शुक्रवार, 20 मार्च 2020

कोरोना को हराना है

सिडनी , ऑस्ट्रेलिया से लौटा ३५ साल का युवक भारत पहुँचता है , स्क्रीनिंग में हल्का बुखार पाये जाने पर टेस्ट के लिए अस्पताल लाया जाता है। अभी तो टेस्ट की रिपोर्ट भी नहीं आती और वो घबरा कर अस्पताल की सातवीं मँजिल से नीचे छलाँग लगा देता है। कोरोना की दहशत ने उसे पहले ही मौत की तरफ धकेल दिया। आज हम ये सोचने पर मजबूर हैं कि अकेले पड़ने पर या किसी भयावह स्थिति का सामना करने पर हम कितने मजबूत रह पाते हैं। शरीर की इम्युनिटी के साथ-साथ हमें मन की मजबूती भी चाहिए। 

कहते हैं शरीर की ताकत से बड़ी बुद्धि की ताकत होती है और बुद्धि की ताकत से भी बड़ी हमारे मन की ताकत यानि प्राण-शक्ति होती है।इस ऊर्जा को सही दिशा दीजिये। कोरोना वायरस एक हव्वा बन चुका है क्योंकि ये संक्रमण से फैलने वाली बीमारी का कारण है।इस से डरने की बजाय , सावधानियाँ बरतें। सैनिटाइज़्ड रहने का ख़्याल रखें , बाहर आना-जाना  बिल्कुल बन्द कर दें। सरकार ने इस महामारी से निबटने के सारे इन्तजाम कर रखे हैं।  दवाइयाँ , डॉक्टर ,सैनिटाइज्ड वार्ड्स ,एम्बुलैंस आदि सब तैयार हैं। जिस किसी में भी इसके लक्षण नजर आते हैं ,उसे अलग रखा जाता है तो इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है। आप अपनी जरुरत की सारी चीजें अपने साथ रख लें। फोन और सोशल मीडिया तो आपको सारी दुनिया से जोड़े रहता है। आप अलग-थलग हैं ही नहीं। इस वक्त का सही इस्तेमाल करें। नेट पर पसंदीदा पढ़िये।जैसे आप छुट्टी पर आये हों। अपने अन्तर्मन को शान्त रखिये। डॉक्टर की राय से चलिये। दवा अपना काम करेगी। सातवें दिन तक आपकी अपनी प्रतिरोधक क्षमता वायरस को खदेड़ देगी ,और आप स्वस्थ्य होते चले जायेंगे। बिना मौत आये क्यों मरें हम। 

जरा भी बेचैन न हों। होने वाली बात होगी न होने वाली बात कभी नहीं होगी। इसलिए एक बीमारी के साथ दूसरी बीमारी को आमन्त्रित मत करिये। वैसे भी हो सकता है कि आपको इसका संक्रमण हुआ ही न हो , या बहुत हल्का संक्रमण हो ,आपकी अपनी इम्युनिटी ही उसे समाप्त कर दे। अकेले पड़ने पर उदास न हों। जीवन की भाग-दौड़ में आप अपने साथ तो कभी बैठे ही नहीं।जो सब कुछ आपको मिला है उस सबका धन्यवाद करिये।साथ चलते साथियों के लिए श्रद्धा भाव रखिये। शिकायत करते रहेंगे तो अशान्त रहेंगे।अपनी ही शक्ति से अन्जान रहेंगे। बैठ कर अपनी प्राथमिकताएं तय कीजिये।बीमारी से उबर आने के बाद आप क्या क्या करना चाहेंगे ,ये सोचिये। 

अपने प्रियजनों से अलग रहना आपके और उनके दोनों के हित में है। फिर आप जितना सहज रहेंगे उतना ही प्राण-शक्ति से भरपूर रहेंगे। रोग को नौ दो ग्यारह होते देर न लगेगी। बिस्तर पर आराम करिये और सभी प्रियजनों के लिए मंगल कामना करिये। वो भी आपके लिए ऐसा ही कर रहे हैं। 

विचार ही विचार की औषधि है। संवेदनशीलता को अपनी कमजोरी नहीं ताकत बना लें। जो जितना अधिक शुभ विचारों ,शुभ संकल्पों से जुड़ा होता है उतना ही प्राण-शक्ति से भरपूर होता है। उतना ही उसकी ऊर्जा का क्षय कम होता है। बस यही कुँजी है सकारात्मकता की व इम्युनिटी बढ़ाने की। कोरोना को हराना है। हम होंगे कामयाब एक दिन..... बक अप 

