गुरुवार, 20 अगस्त 2026

शुक्र ग्रह

 क्या शुक्र ग्रह ही आदमी को चलाता है ? शुक्र देवताओं का आचार्य कहलाता है । प्रेम , सुन्दरता, कला और काम का प्रतीक इसे ही माना जाता है ।कुण्डली में ये किस भाव में , किस राशि में , किस भाव का स्वामी है ,किस ग्रह से युति और किस किस ग्रह से दृष्टि सम्बन्ध बनाये हुए है , इस से ही आपका चरित्र तय होता है , यानि शुक्र का स्वभाव दूसरे ग्रहों के प्रभाव से तय होता है ।गुरु के प्रभाव से संबंधों में ईमानदार , विवेकपूर्ण निर्णय लेने वाला , नैतिक मूल्यों वाला देवता समान होता है । शनि के साथ प्रभुत्व जमाने वाला , अंदर-अंदर नाराज़गी पालने वाला , रिश्ते निभाने वाला और राहु के साथ कटु बोलने वाला , भ्रम पालने वाला होता है । केतु के साथ विरक्ति भाव वाला हो जाता है ।बुध वाला तार्किक ,सोच समझ के रिश्ते बनाता है ।चंद्र के साथ खूबसूरत संबंध मगर अतिसंवेदनशील ,कल्पना लोक में रहने वाला होता है । सूर्य के साथ तो अग्नि ही भर देता है , गर्म प्रकृति वाला हो जाता है । सबसे ज़्यादा तंग मँगल के साथ करता है , मंगल के साथ ऊर्जा से भरा हुआ , चाहिए तो किसी भी क़ीमत पर चाहिए ।मंगल ग्रह से युति के साथ अगर गुरु या बुध से कोई भी संबंध न हो तो चरित्रहीनता की तरफ़ ले जाता है । शुक्र अगर अशुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो अपराध तक करवा डालता है ।


अपनी ज़िंदगियों पर ध्यान दें और सच बोलें तो पाएंगे कि ये खिंचाव चुम्बक की तरह हमें चला रहा होता है , हर सुबह की ऊर्जा , साथी से प्रेम यही तो भरता है । शुक्र को प्रेम भी कह सकते हैं, प्रेम ही तो हमारे हर कृत्य की जड़ में है  ,प्रेरणा में है। शक्ल की ख़ूबसूरती , संबंधों की ख़ूबसूरती , हर और कलात्मकता , रचनात्मकता यही तो लाता है। शुक्र अगर अच्छा हो तो आदमी कला जगत में बहुत नाम भी कमाता है । 


शुक्र अगर बिगड़ जाए तो चेहरा निस्तेज , जीवन निस्तेज हो जाता है ।शुक्र साधा तो सब साध लिया । शुक्र तो चुम्बक है।तो क्या हमारी ज़िन्दगी शुक्र के सहारे चल रही है ? अगर लोगों के चेहरे के नक़ाब उतार दिए जाएँ तो कितनी ही दबी-ढकी कहानियाँ उजागर हो जायें यानि वे सारे भी शुक्र के कारनामे हैं ।आदमी चाह कर भी अनदेखी नहीं कर पाता । आदमी तो शुक्राचार्य की कठपुतली हो गया एक ही तरीका है कि शुक्र को अच्छा करने का , इसे प्रेम , विश्वसनीयता , कलात्मकता , रचनात्मकता और ईमानदारी से जोड़ लें ।कोई भी सेंध लगा न सके । 

इसे मर्यादा में रखा जाए , सोच विचार कर अमर्यादित विचार पर ही अंकुश लगाया जाए। हमारी आज , अभी की सोच अगले पल की किस्मत लिखती है , भविष्य लिखती है । तो हमारी कुंडली में लिखे हुए ग्रहों का फल भी बदलना मुमकिन है ।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

रिश्ते पनपते हैं या आख़िरी साँसे गिन रहे होते हैं

 सामंजस्य या सुधार के लिए या समझौते के लिए साथ रहने वाले ये अच्छी तरह जान लें  कि रिश्तों में साथ की चाह , पसंद या प्यार जरूरी है तभी आप दूसरे को  बर्दाश्त कर पाते हैं वरना रिश्ता मरने लगता है। अगर आप समझते हैं कि बच्चे के लिए या समाज और परिवार के दबाव के लिए आप रिश्ता बर्दाश्त कर रहे हैं तो ये वक्त और अपनी क़ीमती ज़िन्दगी को बर्बाद करना है। आप जब तक किसी को दिल से क़ुबूल नहीं करते तब तक सहज नार्मल रिश्ते में नहीं रह सकते ।या फिर आप में इतनी कला हो कि आप ख़ुद से विरक्त हो कर भी सब ख़ुशी-ख़ुशी निभा सकते हैं । 


पति-पत्नी का एक अकेला ऐसा रिश्ता है जो कितने ही मनमुटाव हों जिसे बिस्तर पर का सहज साथ पल भर में मिटा देता है ।एक विश्वास हर असहमति पर भारी पड़ता है । औरत जिस दिन वफ़ा का विश्वास खो देती है उसी दिन आदमी उसकी नजर तो क्या उसके दिल से भी उतर जाता है । 


कहते हैं आदमी के दिल का रास्ता उसके पेट से हो कर जाता है  यानि खाने में उसकी पसंद का ख़्याल रखा जाये तो वो खुश रहता है । सबको साथी की पसंद-नापसंद का ख़्याल तो रखना ही चाहिए फिर चाहे वो खाना हो ,पहनना-ओढ़ना हो ,या स्पेस हो । दूसरे का ख्याल रखने के लिए भी तो हम ख़ुद को बदलते ही हैं ; और ये तभी संभव है जब प्रेम की कोई डोर हमारे बीच हो । तभी मुश्किलें भी आसान लगती हैं । कहते हैं कि बाँटा हुआ दुख आधा हो जाता है और बाँटा हुआ सुख दुगना ।


नियम कायदे क़ानून अपने लिए बनाइये दूसरों के लिए नहीं । इतना लचीला रहिए कि दूसरों को उनकी खामियों के साथ स्वीकार कीजिए , यही प्यार है ।


ये परिवार और समाज की व्यवस्था ही आदमी को घर में संतुष्ट रखती है ।अफ़सोस भी है और फ़ख़्र भी कि औरत की समझदारी से ही पति ख़ुश और परिवार जुड़ा रहता है ।जो घर में ख़ुश है उसका व्यक्तित्व खिला हुआ रहता है । बाहरी दुनिया का ग़ुस्सा भी पुरुष निकालता तो घर आ कर ही है , जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए , साथी से परेशानी बाँट लेनी चाहिए । व्यक्तित्व विकास भी तभी संभव है जब आप अपनी ऊर्जा को झमेलों में व्यर्थ न कर के साथी के साथ मिल कर सही दिशा देते हैं।


इस गलतफहमी में मत रहें कि बोझिल रिश्ता एक दिन ठीक हो जायेगा।हो सकता है रिश्ता आख़िरी साँसें ले रहा हो ।अगर प्यार या पसंद या विश्वास का धागा बीच में नहीं है तो एक पौधे की तरह रिश्ता दिन-ब-दिन मरता जाता है। इस पौधे को वही पानी चाहिए तभी ये फल-फूल सकेगा । रिश्ते मरते हैं या पनपते हैं।अगर एक भी कारण है ,रिश्ते को बनाये रखना चाहते हैं तो समय रहते प्रयत्न करिए , रिवाइव करिए , छोटी-छोटी ख़ुशियाँ पैदा कीजिए और सहज सरल स्वीकार भाव रखिए ।कोई अकेला नहीं जी सका है , कुदरत ने जो आपको बख्शा है उसे सम्भालिए ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

इतना कड़ा फैसला

 सारी रात आँखों के आगे से उन दोनों के चेहरे हटे ही नहीं ।मन ने कितने ही सवाल कर डाले ।क्यों वो इतना हार गई कि ज़िन्दगी ही वार दी ।तीन साल पहले किसी मौक़े पर देखा था ।तब उसका बेटा आठ साल का था ।वो उस खूबसूरत बच्चे की बाँह कस के पकड़ी थी मगर वो इधर-उधर भागने की फिराक में था ।किसी की भी प्लेट से खाना उठा कर खा रहा था ।माँ की ये कोशिश कि वो उसे अपने साथ रखे और कुछ ऐसा-वैसा न हो , इज्जत बची रहे ।मगर क्या स्पेशल बच्चे किसी की भी नजर से छुपते हैं ।नजर और मन वहीं रुक जाते हैं  जहाँ कुछ अलग है ।


जब वो पैदा हुआ तो बोला ही नहीं , जल्दी ही पता लग गया कि वो जन्मजात न बोल पाने और न समझ पाने की अपंगता के साथ इस दुनिया में आया है ।न जाने कलेजे पर कितने पत्थर रखे होंगे ।और फिर सिलसिला शुरू हुआ डॉक्टर्स और धार्मिक स्थलों के चक्कर लगाने का मगर कोई फ़र्क पड़ा ही नहीं ।वो इंजीनियर थी जॉब छोड़नी पड़ी , बच्चे की चौबीस घंटे देखभाल के लिए जरूरी हो गया था।दीन-दुनिया तो उसने भुला ही दी थी ।पिछले दो-चार दिन पहले ही वो पंजाब के किसी डॉक्टर से दवाइयां ले कर लौटे थे।अब वो ग्यारह साल का मगर सोलह साल की शारीरिक गठन वाला हो गया था ।उसे संभालना मुश्किल होता जा रहा था , उसकी सक्रियता काबू में रखने लायक थी ही नहीं ;फिर समाज से भी थोड़ी दूरी बना कर चलना , घर पर ही ट्यूशन पढ़ाने के लिए किसी को रखा हुआ था ।दिल की दिल में ही रही , और फिर उम्मीद की आखिरी किरण भी मुरझा गई ।जब सुबह अँधेरे से शुरू हो कर अँधेरे पर ही ख़त्म होती हो तो शायद इन्सान हार जाता है ।ऐसे ही कमजोर पलों में शायद उसने इतना कठोर फैसला ले लिया , उसने एक नोट छोड़ा कि वो अपनी मर्जी से जा रहे हैं , इसका कोई जिम्मेदार नहीं ।इस तरह उसने अपने पति के लिए मुश्किलें कुछ आसान कर दीं । कितने ही सवाल उठ रहे हैं कि क्या कोई हल नहीं था , उनके लिए कोई छाँव न थी ।


कोई नहीं जानता कि कैसी-कैसी मनःस्थिति से गुजरी होगी वो।कितने सपने सँजोता है इंसान , जॉब ,शादी ,बच्चा और ये हश्र …..आँखों के आगे बस एक रील की तरह गुज़र जाता है ।माँ थी वो ; चौबीस घंटे जिसे नज़रों के सामने रखती थी ,उसके लिए दुनिया से लड़ सकती थी मगर अपने ही अंतर्मन में चलते युद्ध से हार गई।वर्तमान तो दुखद था ही भविष्य भी अंधकार-मय था।न जाने मन कितना छलनी था।


