उसे किसी भी तरह घर से बाहर करो । माँ किचन से बाहर आ गईं और कहने लगी ....अगर आप पाइप बेचते हैं तो उसकी कीमत बताइये , बाहर आइये और अपना विजिटिंग कार्ड दिखाइए । किसी तरह दरवाजे तक बुला कर , घर से बाहर किया । एक बड़ा आम सा फोटो वाला विजिटिंग कार्ड लैमिनेट करा कर ये दुनिया को ठगने निकले थे । ऐसे लोगों की वजह से ही आज जन गणना करने वालों या किसी भी तरह का सर्वे करने वालों को लोग सहयोग नहीं करते ।
बार बार धोखा खाने के बाद भी मन इतना भोला और आस्थावान होता है ये तो किसी तगड़े धोखे के बाद ही समझ आता है । रश्मि ए.टी.एम से दो हजार रूपये निकाल कर बाहर निकली ही थी कि सामने एक आदमी एक नाग टोकरी में रख कर खडा था ...तेरे सारे काम बन जायेंगे , बेटी , सोमवार का दिन है , नाग देवता आशीष देगा । रश्मि सोमवार का व्रत रखती थी , झट से जितनी चेंज पर्स में थी व् एक दस रूपये का नोट , उसको दे दिया । अब इस आदमी ने पर्स में दो करारे नोट हजार हजार के देख लिए थे । बोला कि अपने नोट नाग देवता को छुआ दो , तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जायेंगे । जाने क्या हुआ कि जैसे ही नोट छुआए गए , नाग वाले ने नोट सर्र से नाग को निगलवा दिए ...अब ? रश्मि कहे कि मेरे नोट निकालो ; सांप वाला कहे ..वो तो इसने क़ुबूल लिए हैं , अब सब भला होगा । रश्मि को लगा ..वो तो ठगी गई है , जोर जबरदस्ती करती है तो ये नाग वाला नाग से कटवा भी सकता है ...नाग तो इसका शस्त्र है ...इतना वक्त नहीं है कि चिल्ला कर लोगों को इक्कट्ठा किया जा सके ...ऑफिस के लिए देर हो रही है । तनी हुईं दिमाग की नसें और कुछ न कर पा सकने की मजबूरी की मानसिक यंत्रणा लिए वो इतना ही बोल पाई ...बाबा इसका फल तुम्हें अच्छा नहीं मिलेगा । ऑफिस में जा कर साथियों से बात की तो पता चला कि किसी एक के साथ और ऐसा ही घटा था , मगर वो भीड़ वाली जगह था तो उसने शोर मचा कर लोग इकठ्ठा कर लिए थे तो सांप वाले ने मुड़े तुड़े नोट नाग से उगलवा कर वापिस दिए थे । अब इसे क्या कहेंगे , लोगों ने आस्था को भी भुनाना शुरू कर दिया है । सबकी नजर आपकी जेब पर है , किस तरह और कितनी चालाकी से खाली कराई जाए । सारे दुःख दूर करने की बात करते हैं , क्योंकि जानते हैं कि कोई अपने आपको सुखी समझता ही नहीं है ...मन जब तक हिलता रहेगा , दुःख का भान कराता रहेगा । दुःख तो कहीं होता ही नहीं , हमारा मन ही उसे पैदा किये रखता है ..लोगों ने इस से फायदा उठाने में भी रोजगार तलाश लिया है ...अपना तापमान नियंत्रित होगा तभी दूसरे के क्रिया-कलापों के पीछे छिपे उसके उद्देश्य को पढ़ सकेंगे ...मन का भोलापन एक न्यामत होता है , मगर हमारे अनुभव हमें सिखाते हैं ...कि जब कोई इसका नाजायज फायदा उठाने लगे तो अपना बचाव भी करें ...सुरक्षा हमेशा निदान से बेहतर होती है ...।