जन्मजात स्पेशल बच्चे या यूँ कहो कि जेनेटिक बीमारियों के साथ पैदा हुए बच्चे का पूरी तरह ठीक होना लगभग नामुमकिन ही होता है।इस सच को स्वीकार करना भी उसके अपनों के लिए बहुत मुश्किल होता है।मन लगातार लड़ता है ,उम्मीद करना चाहता है चमत्कार की भी।क्यों न माँ-बाप इसको इस तरह मान लें कि इस बच्चे को कहीं तो पैदा होना था , ये भगवान का बच्चा है और हमें ये अवसर मिला है कि हम उसकी देखभाल करें और उसकी राह आसान ,सुरक्षित और आरामदायक बनायें ।हम ख़ुद को सौभाग्यशाली समझें कि ईश्वर के काम में योगदान दे रहे हैं या फिर ये सोचें कि बच्चा भाग्यशाली है कि उसे आप जैसे पेरेंट्स मिले हैं ।ज़िंदगी तो वैसे भी होम होनी ही होती है , किसी की भी ज़िंदगी आसानियों से भरी नहीं होती ।ये सोच रखना आसान तो नहीं है मगर यही रास्ता वस्तुस्थिति से डिटैचमेंट का भी है और ख़ुद को एक महान उद्देश्य दे कर जी लेने का भी ,साथ ही वास्त्विकता को स्वीकार भाव देने का भी।मगर ये समझ खुलती सिर्फ़ आध्यात्मिकता के पथ पर है।इसके साथ ही ये भी जान लेना चाहिए कि वो आपकी ज़िम्मेदारी ज़रूर है मगर आपको ख़ुद पर भी वक्त देना है अपना अन्तर्मन मजबूत बनाना है , दुनिया वहीं तक सिमट नहीं जानी चाहिए।और मजबूत मन ही तो बच्चे को सही देखभाल दे सकेगा , वरना ख़ुद को भी संभालना मुश्किल हो जाएगा ।समाज को भी इसे स्वीकार करने की जरूरत है ।सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखने की जरूरत है । कोई नहीं जानता कौन किस परिस्थिति में जी रहा है और कितना उदास है ; हम सबको जागरूक रहना चाहिए ।हमारा थोड़ा सा आगे बढ़ाया हुआ हाथ उसका बहुत बड़ा सम्बल हो सकता है।

रविवार, 14 सितंबर 2025

रोया होगा पहला कवि

 ये तय है कि कवि मन एक दिन तो जरूर रोया होगा , तभी जा कर संवेदन-शील मन ने कुछ पंक्तियाँ रची होंगी । कवि हृदय शापित हृदय ही तो होता है , पिघलते हुए अहसास जब लाइलाज हो जाते हैं तो लावे की तरह बह निकलते हैं ।ये अंगारे हमारे ढाँचे को ध्वस्त भी कर सकते थे ; मगर अचानक ये क्या होता है कि सारा लावा गीत नज़्मों में ढलने लगता है ।शापित हृदय हो कर भी कवि अपने उदगारों को दिशा देता है , साथ ही अपने जीवन को एक उद्देश्य दे लेता है ।जो न जाने कितनी मौतें मर कर जिया हो वो मिलन , श्रृंगार , बहार , ख़ुशी के रंगों की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति भी उतनी ही संजीदगी से कर सकता है ।

रोया होगा पहला कवि भी 

आह से निकला होगा गान 


क्रंदन मन की गाथा है 

अपने-अपने हिस्से आई , थोड़ी कम कुछ ज़्यादा है 


लरजते लफ्ज़ों ने पकड़ी होगी जब स्याही 

भँवर समेटे दिल ने तब 

तिनके का ही सहारा ले कर 

उँड़ेली होगी अपनी व्यथा


पीड़ा भी सार्थक होती 

जन-जन का मन झंकृत होता 

उपजे गर जो मधुर मनोहर गान 







सोमवार, 28 जुलाई 2025

रावी पार जाने वाली बेटियाँ

 हीरें भी कैसे-कैसे भरम पाल लिया करती हैं कि उनका महबूब राँझा ही होगा ।आदमी मुहब्बतें भी वक्ती जरूरतों की तरह तय करता है और जरूरतें तो वक्त के साथ बदल जाया करती हैं ।हीर कहती मेरी वफ़ा तो मर कर तय होती , उसकी बेवफ़ाई ने रोज मर-मर के जीने के लिए छोड़ दिया ।ऐ ज़िन्दगी, तुम भी सहरा से शुरू कर के सहरा पर ही ले आती हो ।

ये कौन कदमों के नीचे अंगारे रख जाया करता है वरना चलना तो सब फूलों पर ही चाहते हैं । सात जन्मों तक साथ चलने की बातें करते थे , कहाँ तो एक जनम भी दिल से साथ तय न था ।वो कोई और ही जमीं होती होगी , कोई और ही वतन होता होगा । ज़न्नत ज़रूर इसी धरती पर उतर आती बस उसकी आँखों में नमी नहीं थी ।

वे ज़िंद-जाँ वार दित्ती, तूँ समझेआ ना 

किस थाँ जाँवा, मेरे लई ते हुण वा कोई ना 


रावी पार जाण वालियाँ धीयाँ 

निक्खड़ियाँ मापेयाँ तों 

अम्बरा ने बाँ ना फड़ी

तलियाँ थल्ले थाँ कोई ना 


राँझे मुक्क गये दुनिया तों 

हीराँ दी क़िस्मत माड़ी 

बदनाम होया ऐ वी रिश्ता 

प्रीत निगोड़ी दा नाँ कोई ना 


वे ज़िन्द-जाँ वार दित्ती, तूँ मुड़या ना 

मेरे वेड़े धुप्प ही धुप्प ,तेरे नेड़े छाँ कोई ना 


इसी गीत का हिंदी अनुवाद ….


दिलों-जाँ वार दी , तू समझा ही नहीं 

किधर जाऊँ , मेरा तो कोई हाल ही नहीं 


रावी पार जाने वाली बेटियाँ 

बिछुड़ीं माँ-बाप से 

आसमाँ ने बाँह न थामी 

तलुवों नीचे जमीं ही नहीं 


राँझें ख़त्म हुए दुनिया से 

हीरों की क़िस्मत है बुरी 

बदनाम हुआ ये रिश्ता भी 

प्रीत निगोड़ी का नाम ही नहीं 


दिलों-जाँ वार दी , तू समझा ही नहीं 

मेरे अँगना धूप ही धूप , तेरे अँगना छाँव ही नहीं 



रविवार, 1 जून 2025

प्यार नाम की चिड़िया

 क्या है प्यार ? आज का युवा ढूँढ रहा है सच्चा प्यार , जो मिल के नहीं मिलता ।बाहरी अट्रैक्शन , क्वालिफिकेशन या रहन-सहन जब आकर्षित करते हैं तो इसे प्यार समझ लिया जाता है ।अपरिपक्व उम्र में परिपक्व प्यार कैसे होगा ! थोड़ी सी मुलाकातों के बाद ही पोल खुलने लगती है । हर किसी की ईगो , सुपीरियारिटी काम्प्लेक्स , उम्मीदें और रिजिडिटी व्यवहार में नजर आने लगती है और फिर प्यार नाम की चिड़िया फुर्र हो जाती है ।अब एक-दूसरे को बर्दाश्त करना तक मुश्किल हो जाता है ।

जबकि ये सच्चाई है कि दो अलग-अलग परिवेश से आए हुए लोग ,अलग-अलग व्यक्तित्व समान हो ही नहीं सकते ।प्यार तो नाम ही ख़ुशी-ख़ुशी बर्दाश्त करने को कहते हैं ।सुधारना भी है तो प्यार से अपनी बात समझायें ।जैसे पेरेंट्स अपने बच्चों को समझाते हैं मगर प्यार कहीं कम नहीं होता ।प्यार का मतलब ही उसका भला चाहना है ।इसीलिए प्यार को वन वे ट्रैफिक कहा जाता है । ये भी कहा जाता है कि आप शादी उस से करो जो तुम्हें चाहता है ; उस से नहीं जिसे सिर्फ तुम चाहते हो और वो नहीं ।इसलिए कि उसके दिल में एक नाजुक कोना तुम्हारे नाम का हमेशा रहेगा ।उसके पास एक कारण हमेशा रहेगा रिश्ता बनाये रखने का ।ये भी कहते हैं कि किसी अनजान आदमी से शादी करने से अच्छा है किसी दोस्त से शादी कर लो , वो तुम्हे अच्छे से जानता होगा ।

प्यार है तो भावनाओं का वेग ही , इसे दिशा दी जा सकती है ।आपका भाव आपकी आँखों से टपकता है ।किसी में भी सुर्खाब के पर नहीं लगे होते । इसलिए ख़ुद को भी इतना भाव न दें कि दूसरे की ज़िन्दगी के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएँ ।जो व्यवहार आप साथी से अपने लिए चाहते हैं , वही आप उसके साथ करें ।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

हैकर्स से सावधान रहिए

आजकल स्कैम के नये-नये ढंग प्रचलित हो गए हैं ।बाज़ार तो आपको ठगने के लिये पहले ही बैठा था ; वो क्या कम था जो अब ऑनलाइन स्कैम करते हुए ठगी शुरू हो गई ।ख़रीद-फ़रोख़्त ,ए.टी.एम., नक़ली बैंक कॉल्स और अब पहचान छिपा कर आपके इमोशंस के साथ खिलवाड़ करते हुए ब्लैकमेलिंग ।

टेक्निकल जानकारी के अभाव में या कहिए कि अगर आप अतिरिक्त सावधान नहीं रहते तो ये ठग या शिकारी आपको निशाना बना सकते हैं ।ये तो ढूँढ ही रहे होते हैं कि कौन कमजोर टारगेट किया जाये ।बड़ी चतुराई से से नये-नये तरीक़े निकालते हैं जैसे कहेंगे कि आपकी बिजली का बिल जमा नहीं हुआ है , अमुक तारीख़ तक आपकी बिजली कट जाएगी , जल्दी पैसे भरिए , आप अगर कहेंगे हमने भर दिया था तो ये कहेंगे कि अपडेट नहीं हुआ बिल ।आप अपने फ़ोन पर चेक करने जाएँगे , आपका अकाउंट खुलते ही उनके सामने आपके सारे डीटेल्स खुल जाते हैं , वो फ़ौरन आपका सारा जमा पैसा विद्ड्रा करने की कोशिश करते हैं ।कभी तो घबरा कर आप ख़ुद  ही उनके नम्बर पर पैसे भेज देते हैं ।यहाँ तक कि ये ठग आपके किसी रिश्तेदार की आवाज़ में आपसे बात करके किसी की बीमारी या कोई और किसी भी तरह की मजबूरी बता कर पैसे जमा कराने को कहेंगे ।आजकल वॉइस क्लोनिंग भी होने लगी है । इसलिए कभी भी किसी अपरिचित संदेश या नंबर से आई कॉल पर एकदम से यक़ीन न करें ।सिक्के का दूसरा पहलू भी देखें । 

पिछले दिनों तो एक पढ़ी-लिखी लड़की को इक्कीस दिनों तक डिजिटली लॉक रखने का मामला प्रकाश में आया था । आपके नाम से कोई इल्लीगल पैकेट पकड़ा गया है , डराते-धमकाते हैं कि पैसे भरिए ।आपके किसी रिश्तेदार की पिटाई या पुलिस केस की बात करेंगे ।यहाँ तक कि पुलिस का सेट अप भी बना कर रखते हैं ।पूरी तैयारियाँ की होती हैं इन लोगों ने अपने इस इल्लीगल धन्धे के लिए ।

कितनी ही नक़ली साइट्स कुक्कुरमुत्तों की तरह  उग आईं हैं ।इनमें शॉपिंग वाली साइट्स भी हैं और प्रचलित साइट्स के लिए कस्टमर केयर वाली साइट्स भी हैं ।पासपोर्ट लॉगिन के लिए भी नक़ली साइट्स हैं । आप अगर नक़ली साइट्स पर पहुँच जाते हैं तो ये आपका पैसा रिफ़ंड कराने के नाम पर आपका अकाउण्ट नंबर जानने की कोशिश करेंगे ।समय रहते सावधान हो जाइए ।

हैकर्स नक़ली पहचान , नक़ली चेहरे और नाम के साथ ग्रुप्स जॉइन करते हैं । फिर आपको दोस्ती की रिक्वेस्ट भेजते हैं ।आपके बारे में बात करके आपकी कमजोर नस जानने की कोशिश करते हैं । फिर फ़ोन नंबर शेयर करते हैं ।कॉन्फ़िडेंस में लेते हैं और एक दिन खेल खेल जाते हैं ।अभी कुछ सालों से ये लोग सेक्स स्कैम कर रहे हैं ।आपके दोस्त बन कर वाट्स एप पर वीडियो रिकॉर्ड करेंगे ।ये वीडियो किसी लेवल का भी हो सकता है यानि जितना आप इमोशनल फूल बने या जितना आप उसके झाँसे में आये । वीडियो कॉल के दूसरी तरफ़ एक दिमाग़ नहीं , कम से कम दो से चार की संख्या तक मेल , फ़ीमेल्स हो सकते हैं ।इनका अगला कदम होता है वीडियो को वायरल करने की धमकी देते हुए आपका बैंक बैलेंस ख़ाली करना ।इनके पास नक़ली इंस्पेक्टर भी होंगे । यहाँ जो डर गया वो मर गया ।क्योंकि आप सामाजिक डर से न तो इनकी शिकायत दर्ज करवा पाते हैं और न ही कोई और एक्शन ले पाते हैं । ऊपर से ये लोग हैं ही फर्जी नाम , पते , नम्बर और चेहरे के साथ ।कमजोर मन और कमजोर चरित्र का युवा या सीनियर कोई भी इनका शिकार हो सकता है ।ये सनक तो बहुत महँगी पड़ सकती है ।सारी युवा पीढ़ी फ़ेसबुक छोड़ चुकी है ; इनस्टा , थ्रेड वग़ैरह दूसरे ऐप्स पर जा रही है ।क्योंकि इस पर अब अधेड़ शौक़ फ़रमा रहे हैं ।इसलिए सोच समझ कर और पारखी नज़र रखते हुए दोस्त बनाइए ।किसी भी अपरिचित को अपनी लिस्ट में शामिल मत करिए भले ही आपकी हॉबीज़ मिलती हों ।

शालीनता के साथ ज़िन्दगी जियें ।जिस बात पर किसी से भी नज़र चुरानी पड़े उसे कर के क्या फ़ायदा ।कहते हैं भगवान हर जगह मौजूद है ; आज गूगल बाबा हर जगह देख रहा है , आप क्या साइट्स देख रहे हैं , इसे बखूबी मालूम है । जरा सोचिए ,क्यों आपके सामने वैसे ही वीडियोज़ या रील्स प्रस्तुत होने लगते हैं जैसे लिंक्स आप एक बार खोल लेते हैं ।ये मत समझिए कि आप अपनी सर्च हिस्ट्री डिलीट कर लेते हैं तो अब किसी को पता नहीं चलेगा ।आपका हर एक्ट कहीं मैमोरी में रेकॉर्ड हो रहा है ; इसलिए आप लाख चाहें इसकी नज़र से बच नहीं सकते ।

हैकर्स से बचने के लिए कहीं भी अपने बैंक एकाउंट्स की जानकारी शेयर मत कीजिए , OTP मत बताइए , सर्वसुलभ मत होइए ।दूसरों को दोष देने से पहले ख़ुद को सुरक्षित साइड रखिए ।हैकर्स द्वारा टेक्नोलॉजी का ये इस्तेमाल तो विध्वसंक है ।ग़लत तरीक़ा ग़लत ही होता है । बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी ।

रविवार, 13 नवंबर 2022

सासों या ससुराल पक्ष के लिये

 बहू और सास-ससुर या ससुराल पक्ष के बीच ख़ट-पट अक्सर सुनते आये हैं ।पहले वक्त और था जब बहुएँ काम-काजी नहीं थीं ;आज वो पति के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही हैं । आप उन्हें चूल्हे-चक्की यानि गृहस्थी तक सीमित नहीं कर सकते ।वक़्त बहुत बदल चुका है , आज के बच्चों को एक दूसरे को समझने के लिये , साथ वक़्त बिताने के लिये प्राईवेसी भी चाहिये ।आप खाम-खाँ बीच में टाँग अड़ाये हुए हैं ।

बहू को बेटी ही समझें ।जो उम्मीदें आप बेटी के ससुराल वालों से रखते हैं , खुद भी इन पर पूरा उतरें । धीरे-धीरे नये रिश्ते भी सहज होने लगते हैं ।उम्मीद बिल्कुल न रखें , सिर्फ़ अपने कर्तव्य याद रखें । अपने आचरण से आपने क्या कमाया ? क्या ये परिवार रूपी धन आपके पास है ? यानि जब कभी आप तकलीफ़ में हों , आपके बच्चे आपके पास दौड़े चले आएँ , तब तो समझें कि आपने संस्कार कमाये ।कभी बच्चे दूर चले भी जाएँ तब भी आपके दिये हुए संस्कार उन्हें कभी न कभी वापिस आपके पास ले ही आयेंगे ।

जो बेटियाँ अपने माँ-बाप को भाभी के विरुद्ध भरे रखतीं हैं , उनसे भी मैं ये कहूँगी उन्हें अपने भाई से प्यार है ही नहीं ।अगर होता तो वो हर क़ीमत पर उसका घर बनाये रखने की हर संभव कोशिश करतीं ।अलग कल्चर से आई लड़की आपको भी अजनबी लगेगी और उसके लिये तो पूरा वातावरण ही अजनबी है ।प्यार और सत्कार से वक़्त के साथ सब सहज होने लगता है ।

 दहेज जैसी बात तो आज शोभा ही नहीं देती ।अगर अभी भी आप वहीं अटके हैं तो आप पुराना रेकोर्ड हो गये हैं । अब ग्रामोफ़ोन ही नहीं बजते तो रेकोर्ड किस गिनती में ।अब बेटियाँ बेटों से कम नहीं हैं ; कमाने में भी और आपका घर , आपकी पीढ़ियों को सुसंस्कृत बनाने में भी ।

अहं की लड़ाई को पीछे छोड़ दीजिये।टकरा कर आप खुद तो ख़त्म होंगे ही , परिवार की सुख-शान्ति भी ख़त्म हो जायेगी ।अगर आप अपने बेटे को प्यार करते हैं तो निस्संदेह उसके शुभचिन्तक भी होंगे : फिर आप खुद ही उसकी ख़ुशी को ग्रहण कैसे लगा सकते हैं ! बेटे की हर ख़ुशी , सुख-चैन बहू के साथ है ; आप को हर सम्भव कोशिश करनी चाहिये कि उनके बीच केमिस्ट्री बनी रहे ।तभी आप समझदार कहे जाएँगे ।

जरा सोचिए , ये वही लड़की है जिसे आप बैण्ड-बाजे के साथ झूमते हुए ब्याहने गए थे ।जिसकी माँ ने सोचा था जैसे विष्णु भगवान उसकी बेटी लक्ष्मी को लेने उसके द्वार पर आये हैं ।कहीं कोई सहमा हुआ सा डर भी किसी कोने में बैठा हुआ था , फिर भी वो उसे दर-किनार कर उस अनजान लड़के का , उसके परिवार का दिल से अभिनंदन करती है ।तो क्या आप इस लायक़ नहीं थे ? क्यों कड़वाहट के बीज बो रहे हैं ? वक़्त सिर्फ़ उसका है जो उसे अपना मान कर , अपना बना कर चलता है ।जो वक़्त चला जाता है , लौट कर कभी नहीं आता ।इसलिए वक़्त को यादगार बनाइये । आपकी दी हुई ख़ुशी बरसों बाद भी लौट कर आप तक जरुर आयेगी ।

सोमवार, 15 अगस्त 2022

पुस्तकें , सच्ची साथी

बचपन की प्राइमरी क्लास से लेकर ग़ूढ़ विषयों तक की पढ़ाई में पुस्तकें ही हमारा सहारा बनती हैं ।पुस्तकें ही सच्ची साथी साबित होती हैं , क्योंकि ये लगातार आपसे संवाद करती रहतीं हैं ।

पुस्तकें ख़ालीपन की , अकेलेपन की साथी होतीं हैं । आप घण्टों पुस्तक में रम सकते हैं। वक्त गुजरने का पता ही नहीं चलेगा।आप जिस तरह की पुस्तकों का चयन करते हैं वो आपके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता है ।उनका असर गहरा व देर तक या यूँ कहिए सारी उम्र रहता है ।आपकी रुचि साहित्यिक , जासूसी ,चरित्र- निर्माण , अभिप्रेरक , आध्यात्मिक इत्यादि पुस्तकों में हो सकती है ।

पुस्तकें आपको दर्द की गहराई से वकिफ़ कराती हैं तो करुणामय बनातीं हैं ।सामान्य ज्ञान से ले कर देश-विदेश , ज्ञान-विज्ञान , आदि से अन्त तक सम्भावनाओं से परिचय करातीं हैं ।शब्दावली के विस्तार से बोलचाल का कौशल बढ़ाते हुए आत्मविश्वासी भी बनातीं हैं ।बहुत सारे क्यों , कैसे , कब के उत्तर आपको मिल जाते हैं ।कल्पना से परिचय करातीं हैं , जागरूक बनातीं हैं ।ये आपको तार्किक ,बुद्धिमान ,कल्पना-शील ,रचनात्मक बनाने में सक्षम हैं ।

पुस्तकें आपकी विचारधारा को बदलने की ताक़त रखतीं हैं ।चरित्र-निर्माण में इनका महत्व-पूर्ण योगदान होता है । इनके पठन से प्रेरणा मिल सकती है , जीवन का उद्देश्य मिल सकता है और आपका सँसार को देखने का दृष्टिकोण बदल सकता है । बुद्धिजीवी वर्ग की भावनात्मक भूख किताबें हो सकतीं हैं । सकारात्मक सोच के साथ ये व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाती हैं व बेहतर इन्सान बनाती हैं ।

पुस्तकें यानि साहित्य समाज का आईना होता है ।कवि तो बड़े से बड़ी बात को थोड़े शब्दों में कह लेता है । कहानीकार कहानियों द्वारा समाज के हालात को अभिव्यक्त कर कुरीतियों पर ध्यान दिलवाते हैं ।समाज में जोश और होश भरते हैं ।गीत नहीं लिखे गये होते तो मनोरंजन का साधन कैसे बनते ।

पुस्तकें पढ़ने का अहसास अलग ही होता है ।अच्छी पुस्तकें पढ़ने से जीवन बदल जायेगा।जीवन मूल्यों की शिक्षा भी अभिभावकों के अलावा हमें पुस्तकें ही दे सकती हैं ।पुस्तकें ही सुन्दर मानव सभ्यता का आधार हैं ।इसलिए सोच-समझ कर सकारात्मक विचारों वाली पुस्तकें ही पढ़ें ।ये अँधेरे में भी मार्ग दर्शन करेंगी ।जो पुस्तकें उत्तेजना , क्रोध और क्षोभ से भर दें यहाँ तक कि आप स्व-नियंत्रण तक खो दें या जो मानवता के लिए हितकारी न हों उन्हें अपनी सूची में शामिल न करें ।

किताबें गुफ़्तगू करती हैं 

आ जाती हैं कहीं रोकने ,कहीं टोकने 

सहेली की तरह कानों में फुसफुसातीं हैं 

साथ चलतीं हैं उम्र भर 


बुधवार, 9 मार्च 2022

शहर की साफ-सफ़ाई

 जनप्रतिनिधि हम में से ही , हमारे द्वारा व हमारे लिए ही चुने जाते हैं ।जो धन-राशि जन कल्याण योजनाओं पर खर्च होती है वो सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाती है । विभिन्न प्रकार के करों द्वारा सरकार फंड इकट्ठा करती है ।घूम-फिर कर पैसा भी हमारा ही है और खर्च भी हम पर ही होना है ।विडम्बना ये है कि योजना की रूप-रेखा तैयार करते वक्त इतने ज़्यादा बजट का ब्यौरा दिया जाता है कि आधे से ज़्यादा राशि सम्बंधित लोगों की जेबों में जाती है ।ये पूरी एक चेन है ।और फिर वाह-वाही लूटी जाती है ।इस प्रक्रिया में जिसे ज़मीर कहते हैं वो तो नदारद ही है ।ये तो ठीक है कि काम होना चाहिए मगर क्या इस लेवल तक गिर कर ।

अब अपने शहर में चारों तरफ नज़र दौड़ाइये।प्लास्टिक और कचरे के ढेर हैं चारों तरफ ,तरक़्क़ी के नाम पर ये क्या हाल हो गया तेरा , ऐ मेरे शहर

रूद्रपुर शहर के ज़्यादातर सभी नालों का यही हाल है ।गन्दगी से अटे पड़े हैं ।जिधर देखो नालों में प्लास्टिक की पन्नियाँ और कचरा भरा हुआ कीचड़ खड़ा है ; जो मच्छरों और बीमारियों को दावत दे रहा है ।सड़कें कितनी भी साफ रख लें , दुकानें आलीशान हों , मगर ये गन्दगी तो अव्यवस्था का सारा कच्चा चिट्ठा खोल रही है ।आप रेलगाड़ी से सफर करिए , घरों के पीछे ट्रैक के आसपास तो हर शहर में यही हाल दिखेगा ।

आवश्यकता है इन नालों की अविलम्ब व नियमित सफ़ाई व निरन्तर बहाव को बरकरार रखने के लिए समुचित व्यवस्था की व जन जागरण की भी ।सड़क पर व नालों में प्लास्टिक की थैलियाँ व अन्य कचरा कभी नहीं फेंका जाना चाहिए ।इसके लिए निर्देशित दूरी पर कूड़ेदान रखे जाने चाहिए । स्वच्छता अभियान चलाया जाना चाहिए । बच्चों को स्कूलों में ये शिक्षा देनी चाहिए और घरों में बड़ों को अपने आचरण से सिखाना चाहिए ।विदेशों जैसी चमचमाती साफ-सुथरी सड़कें हमारे यहाँ क्यों नहीं हो सकतीं ? 

वैसे तो पूरे शहर का हाल ऐसा ही है ।मगर रेलवे-स्टेशन और उस से लगी कालौनी के बीच बने नाले की दुर्गति तो देखते ही बनती है ।सोढी कालौनी की तरफ तो सारा कूड़ा ही इसमें डाला जाता है ।बिना पुल के मिट्टी डाल कर आने जाने का रास्ता बना लेने से बहाव भी रुका हुआ है ।इस तरह साथ की दूसरी फ़्रेंड्स कालौनी का बहाव भी रुका हुआ है । खड़ा बदबूदार पानी गन्दगी और मच्छरों का घर बना हुआ है ।आवश्यकता है कि प्रशासन इसकी जल्दी से जल्दी सुधि ले ।

हम जगह-जगह प्लास्टिक का कचरा डाल कर इस धरती को कितने सौ सालों के लिए दूषित कर रहे हैं ; ये कई सौ सालों तक मिटाया न जा सकेगा । प्लास्टिक अगर कूड़े में जलेगा तो पर्यावरण दूषित होगा । धुएँ में , हवा में घुल कर हमारे फेफड़ों को संक्रमित करेगा ।

आवश्यकता है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि विकास के साथ-साथ इस ओर विशेष ध्यान दें ; क्योंकि ये स्वास्थ्य के साथ-साथ शहर की सुन्दरता का सवाल भी है ।


सोमवार, 20 सितंबर 2021

सोशल मीडिया

 दिल पर मत ले यार , ये सोशल मीडिया है। इंटरनेट की दुनिया आभासी है , आभास तो होता है, मगर कितना सार है इसमें , कितनी वास्तविक है , कह नहीं सकते । कितने कमेंट्स, कितने लाइक्स ! मिलें तो ख़ुश न मिलें तो नाखुश , इस सबमें क्यों उलझें हम , हमने अपना काम किया , उसकी वो जाने। कई बार तो इष्ट-मित्र देख भी नहीं पाते क्योंकि जब उनकी फ़्रेंड लिस्ट लम्बी होती है तो हो सकता है आपका मेसेज स्क्रोल में बहुत नीचे पहुँच जाता हो। कई बार सोशल मीडिया पर आने का वक्त ही नहीं मिलता। अरे भई, और भी ग़म हैं जमाने में इस फेसबुक और वाटस एप के सिवा 😁 ! साथ ही ये भी सच है कि कई बार लोग प्रतिक्रिया देना भी नहीं चाहते ; खुद को ही देख लो अपना मन ही कितनी जल्दी-जल्दी बदलता है । आज कोई बड़ा अपना लगता है तो कल वही बड़ा ग़ैर या बेग़ैरत। क्यों उम्मीद रखनी है दुनिया से ? यहाँ अटकने की जरुरत नहीं है। वैसे फोटो के साथ डाला गया संदेश ज़्यादा असरकारक होता है। सिर्फ़ लिखा हुआ कम लोग पढ़ते हैं ; रुचियाँ भिन्न-भिन्न होने पर भी आपका मेसेज सब लोग नहीं पढ़ेंगे ।

वाटस एप और फ़ेसबुक ने प्रोफेशनल्स की ऐसी टीम बनाई हुई है जो धार्मिक अंधविश्वासों , देशप्रेम के नाम पर या खोए बच्चों या बीमार लोगों के नाम पर झूठी-सच्ची ऐसी पोस्ट्स बना कर फ्लो करते रहते हैं कि लोग उस पर कमेंट्स करते रहें या चर्चा करते रहें और लगे रहो मुन्ना भाई की तर्ज़ पर नकारा हो जाएँ और उनकी चाँदी ही चाँदी हो क्योंकि ये वेबसाइट्स तो फलफूल रही हैं। धार्मिक तस्वीर के साथ लिखेंगे जो आज इस पर ‘जय हो’ लिखेगा उसकी मनोकामना पूरी होगी । या कुछ डरावने मेसेज भी होंगे । भला सिर्फ़ लिखने से किसी का भला हो जायेगा या वो व्यक्ति धार्मिक कहलायेगा ? आज धार्मिक स्थल के चक्कर पे चक्कर लगाने वाला या बहुत पूजा पाठ करने वाला भी जरुरी नहीं कि अच्छा इन्सान ही हो। इंसानियत पर जो न पसीजा तो कैसा अच्छा दिल ! ऐसे मैसेजेस से डरने की जरुरत ही नहीं होती ये आपको धर्म- भीरु बनाते हैं , कर्म बुरे नहीं तो क्या डर ? इन पोस्ट्स पर कम्मेंट्स करने पर आप इन्हें लगातार फ्लो में बनाये रखते हैं ।

आज सोशलमीडिया ने अभिव्यक्ति के लिए कितने सारे प्लेटफ़ार्मस हमें दिये हैं ; ट्विटर , लिंकड-इन ,टैगड , इंस्टाग्राम ,स्नैपचैट , फ़ेसबुक ,ब्लॉग राइटिंग, यू- ट्यूब आदि। कल तक अख़बार या पत्रिका में छपवाने के लिये भी हमें हील-हुज्जत करनी पड़ती थी पर आज एक क्लिक के साथ हम दुनिया के सामने होते हैं ।अभिव्यक्ति की आज़ादी और सर्व-सुलभता के नाम पर हमें इसका अनुचित उपयोग नहीं करना चाहिये ; इसलिये सिर्फ़ ऐसा परोसें जो सबके हित में हो , जो किसी दिल को उठाये , इंसानियत के लिये हितकारी हो , किसी को राहत दे , उसे लगे उसकी अपनी ही बात है ।

आज कोई भी सोशल-मीडिया से अछूता नहीं रह सकता है , ये हमारी दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अँग बन गया है । इसने व्यवसाय , नौकरियों , बुकिंगस , पढ़ाई , बैंकिंग ,शॉपिंग , मीटिंग्स , वीडियो- कालिंग आदि को इतना सुविधाजनक कर दिया है कि इसके बिना रहने की बात सोची भी नहीं जा सकती ।आज कोरोना काल ने तो इसके महत्व को और भी उजागर कर दिया है ।

इतने सारे फ़ायदों के बीच इसके नकारात्मक प्रभाव भी आ रहे हैं ,जैसे इसके इस्तेमाल का फोबिया , डिप्रेशन ,कंस्ट्रेशन की कमी , सोशल अलगाव , औरों के साथ खुद की तुलना करना , रोज़मर्रा की गतिविधियों में कमी। कभी-कभी तो फ़ेक लोगों के सम्पर्क में आ कर फँस जाते हैं। तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर, भ्रामक और नकारात्मक जानकारी साझा करने से जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बड़ी सरलता से ये सब तक पहुँच जाते हैं । फ़ोटो और जानकारी शेयर करने से प्राईवेसी तो भंग होती ही है ।

अब ये हम पर है कि हम इसका कितना सही उपयोग करते हैं। कोरोना काल में जहाँ हम बाहरी दुनिया से भौतिक रुप से कटे, नेट ने हमारी दुनिया को ही विस्तार दे दिया। कई लोगों को इसने नई पहचान दी , कितने ही लोगों को रोजी-रोटी दी , क्रियेटिविटी को मंच दिया। कितने ही कुकरी, क्राफ़्ट ,म्यूज़िक बैंड ,टीचिंग क्लासेज़, बुटीक के यू-ट्यूब चैनल्ज़ इसी वक्त की देन हैं। सामाजिक अभियान चलाने के लिये भी सोशल मीडिया से बढ़ कर कोई प्लेटफ़ार्म नहीं है। बस ये हम पर है कि हम कितनी सही दिशा पर हों। रिश्तों को मजबूती देने में भी इसका जवाब नहीं ; दूर बैठे हुए भी आप एक सौहार्द-पूर्ण टिप्पणी देकर या एक फोन कॉल कर रिश्तों में अपनत्व बनाये रख सकते हैं ।

इसलिए दिल पर मत लो , आगे बढ़ चलो , इसके बिना काम नहीं चल सकता , मगर इसको उतना ही समय और महत्व दो जिसमें आपकी बाकी दिनचर्या पर असर न पड़े ।😁😁

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

ज़िन्दगी एक बार , तो क्यों सोचें दो बार


कोविड की लहर उठी है , आपको भी सदभावना की लहर उठानी है । ये भी सच है कि आपको खुद को सुरक्षित साइड रखना है मगर ये भी तय है कि इस लहर में कौन-कौन बच रहेगा और कौन-कौन इसके साथ जायेगा।ज़िन्दगी जो एक बार ही मिली है तो ज़्यादा सोचें मत , जो अच्छा कर सकें , कीजिए।कोई अफ़सोस या किसी अपराध बोध को जगह मत दीजिए। इंसानियत बची तभी इन्सान बचेंगे ।आलोचना में कुछ नहीं रखा । हम आप से ही सरकार बनी है , संसार बना है । हम आप ही व्यवस्था के लिये ज़िम्मेदार हैं ।किसी दिल को बदलना है तो पहले खुद को बदलिए ।ये मुश्किल वक्त है , सहयोग से कटेगा ।


मेरे देश का इक इक नागरिक लड़ रहा है लम्बी लड़ाई
खतरे में है वजूद
अदृश्य है दुश्मन
बचा रहे इन्सान का नामों-निशाँ

आओ सब एक साथ
भूल कर सारे भेद , बैर-भरम
सिर्फ हौसले की जंग काफी नहीं
जुनूने-जोश की भाषा समझता है दिल
प्रेरणा ही वो शय है जो जीत का सबब बनती है
जीतेंगे हम , मनुष्य की लड़ाई है मनुष्यता के लिए
इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ
Save humans , Save humanity

बुधवार, 25 नवंबर 2020

फ्रैंकफर्ट मेरी नजर से

 बादलों के झुण्ड .... जैसे रुई के अम्बार लगे हों , जिन्हें चीरता हुआ प्लेन सुबह-सुबह जर्मनी फ्रैंकफर्ट के आसमान से जब नीचे उतर रहा था ; गहरे हरे रँग के जँगल , हलके धानी और पीले रँग के खेत , खिलौनों जैसे घर साफ़ दिखाई देने लगे थे।इमिग्रेशन और सिक्योरिटी की औपचारिकताओं के बाद जब हम एयर-पोर्ट से बाहर आये ,बच्चे दूर से ही इन्तिजार करते दिख गये। एयर-पोर्ट पर कोई मारामारी नहीं ,बहुत कम लोग दिखे ,सामान के लिये भी कोई चैकिंग नहीं। 

मैने अभी तक इतना साफ-सुथरा ,सुनियोजित ,ट्रैफिक रूल्ज फॉलो करने वाला शहर नहीं देखा था। हॉर्न तो बजते ही नहीं थे ,गाड़ियाँ भी एक निश्चित दूरी रख कर चलतीं थीं। सड़कों पर दोनों ओर साईकिल चलाने वालों के लिये और पैदल चलने वालों के लिये दो अलग-अलग सड़कें थीं। सड़क पार करने के लिये क्रॉसिंग पर ग्रीन सिग्नल होते ही सड़क पार करने के लिये टीं- टीं की आवाज़ भी होती ताकि कोई ब्लाइंड पर्सन भी सड़क पार करना चाहता है तो आराम से कर ले। 

सभी तरफ खुलापन ,ज्यादातर पाँच-मंजिली इमारतें ,हर लाल-बत्ती के पास मेट्रो-स्टेशन्स दिखे। ये देश महँगा जरूर है ,मगर सरकार की तरफ से सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट और मेट्रो स्टेशन पर टिकट देने के लिए कोई है ही नहीं। आपको खुद ही मशीन में जगह का नाम व पैसे भरने हैं और टिकट या मंथली पास निकालना है। मैं हैरान थी कि कहीं कोई मशीन चेक करने के लिये भी नहीं थी। फिर पता चला कि कभी-कभी सरप्राइज चैकिंग होती है , बेटिकट लोगों पर तगड़ा जुर्माना लगता है। इसलिए कोई भी बेटिकट सफर नहीं करता। 
सामान खरीदने जाओ या आसपास जो भी मिलता है अभिवादन में हलो जरूर बोलता है। वैसे वो किसी की भी ज़िन्दगी में दखल नहीं देते। 

  राइन नदी फ्रैंकफर्ट से लगी हुई बहती है । पूरे तट पर साइक्लिंग के लिए सड़क और घास ऊगा कर मनोरम पार्क विकसित किये हुए हैं। राइन नदी के ब्रिज पर ताले बँधे हुए थे ,पूछने पर पता लगा कि यहाँ विश माँगी जाती है , मान्यता है कि वो पूरी हो जाती है। फोटो देखिये ...दूर से नजर आते हुए आसपास के गाँव और खेत....मनोरम दृश्यों से भरपूर। 





गर्मियों में सुबह साढ़े पांच बजे सूरज अपनी किरणों के लाव-लश्कर के साथ दस्तक देने लगता।  रात होती साढ़े दस बजे। अब घड़ी देख कर  सोओ जागो।शाम सात बजे सारे बाजार बंद हो जाते ,मगर उजाला तो दस बजे बाद भी रहता ; मगर सड़कें सूनी होतीं ,रेस्टोरेंट्स खुले रहते। आबो-हवा हमारे नैनीताल वाली और विकास किसी मेट्रोपॉलिटिन सिटी सा। 

फड़ या अतिक्रमण कहीं नहीं। रैस्टौरेंट्स के बाहर खुली जगह में टेबल चेयरस लगीं रहतीं .टी. वी. पर मैच देखते हुए ,बड़े-बड़े बियर और व्हिस्की के ग्लास भर कर बैठे लोग ,ज़िन्दगी को भरपूर जीते हुए लगते। ऐसा नहीं कि एल्कोहल पीने वाले लोग ही ज़िन्दगी को पूरी शिद्दत से जीते हों।  यहाँ के लोगों के लिए ये उनके आम खान-पान का हिस्सा है ,शायद आबो-हवा की माँग भी, और ये उनके जीने का अन्दाज़ भी। एक डिश और एक ड्रिंक ऑर्डर करना ही उनका रोज का लन्च या डिनर भी। कहीं कोई हँगामा नहीं करता। सारे स्टोर्स में सभी तरह की एल्कोहल आम ग्रौसरी की तरह ही उपलब्ध रहती। 

इंग्लिश में काम चल जरूर जाता है मगर जर्मन सीखे या जाने बगैर आपकी ज़िन्दगी यहाँ बहुत आसान नहीं हो सकती। स्ट्रीट यहाँ स्ट्राज़ो होती है और यूनिवर्सिटी होती है यूनिवर्सिटैट , मेट्रो बान और रेलवे-स्टेशन हाफबानऑफ। 
बुलेट ट्रेन से पेरिस जाने के लिये जब स्टेशन गये तो मैं हैरान रह गई कि तेइस-चौबीस प्लैटफॉर्म्स के लिये एक ही प्लैटफॉर्म से ब्रांचेज बन गईं हैं। आपको कोई ब्रिज पार नहीं करना। ट्रेन के दोनों तरफ इंजन हैं। एक तरफ से गाड़ी आई और उसी रास्ते पिछले इंजन से वापिस चली जायेगी .आदमी का वक्त कीमती है भई। टिकट पर स्टेशन का प्लेटफार्म लिखा रहता। स्क्रॉल की सुविधा भी हर जगह। लोकल बस ट्रॉम ,मेट्रो हर जगह स्क्रॉल , 6 .14 तो  6 .14 और 5.19 तो  5.19 पर बस स्टॉप पर पहुंचेगी , कोई शोर नहीं , मेट्रो हर तीन मिनट में।फोन में ऐप डाउनलोडेड रहते ट्रान्सपोर्टैशन सुविधाओं की समय सारणी के भी , किसी से पूछने की भी जरुरत नहीं। 

हर स्टोर में प्लास्टिक की बोतलें रिसाईकिल करने की मशीन लगी है। पैसे सामान में रीइम्बर्स हो जाते।पब्लिक जगहों पर कांच की बोतलों को डिस्पोज़ ऑफ़ करने के लिए तीन तरह की मशीनें लगीं हैं ,ब्राउन ,ग्रीन और सफ़ेद। हर जगह कूड़ेदान और सफाई।इतनी जागरूकता सरकार की भी और जनता की भी !

 यहाँ सब तारें अंडरग्राउण्ड ही है ,कहीं कोई खंबे या तारें हवा में नहीं लटकते। कहीं कोई केबल मरम्मत होनी थी।मैंने देखा कि छः आदमी दो मीडियम से ट्रक ले कर आये.सड़क के पत्थर उखाड़े , मिट्टी निकाली ,उसे एक ट्रक में भर लिया। केबल की तारों को अलग-अलग बाँधा , ट्रक से डिवाइडिंग बार्स निकालीं ,गड्ढे और चौड़े पत्थरों के इर्द-गिर्द पार्टीशन खड़ा कर दिया ताकि गलती से भी कोई दुर्घटना ना हो। अगले दिन ही वो जगह बिल्कुल नार्मल सड़क की तरह थी। सारी फैक्टरीज और फर्नीचर्स की दुकानें शहर से दूर हैं ताकि लोगों को असुविधा न हो। 

दवाइयाँ बिना डॉक्टर के प्रिसक्रिप्शन के नहीं बिकतीं। सेहत के लिए कितनी जागरूकता है। ज्यादा लोग साइकिल चलाते मिलते। बच्चों के बड़ों के तरह-तरह के साइकिल ,प्रैम ,और हेल्मेट्स देखने को मिलते हैं। इतने प्यारे बच्चे ,जैसे किसी डॉल हॉउस में आ गए हों। वक्त को भरपूर जीना कोई इनसे सीखे।पार्कों में दरियाँ बिछा कर , धूप सेंकते हुए लोग , पिकनिक मनाते हुए , व्यायाम और खेल-कूद करते हुए अक्सर हर सप्ताहाँत दिख जाते। 

मैं अचरज से भी देख रही थी और अभिभूत भी थी , सोच रही थी कि ये सब हमारे भारत में क्यों नहीं हो सकता। हमारी जनसँख्या इतनी ज्यादा है कि जगह की कमी ,सुविधाओं की कमी और इसके साथ हमारी नीयत सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ;पब्लिक वाली सुविधाएँ तो हम घर उठा कर ले जाएँ। भ्रष्टाचार की वजह से विकास की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं।फाइनेंस कैपिटल फ्रैंकफर्ट की जनसख्याँ 2017 के आँकड़ों के हिसाब से सात लाख पन्द्रह हजार और हमारे दिल्ली की 2011 के आँकड़ों के हिसाब से तकरीबन सवा करोड़। 

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

समाज की उधड़ती परतें : नशा

 समाज की पर्तें उधड़ रही हैं , नेपोटिज्म ,पॉलिटिकल कनेक्शन ,ड्रग कनेक्शन और रिश्तों की टूटन । रिश्तों की टूटन अन्ततः डिप्रेशन की तरफ ले जाती है। ये साफ़ होता जा रहा है कि आज की आर्टिफिशयल चमक-दमक भरी दुनिया किस तरह नशे की गिरफ़्त में आ चुकी है। 


ड्रग्स पार्टीज करना महज़ मनोरँजन के लिए या शौक नहीं है ;यहाँ तलाशे जाते हैं मौके यानि ऊपर चढ़ने की सीढ़ियाँ । वही लोग जो यहाँ किसी उद्देश्य से आते हैं वो खुद कभी किसी के लिए सीढ़ी नहीं बनते ; बल्कि दूसरों के पाँव के नीचे की जमीन तक खींचने के लिए तैय्यार रहते हैं । पहले-पहल कोई मॉडर्न होने के नाम पर ड्रग्स चखता-चखाता है ;फिर धीरे-धीरे ये लत बन जाता है ,जैसे धीमे-धीमे कोई जहर उतारता रहता है अपनी रगों में ।

एक दिन ये भी आता है कि नशा जरुरत बन जाता है शरीर की भी और मन की भी। आदमी भूल जाता है कि जिस दीन-दुनिया की खातिर नशे को गले से लगाया था ,वही दुनिया उसे अब छोड़ने लगती है। हर अप्राकृतिक चीज के साइड इफेक्ट्स होते हैं। नशा शरीर को खोखला कर देता है। ज्यादा दवाइयाँ और हारमोन्ज़ माइकल जैक्सन की हड्डियों तक को खोखला कर गए थे ;सभी जानते हैं कि कितनी कम उम्र में वो दुनिया को अलविदा कह गए। कामयाबी ,शोहरत ,पैसा किसी भी काम न आया। जिस सेहत को आप हजारों रूपये दे कर भी खरीद नहीं सकते ; उसे दाँव पर लगा देना , इससे बड़ी नादानी क्या होगी। 

कैसी विडम्बना है कि नशा जिस मानसिक स्थिति को उठाने के लिए किया जाता है , उसी को घुन की तरह खाने लगता है। ये जितना चुम्बक की तरह लुभाता है ,उतना ही आप ज़िन्दगी से दूर होते जाते हो।  धीरे-धीरे नकारा होते जाते हो। जब आँख खुलती है तो ज़िन्दगी का कोई मक्सद ही नजर नहीं आता। खोखली ज़िन्दगी और खोखला मन डिप्रेशन और बीमारियों की तरफ धकेल देता है। 

 तक़रीबन पन्द्रह साल पहले अखबार में छपा था किशोरावस्था के स्कूल जाने वाले बच्चे इंक इरेजर या वाइटनर का इस्तेमाल कर रहे हैं नशे के लिए। फिर इनकी सेल बैन कर दी गई थी। चिंता का विषय है कि इतने छोटे बच्चों को ये लत किसने लगाई ,किसने उन्हें ये रास्ता दिखाया। ड्रग्स बहुत गहरे अपनी पैठ बनाये हुए हैं। जब दाल बीनने बैठेंगे तो सारी दाल ही कहीं काली न मिले।  

ड्रग्स की खोज दवा की तरह की गई थी और लोगों ने इसे कारोबार बना डाला ;अमीरी का सबसे आसान रास्ता। मौज-मस्ती की आड़ में हमें पता ही नहीं चलता कि हम अपने नैतिक मूल्यों से कितनी दूर आ गये हैं। आडम्बर करते-करते अपनी ही दुनिया में आग लगा बैठे है। नींव खोखली हो तो किसी भी समाज का भविष्य दाँव पर लगा होता है।  अब जब समाज की पर्तें उधड़ने लगीं हैं। पर्त -दर-पर्त कितने ही लोग नपेंगे। 

आप खोजिये इस नकली चौंधियाती दुनिया में असली रिश्तों को ,किसी छाँव को , किसी आराम को। अब आप बहुत दूर निकल आये हैं। आपके हाथ से बहुत कुछ छूट गया है। दो बूँद ज़िन्दगी की चाहिए थी और आप नशे को , भटकाव को गले से लगा बैठे। 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

कैसे गुजारें सोशल डिस्टेंसिंग का वक़्त

इक सन्नाटा सा पसरा है सारे शहर में 
पत्ते भी हैं सरसराते , हवा भी चल रही है 
पक्षी भी हैं चहचहाते 
इक इन्सान ही ठहरा है अपनी आरामगाह में 
१. ये सोशल डिस्टेंसिंग बीमारी से अपने बचाव के लिये हमें स्वेच्छा से खुद ही चुन लेनी चाहिये।निदान उपचार से बेहतर है। यही सर्वोत्तम है। इसे बेशक हमारे प्रधान-मन्त्री जी की मर्जी से लागू किया गया है। मगर ये सच है कि अगर इसे नियम न बनाया गया होता तो हम इसे बहुत हल्के लेते और भयँकर परिणाम झेलने पड़ते। 
२. हम में से बहुत लोगों को घर बैठना बहुत कठिन लगेगा ; क्योंकि हम जिस रूटीन के आदी थे वो  बदल गई है। वो दिनचर्या पूरी तरह बाहरी आधारों पर आश्रित थी। ये सही वक़्त है अपने ही आँकलन का। आप क्या क्या कर सकते थे और आप क्या कर रहे थे।घर पर रहते हुए अपने रिश्तों में रस घोलिये। घर का काम-काज आपको आत्म-निर्भर बनायेगा। विदेशों में तो सब काम लोग मिल-जुल कर खुद ही करते हैं , इसमें शर्म कैसी। घर के अन्दर आपको सब कुछ हासिल है। सरकार फ़ूड सप्लाई ,दवाइयाँ आदि जरुरत के हर सामान का ध्यान रख रही है। समझ-दारी के साथ बिना घबराये कम सामान के साथ गुजारा भी करना पड़े तो कोई हर्ज नहीं। खाना तो जीने के लिये खाया जाना चाहिये न कि खाना खाने के लिये जिया जाना चाहिये। यही बात पहनने ओढ़ने पर लागू होती है। हमारी जरूरतें जितनी सीमित होगीं हम उतने ही सुखी होंगे। दरअसल इन चीजों में मन को अटका कर नहीं रखना चाहिये। 
३. अपना रूटीन बनाइये , जो काम अब तक आप नहीं कर पाये थे , वो करिये। कोई स्किल डेवलप करनी हो , किसी परीक्षा की तैयारी , कुछ छूटे हुये घरेलू काम ,किताबें पढ़ना या लिखना , बागवानी ,मेडिटेशन ,सँगीत प्रैक्टिस , गाना बजाना , पाक कला आदि किसी भी काम में महारथ हासिल करनी हो ;सब कर सकते हैं। ऑन-लाइन हेल्प , फोन-अ-फ्रेंड  और आपके पास मौजूद किताबें आदि मदद-गार साबित होंगी। अब आपके पास खूब वक़्त है उसे जैसे चाहें इस्तेमाल करें। लोगों को आप भी मदद  सकते हैं। कोई अपने शौक का काम तो जरूर करें। 
४.ऐसा वक्त आ सकता है जब ह्रदय-हीनता ,सँवेदन-हीनता ,टकराव और तनाव की स्थितियों का सामना करना पड़े।अज्ञानता , अनभिज्ञता ,अपना बचाव करने वाली मानसिकता ,बुरे अनुभव या स्ट्रेस ऐसा कोई भी कारण हो सकता है। जब कारण देख सकने वाली दृष्टि पैदा कर लेंगे तो नाराज नहीं रह सकेंगे। और सहज रह सकना ही हमारी ताकत होती है; वरना हालात और समय को बर्दाश्त नहीं कर पाते और डिप्रेशन या बम फट पड़ने जैसी स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। 
५. ये फुर्सत का वक्त आपको मिला है कि आप मनन करें, आप क्या-क्या कर सकते हैं। अपने अन्दर झाँक कर देखें। रिश्तों को एक धागे में पिरोएं , परिवार को वक्त दें। मेडिटेशन ,प्राणायाम को प्राथमिकता दें। यही आपको ठहराव देगा व स्थितियों को स्वीकार कर पाने की क्षमता देगा। जिसकी नीँव में प्रेम हो वो स्वतः ही आनन्द का फल देगा ...बड़े बड़े कर्मों के पीछे प्रेरणा का स्त्रोत प्रेम ही होता है 
६. अनिश्चितता की स्थिति सता सकती है। नौकरी ,रोजगार सब पर असर पड़ेगा। और ये तो सारे देश क्या पूरी दुनिया के साथ है।और दुनिया ख़त्म नहीं होगी , सब फिर से वैसा ही चलेगा।हाँ हम लोगों को बहुत सारी सीख जरूर दे कर जायेगा। अगर आप समर्थ हैं तो दूसरों की मदद करिये।  अगर आप समर्थ नहीं हैं तो सरकार आपके खाने का पूरा इन्तजाम कर रही है , घबराने की कोई बात नहीं है। जब आपदा का समय खत्म होगा , आपकी ज़िन्दगी का नया अध्याय शुरू होगा। अभी अपनी क़ाबलियत ,समझदारी ,सहन-शक्ति , व्यवहारिकता अमल में लाने का समय है। वक्त गुजर जायेगा , ये मायने रखता है कि आपने इसे कैसे गुजारा ! 
७. अपनी इम्युनिटी का पूरा ध्यान रखें। अपने शरीर की प्रकृति व ऋतु के अनुसार भोजन करें। साफ़-सफाई का ध्यान रखें। मन खुश रहेगा तो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी। 

घर कैद नहीं है। ये आपके सपनों की आराम-गाह है। आपका घर ही इस वक्त आपके लिए सबसे सुरक्षित स्थान है ; जहाँ आप सहज रह सकते हैं ,खुश रह सकते हैं , मनचाहा कर सकते हैं। तो चलिये इस वक़्त को यादगार बनाइये। 

ऐ ज़िन्दगी न मैं चूहा न तू बिल्ली 
है तेरी ये आँख-मिचोली कैसी 
मिलेंगे तुझसे तो पूछेंगे 
बता ,है ये हँसी-ठिठोली कैसी 

कहाँ ढलता है सूरज दिन के ढल जाने पर 
ढल जाती है जब उम्मीद समझो के शब हुई 




शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

कोरोना , कुछ मेरी कलम से

Picture credit -Kusha Arora ....my daughter

हम जीते मरते रहते हैं जिन संवेदनाओं की खातिर 
सर पे लटकी हो तलवार तो सब हो जाती हैं बेमायने 
माँगते हैं सिर्फ चलने की डगर 

एक बार की बात है जब कोरोना की वजह से महामारी ने सारी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया था। once upon a time there was an outbreak of pandemic Corvid-19, a contagious disease etc.etc... ; हो सकता है हममें से बचे हुए लोग दादा-दादी या नाना-नानी की तरह कभी अपने पोते पोतियों को ऐसी ही कहानियाँ सुनाएँ। कोरोना ने हम सबको ऐसे हालात में ला कर खड़ा कर दिया है कि हम अपने-अपने घरों में कैद हो जायें। इस का असर सारी दुनिया , काम-धन्धे ,ऐ टू जेड हर बात पर पड़ेगा।मगर है तो सारी दुनिया पर ही। कभी ऐसा लगता है किसी फिल्म का सीन है , जैसे किसी एक जगह ला कर नजर-बन्द कर दिया गया हो। कभी ऐसा लगता है कि रोबोट या राक्षस की तरह वायरस आता है और जिधर नजर दौड़ाओ ज़िन्दगियाँ ही ज़िन्दगियाँ लील जाता है। 

मौत का डर सताता है 
मौत आनी है एक दिन तो आयेगी 
वो जनम इक नया पैरहन होगा 
रिश्ते-नाते रुह का सिँगार हैं 
रात आयेगी तो सब विदा होगा 
रुह कभी मरती नहीं 
अपने ही नूर से तू वाकिफ होगा 

इससे पहले कि हम कोरोना संक्रमित सँख्या का हिस्सा हो जायें , हमें खुद को आइसोलेट करना है यानि मेल-मिलाप से बचना है। ज़िन्दगी के सामने जात-पात , हिन्दू-मुस्लिम ,अमीर-गरीब सब गौण हैं।प्रगति ज़िन्दगी से बड़ी नहीं होती।प्रगति ज़िन्दगी के एसेन्स को बढ़ाने वाली जरुर होती है। आज अगर कोविड-19 के लिये वेक्सीन खोज ली जाती है तो मानव के लिये बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। 
अभी तो हमें सुरक्षित रहने का , इम्युनिटी बढ़ाने का हर सम्भव प्रयत्न करना है। खान-पान ,साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें। अगर आपको गले में जरा भी खराश लगती है तो दो तुरियाँ लहसुन की चबा-चबा कर खा जाएँ , इसकी तीखी गन्ध श्वसन-सँस्थान के सारे माइक्रोब्ज मार देगी ,गला खुल जायेगा। 

सबसे बड़ी बात है कि आप खुश रहें। ऐसे हालात का भी सकारात्मक पहलू देखें। ये तो एक मौका है अपने रिश्तों को वक्त देने का। अपने सीमित साधनों को सर्वोत्तम ढँग से उपयोग करिये। आराम करिये , घरेलू कामों में जरुरी व्यायाम भी हो जायेगा।मनन कीजिये , अपनी प्राथमिकताएँ तय कीजिये। जरुरत का सामान राशन , दूध ,सब्जियाँ आदि लाने भी बार-बार बाहर न जायें।कोई स्किल डेवलप करें। भीड़ करने से सोशल डिस्टेंसिंग का उद्देश्य व्यर्थ हो जायेगा। ज्यादा राशन इक्कट्ठा न करें क्यूँकि हो सकता है कि औरों के लिये पर्याप्त राशन न बचे। आप भूखे नहीं रहेंगे ,कुदरत पत्थर के नीचे दबे मेंढक तक के लिये खाने का इन्तज़ाम कर के रखती है। अभी तो हमारी सरकार फ़ूड सप्लाई का भी पूरा ध्यान रख रही है।लो इन्कम ग्रुप के लिये तो भण्डारा या फ्री वितरण भी चल रहा है। अभी वक्त है सँयम का। 

ये चुनौती-पूर्ण समय है , और समय कब चुनौतियों से भरा नहीं होता ?
डॉक्टर्स ,मैडिकल स्टाफ ,सफाई कर्मचारी ,पुलिस महकमा , बैंकर्स , फ़ूड सप्लायर्ज सभी बधाई के पात्र हैं उन्हें मानवता की सेवा करने का मौका मिला है। अपने-अपने स्तर पर हम लोग भी कुछ न कुछ योगदान कर सकते हैं , कभी किसी मन को उठा कर , और कुछ नहीं तो अपना ही ध्यान रखते हुए औरों के लिये समस्या न बन कर। 

किसको पता था कि इस तरह भी दुनिया थम जायेगी 
छोटा सा कोरोना वायरस ,दहशत की पराकाष्ठा !
जैसे यमराज हो बिन आहट के चलता हुआ 

कभी सोचा है ,वाकये ऐसे भी हुए हैं 

जब छोड़ जाते हैं अपने ही लोग ,मरते हुए जिन्दों को श्मशान में 
संवेदनाओं की पराकाष्ठा !

घबरा मत ऐ इन्साँ 

ये दुनिया चला-चली का है मेला 
ज़िन्दगी की है तय दासताँ 

कभी ‘हॅंस ’ पत्रिका में एक कहानी पढ़ी थी शायद फणीश्वर नाथ रेणु की लिखी ,जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था , किसी गाँव में महामारी फैलने की वजह से जब उल्टी-दस्त से लगातार मौतें हुई जा रहीं थीं ,घर में बाकी बच्चों के मर जाने के बाद छोटी बच्ची भी ग्रस्त हुई , तब ये किरदार अपनी बच्ची को मरने से पहले ही श्मशान पहुँचा देता है कि अब मरना तो तय ही है।जरा सोचिये ,लाचारगी और बेबसी ने उसे कितना सँवेदन-हीन बना दिया होगा। बरबस उसी कहानी की याद आ जाती है। ये वक़्त पैनिक होने का है ही नहीं। ठन्डे दिमाग से निदान के हर सँभव उपाय अपनाइये। हो सकता है सँवेदन-हीनता के बहुत सारे किस्से पेश आयें ; मगर ऐसे में ही आपको रास्ता निकालना होगा। 

साजिश में दुनिया की खुदा भी तो था शामिल 
शिकायत कैसे करें , हैं उसकी मेहरबानियाँ भी कितनी 

भारत के लोग असीम प्रतिरोधक क्षमता ,असीम प्राण-शक्ति के मालिक हैं ;हम मिल कर ये जँग जीतेंगे। सकारात्मक रहें ;ज़िन्दगी को ऐसे जियें जैसे कि ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा।सारी कवायदें ज़िन्दगी की ज़िन्दगी के लिये ,क्यूँ न फिर गुनगुना ही लें ......

ऐ ज़िन्दगी तेरा ,
तीरे-नजर देखेंगे 
जख़्मी-जिगर देखेंगे 
कोरोना का असर देखेंगे 
कुदरत का कहर देखेंगे 
और हाँ ,😁बचे तो सहर देखेंगे 

ऐ खुदा , ले आये हो ये किस मुकाम पर 
रुक गई है दुनिया की रफ़्तार 
मगर हम दुआओं का असर देखेंगे 
रहमत की लहर देखेंगे 
हाँ शहर-दर-शहर देखेंगे 

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शुक्रवार, 20 मार्च 2020

कोरोना को हराना है

सिडनी , ऑस्ट्रेलिया से लौटा ३५ साल का युवक भारत पहुँचता है , स्क्रीनिंग में हल्का बुखार पाये जाने पर टेस्ट के लिए अस्पताल लाया जाता है। अभी तो टेस्ट की रिपोर्ट भी नहीं आती और वो घबरा कर अस्पताल की सातवीं मँजिल से नीचे छलाँग लगा देता है। कोरोना की दहशत ने उसे पहले ही मौत की तरफ धकेल दिया। आज हम ये सोचने पर मजबूर हैं कि अकेले पड़ने पर या किसी भयावह स्थिति का सामना करने पर हम कितने मजबूत रह पाते हैं। शरीर की इम्युनिटी के साथ-साथ हमें मन की मजबूती भी चाहिए। 

कहते हैं शरीर की ताकत से बड़ी बुद्धि की ताकत होती है और बुद्धि की ताकत से भी बड़ी हमारे मन की ताकत यानि प्राण-शक्ति होती है।इस ऊर्जा को सही दिशा दीजिये। कोरोना वायरस एक हव्वा बन चुका है क्योंकि ये संक्रमण से फैलने वाली बीमारी का कारण है।इस से डरने की बजाय , सावधानियाँ बरतें। सैनिटाइज़्ड रहने का ख़्याल रखें , बाहर आना-जाना  बिल्कुल बन्द कर दें। सरकार ने इस महामारी से निबटने के सारे इन्तजाम कर रखे हैं।  दवाइयाँ , डॉक्टर ,सैनिटाइज्ड वार्ड्स ,एम्बुलैंस आदि सब तैयार हैं। जिस किसी में भी इसके लक्षण नजर आते हैं ,उसे अलग रखा जाता है तो इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है। आप अपनी जरुरत की सारी चीजें अपने साथ रख लें। फोन और सोशल मीडिया तो आपको सारी दुनिया से जोड़े रहता है। आप अलग-थलग हैं ही नहीं। इस वक्त का सही इस्तेमाल करें। नेट पर पसंदीदा पढ़िये।जैसे आप छुट्टी पर आये हों। अपने अन्तर्मन को शान्त रखिये। डॉक्टर की राय से चलिये। दवा अपना काम करेगी। सातवें दिन तक आपकी अपनी प्रतिरोधक क्षमता वायरस को खदेड़ देगी ,और आप स्वस्थ्य होते चले जायेंगे। बिना मौत आये क्यों मरें हम। 

जरा भी बेचैन न हों। होने वाली बात होगी न होने वाली बात कभी नहीं होगी। इसलिए एक बीमारी के साथ दूसरी बीमारी को आमन्त्रित मत करिये। वैसे भी हो सकता है कि आपको इसका संक्रमण हुआ ही न हो , या बहुत हल्का संक्रमण हो ,आपकी अपनी इम्युनिटी ही उसे समाप्त कर दे। अकेले पड़ने पर उदास न हों। जीवन की भाग-दौड़ में आप अपने साथ तो कभी बैठे ही नहीं।जो सब कुछ आपको मिला है उस सबका धन्यवाद करिये।साथ चलते साथियों के लिए श्रद्धा भाव रखिये। शिकायत करते रहेंगे तो अशान्त रहेंगे।अपनी ही शक्ति से अन्जान रहेंगे। बैठ कर अपनी प्राथमिकताएं तय कीजिये।बीमारी से उबर आने के बाद आप क्या क्या करना चाहेंगे ,ये सोचिये। 

अपने प्रियजनों से अलग रहना आपके और उनके दोनों के हित में है। फिर आप जितना सहज रहेंगे उतना ही प्राण-शक्ति से भरपूर रहेंगे। रोग को नौ दो ग्यारह होते देर न लगेगी। बिस्तर पर आराम करिये और सभी प्रियजनों के लिए मंगल कामना करिये। वो भी आपके लिए ऐसा ही कर रहे हैं। 

विचार ही विचार की औषधि है। संवेदनशीलता को अपनी कमजोरी नहीं ताकत बना लें। जो जितना अधिक शुभ विचारों ,शुभ संकल्पों से जुड़ा होता है उतना ही प्राण-शक्ति से भरपूर होता है। उतना ही उसकी ऊर्जा का क्षय कम होता है। बस यही कुँजी है सकारात्मकता की व इम्युनिटी बढ़ाने की। कोरोना को हराना है। हम होंगे कामयाब एक दिन..... बक अप 

रविवार, 15 दिसंबर 2019

रिश्तों की कटुता सँभालिये

रिश्ते तभी कटु होने लगते हैं , जब हम सिर्फ अपना हित देखते हैं। एकमात्र पति-पत्नी का रिश्ता ऐसा है जो कितना भी कटु हो जाये , अगर एक भी साथी प्यार से प्रयत्न करता है तो उसे वापिस सामान्य होने में देर नहीं लगती।कटुता माँ-बाप बच्चे , भाई बहन , पति पत्नी , बहु सास-ससुर या दामाद सास-ससुर किसी के बीच भी पनप सकती है।  मतभेद होते ही हम एक दूसरे के बारे में एक राय कायम कर लेते हैं ; फिर हमें उसका कोई भी गुण दिखाई नहीं देता। बात से बात और बढ़ती है।खाई और गहरी होती जाती है। अब बर्दाश्त करना मुश्किल होता जाता है।

आज हर कोई स्वछंद रहना चाहता है। टोका-टाकी बर्दाश्त नहीं करता। उसे इस बात का अहसास नहीं होता कि अगर वो रिश्तों की कद्र नहीं करता तो वो अकेला रह जाता है। आज हमारी सोसाइटी की सबसे बड़ी विडंबना अकेलेपन से उपजा फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन है। ये अकेलापन घर में सबके बीच में रहकर भी घेर लेता है। क्यूँकि हमारे रिश्ते सबके साथ सहज नहीं हैं। हमारा मन दूसरे से उम्मीद तो कर लेता है , पर खुद दूसरे के लिये कुछ नहीं करता। हमारी अपनी ईगो उस घेरे को लाँघने नहीं देती। और इस तरह दूरियाँ बढ़ती जाती हैं , अब रिश्तों को बर्दाश्त करना मुश्किल होता जाता है ; फिर स्प्रिंग की तरह अंदर दबाया हुआ सब कुछ बाहर उछल पड़ता है। रिश्तों की गरिमा धरी की धरी रह जाती है। साथ रहने के फायदे और झगड़े के बाद क्या क्या नुक्सान होगा , ये हम नहीं देख पाते।

इस सबमे सबसे बड़ा नुक्सान छोटे बच्चों का होता है , जो अभी दुनिया को ठीक से समझ भी नहीं पाये होते। उन्हें जरुरत होती है एक सिक्योर्ड (सुरक्षित) बचपन की। ये कन्फ्यूज्ड परस्नैलिटीज जो खुद ही इतने तनाव से गुजर रही होती हैं ,उन्हें क्या देंगी। ऐसे में बच्चों के आत्मविष्वास को गहरी चोट पहुँचती है ,जो उन्हें समाज में घुलने-मिलने नहीं देती। निसंदेह हमारा बचपन हमारे भविष्य की नींव होता है। जाने-अन्जाने में ऐसे माँ-बाप अपनी ही पूँछ कुतर रहे होते हैं।

समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो , हमेशा कोई न कोई बीच का रास्ता होता है ,जिसमें दोनों पक्ष सहमत हों। अपनी साथी की उम्मीदों का ख्याल रखिये। रिश्ते हमारी जड़ों में खाद-पानी का काम करते हैं ; किसी भी पौधे को उसकी जमीन से अलग मत करिये वरना वो मुरझा जायेगा। दूसरे का ख्याल आप तब तक नहीं रख सकते जब तक आपके दिल में उसके लिए कटुता खत्म नहीं होती। कटुता खत्म सिर्फ तब होगी जब आपके दिल में उसके लिए स्नेह हो। आप उसकी परेशानी समझते हों।

जिस तरह आपकी ज़िन्दगी कीमती है , उसी तरह दूसरे की कीमत आँकिये। कभी किसी अनहोनी का सबब मत बनिये , फिर न दिन का चैन होगा न रात की नींद। ये तो एक कला है जिसमे आप दूसरे को तकलीफ नहीं देते तो आप खुद भी चैन की नींद सोते हैं। मगर अगर दिल में प्यार या जगह नहीं है तो आप किसी को एक ग्लास पानी पिलाना भी गवारा नहीं करेंगे।घर में झगड़ा तन-मन राख कर देता है। ऐसे में आप व्यक्तित्व-विकास , आत्म-विष्वास , संतुलित व्यक्तित्व और सुख-चैन की बड़ी-बड़ी बातें भूल जाइये। हम अपना कितना बड़ा नुक्सान कर बैठते हैं ! कहते हैं कि अगर आप सँवार नहीं सकते तो बिगाड़िये मत। बस इतना सा ही प्रयत्न करना है। मगर क्या ये बातें समझाने से कोई मानेगा ! सिर्फ जब बात अपने दिल से उठेगी , तभी ज़िन्दगी पर लागू होगी।

आपका सुकून , आपका स्वर्ग आपके घर में है। जब यहाँ सुखी होंगें , तभी सम्पूर्ण विकास हो पायेगा। पहले घर फिर समाज सेवा। जिम्मेदारियों से भागना जीवन से भागना है। स्वीकार भाव के साथ कर्म करने से सब आसान लगता है।  जँग लग कर खत्म होने से अच्छा है , किसी के काम आयें। भले ही दुनिया की नजरों में कुछ हासिल न कर पायें , मगर ये क्या कम है कि आप अपने घर के चार लोगों की ज़िन्दगी को मुस्कान दे पायें या सँवार पायें या कम से कम उसे बिगड़ने से रोक पायें। आपका सुकून आपका आत्म-विष्वास है , आपकी सुन्दरता है।



शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

बुराड़ी काण्ड ,अन्ध-विष्वास की पराकाष्ठा

बुराड़ी काण्ड , एक साथ ११ लोगों की दिल दहला देने वाली आत्महत्या ; पहली ही नजर में ये तो साफ समझ में आता है कि उनमे से कोई भी ये समझ नहीं पाया था कि इस हादसे में उनकी जान चली जायेगी।  अगले दिन के लिये छोले भिगो कर रखना , दही जमा कर रखना और फिर ललित का उसी दिन फोन रिचार्ज कराना ; कहते हैं कि इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते , सालों बाद भी गढ़े मुर्दे बोल पड़ते हैं। अगर इन आत्म हत्याओं के पीछे उकसाने जैसी कोई साजिश नजर आती है तो ललित के फोन का बैलेंस देख कर समझ आ सकता है कि कितना इस्तेमाल हो चुका था।  उनकी किसी डायरी में ये भी लिखा है कि फोन का इस्तेमाल कम से कम करना ; फिर उसी दिन रिचार्ज भी कराया जाता है , हो सकता है कॉल्स डिलीट भी कर दी जाती रही हों। मद्धिम रोशनी तो हिप्नोटिज्म में इस्तेमाल की जाती है। अगर किसी को इन सबकी मौत से फायदा होता हो या हो सकता है कि  इसकी तह में कोई रंजिश ही हो। और पूर्व जन्म और आत्मा-परमात्मा में विष्वास को भुना लिया गया हो। 

प्रथम दृष्टया ये अन्धविष्वास की कहानी ही नजर आती है। मृत पिता को साक्षात देखने और उनके निर्देश मानने में पूरे परिवार का आँख मूँद कर विष्वास था। हैरानी की बात है कि छोटे बड़े सब इस बात को हजम कर गये  और इसकी किसी को भनक तक न लगी। एक संभावना ये भी है कि मैडिकल साइंस के अनुसार ऐसी बीमारियाँ होती हैं ; जैसे कि हैल्युसिनेशन में मरीज जिसके बारे में सोचता है उसे भ्रम होता है कि वो उसके सामने है। अब यहाँ तो पूरा परिवार ही उसके साथ हो लिया। शायद कहानी बदल जाती अगर एक भी व्यक्ति इसमें विष्वास न करके उसे डॉक्टर के पास ले जाता ,फिर मोक्ष पाने की नाटकीयता उन्हें ले डूबी। कोई सही मार्ग-दर्शक उन्हें मिलता तो समझाता कि कि स्वर्ग-नर्क इसी दुनिया में हैं और मुक्ति भी इसी दुनिया में पाई जा सकती है। मुक्ति शरीर त्याग है ही नहीं। मुक्ति मिलती है आसक्ति त्याग से। आसक्ति त्याग से सुख में अहँकार नहीं आता और दुख में दुख का अहसास नहीं होता। अपनी समझ खोलने का ये परिश्रम शरीर रहते ही सम्भव है। इतना अनमोल जीवन और कौड़ियों के भाव खो दिया। 

ऐसी कैसी वट-पूजा होती है कि सब के सब बरगद की जटाओं सा लटक गये। आँखों पर पट्टी ,हाथ बँधे हुए और गले में फन्दे , कौन मूर्ख इस खेल का अन्जाम नहीं जानता। ये तो अन्ध-विष्वास की पराकाष्ठा हो गई ;पहले मृतात्मा से लगातार साक्षात्कार फिर अन्ध-भक्ति के साथ ऐसी क्रियाएँ करना। 

बुराड़ी काण्ड जैसे काण्डों से हमें सीख लेनी चाहिये कि किसी भी काली या मैली विद्या का फल सकारात्मक हो ही नहीं सकता। इसलिए किसी भी भेड़-चाल में मत आइये।  तान्त्रिक बाबाओं , टोने-टोटके वालों का मकसद आपके विष्वास और भावनाओं को उकसा कर अपनी जेबें भरना है बस। होने वाली बात होगी , नहीं होने वाली बात नहीं होगी ; दिया आपकी अपनी आस्था ने जलाया होता है। कोई शरीर रहते किसी अशरीरी आत्मा को नहीं देख सकता।  ऐसे बहुत सारे उदाहरण हुए हैं जब लोग भगवान देखने से लेकर भगवान बन जाने तक की बात करते हैं ; और वो भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं निकले। प्रेरणा हमेशा शुभ संकल्पों से जुड़ी होती है। ईश्वर तो है ही अदृश्य न्याय-सत्ता का नाम। आपने जाने-अन्जाने जो भी दुनिया को दिया , लौट कर आयेगा। इसलिये विवेक बुद्धि से चलिए , अपनी तरफ से गल्ती न करिये ,अपनी आँखें खुली रखिये। कर्म-काण्डों , नकारात्मक ऊर्जा के नाम पर किसी की भी चाल में मत  आइये।  ये लोग उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ लेंगे। आत्मिक उन्नति का रास्ता और मैली विद्याओं का रास्ता पृथक-पृथक होता है। 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

लगातार बढ़ती हुईं रोड रेज की समस्याएँ

 आज मामूली सी कहासुनी भी वाद-विवाद में बदल जाती है। राह चलते जरा सी झड़प भी कब हिंसा में तब्दील हो जाती है कि अन्जाम काबू से बाहर हो जाता है , कह नहीं सकते। इस भागती-दौड़ती दुनिया में हर कोई व्यस्त भी है और कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। लगातार बढ़ते हुए ट्रैफिक और पार्किंग की समस्या भी मुँह बायें खड़ी है। व्यक्ति पहले से ही तनाव में है। न तो वो खुद को तनाव-रहित कर पाता है न ही और ज्यादा तनाव बर्दाश्त करने की क्षमता उसके पास बचती है। ऐसे लगता है कि जैसे वो बारूद के ढेर पर बैठा है ; बस चिन्गारी दिखाने भर की देर है कि बम सा फट पड़ता है। दूसरी बात वो किसी और को स्वीकार ही नहीं कर पाता।  अहम इतना ज्यादा है कि अपना हाथ ऊपर ही रखना चाहता है।  अपने तरीके से दुनिया को चलाना चाहता है। दुनिया के बीच ही नहीं घर में चार जनों के बीच भी टकराव ही मिलेगा। 

दृश्य की दूसरी साइड वो देख ही नहीं पाता।  कोई जान-बूझ कर हादसा नहीं करता।  जल्दबाजी , कम एक्सपर्टाइज ( अनुभवहीनता ) या फिर वही तनाव और उम्मीद टकराहट का कारण बनते हैं। फिर न कोई उम्र देखता है न इज्ज़त ; गलत हमेशा दूसरा ही होता है।अब लड़ाई में , अनर्गल गाली-गलौच में ,मार-कुटाई में वक़्त का कितना भी नुक्सान हो जाता है। और उस से बढ़ कर भी जो तनाव उसके मस्तिष्क की नसों ने झेला ; वो रात-दिन उसे सोने नहीं देगा। ये किसी को नहीं पता होता कि मामूली सी झगड़ा भी कत्ले-आम की वजह तक बन सकता है। 

बात को सँभाल ले जाना या बर्दाश्त कर लेना , ये तो समझ-दारी की बात है न कि कमजोरी की। अपने स्वाभिमान को सबके सम्मान के साथ जोड़ लें तो टकराव होगा ही नहीं ; या फिर कम से कम होगा। जरुरत है तो बस तनाव-रहित रहने की।  जिस तरह आप ट्रैफिक में गाड़ी बचा-बचा कर निकालते हैं ; उसी तरह अनावश्यक रूप से उलझने की बजाय अपने आपको बचा कर निकालिये। क्योंकि जिनसे आप उलझते हैं वो कम या ज्यादा आपकी सी ही मनो-दशा से गुजर रहे होते हैं। कोई भी भौतिक नुक्सान पैसे का या वक़्त का,आपकी मानसिक शान्ति या ज़िन्दगी से बढ़ कर नहीं होता। रुक कर जरा सोचें कि उलझ कर जो नुक्सान होगा ; उसकी भरपाई वक़्त भी न कर सकेगा। आप सारी दुनिया को सिखा नहीं सकते। सिर्फ वही बदलेगा जो आपकी बात सुनना चाहेगा। जोर-जबर्दस्ती या डण्डे के बल पर कोई बात अगर मनवा भी ली जाये तब भी दूरगामी परिणाम कभी अच्छे नहीं आते।  इतिहास गवाह है कि दबाने के साथ विद्रोह या बगावत के स्वर भी साथ ही उठते हैं। आवेश और उत्तेजना में कोई भी निर्णय सही नहीं लिया जा सकता। और ज़रा अपना चेहरा देखें कि क्या हाल हुआ है। क्रोध पर नियन्त्रण रखें तभी आप दूसरी तरफ के हालात देख पायेंगे यानि दूसरे के दृष्टि-कोण से भी सोच पायेंगे और रोड-रेज के कारण हुई क्षति पर लगाम लग पायेगी।