रविवार, 15 दिसंबर 2019

रिश्तों की कटुता सँभालिये

रिश्ते तभी कटु होने लगते हैं , जब हम सिर्फ अपना हित देखते हैं। एकमात्र पति-पत्नी का रिश्ता ऐसा है जो कितना भी कटु हो जाये , अगर एक भी साथी प्यार से प्रयत्न करता है तो उसे वापिस सामान्य होने में देर नहीं लगती।कटुता माँ-बाप बच्चे , भाई बहन , पति पत्नी , बहु सास-ससुर या दामाद सास-ससुर किसी के बीच भी पनप सकती है।  मतभेद होते ही हम एक दूसरे के बारे में एक राय कायम कर लेते हैं ; फिर हमें उसका कोई भी गुण दिखाई नहीं देता। बात से बात और बढ़ती है।खाई और गहरी होती जाती है। अब बर्दाश्त करना मुश्किल होता जाता है।

आज हर कोई स्वछंद रहना चाहता है। टोका-टाकी बर्दाश्त नहीं करता। उसे इस बात का अहसास नहीं होता कि अगर वो रिश्तों की कद्र नहीं करता तो वो अकेला रह जाता है। आज हमारी सोसाइटी की सबसे बड़ी विडंबना अकेलेपन से उपजा फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन है। ये अकेलापन घर में सबके बीच में रहकर भी घेर लेता है। क्यूँकि हमारे रिश्ते सबके साथ सहज नहीं हैं। हमारा मन दूसरे से उम्मीद तो कर लेता है , पर खुद दूसरे के लिये कुछ नहीं करता। हमारी अपनी ईगो उस घेरे को लाँघने नहीं देती। और इस तरह दूरियाँ बढ़ती जाती हैं , अब रिश्तों को बर्दाश्त करना मुश्किल होता जाता है ; फिर स्प्रिंग की तरह अंदर दबाया हुआ सब कुछ बाहर उछल पड़ता है। रिश्तों की गरिमा धरी की धरी रह जाती है। साथ रहने के फायदे और झगड़े के बाद क्या क्या नुक्सान होगा , ये हम नहीं देख पाते।

इस सबमे सबसे बड़ा नुक्सान छोटे बच्चों का होता है , जो अभी दुनिया को ठीक से समझ भी नहीं पाये होते। उन्हें जरुरत होती है एक सिक्योर्ड (सुरक्षित) बचपन की। ये कन्फ्यूज्ड परस्नैलिटीज जो खुद ही इतने तनाव से गुजर रही होती हैं ,उन्हें क्या देंगी। ऐसे में बच्चों के आत्मविष्वास को गहरी चोट पहुँचती है ,जो उन्हें समाज में घुलने-मिलने नहीं देती। निसंदेह हमारा बचपन हमारे भविष्य की नींव होता है। जाने-अन्जाने में ऐसे माँ-बाप अपनी ही पूँछ कुतर रहे होते हैं।

समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो , हमेशा कोई न कोई बीच का रास्ता होता है ,जिसमें दोनों पक्ष सहमत हों। अपनी साथी की उम्मीदों का ख्याल रखिये। रिश्ते हमारी जड़ों में खाद-पानी का काम करते हैं ; किसी भी पौधे को उसकी जमीन से अलग मत करिये वरना वो मुरझा जायेगा। दूसरे का ख्याल आप तब तक नहीं रख सकते जब तक आपके दिल में उसके लिए कटुता खत्म नहीं होती। कटुता खत्म सिर्फ तब होगी जब आपके दिल में उसके लिए स्नेह हो। आप उसकी परेशानी समझते हों।

जिस तरह आपकी ज़िन्दगी कीमती है , उसी तरह दूसरे की कीमत आँकिये। कभी किसी अनहोनी का सबब मत बनिये , फिर न दिन का चैन होगा न रात की नींद। ये तो एक कला है जिसमे आप दूसरे को तकलीफ नहीं देते तो आप खुद भी चैन की नींद सोते हैं। मगर अगर दिल में प्यार या जगह नहीं है तो आप किसी को एक ग्लास पानी पिलाना भी गवारा नहीं करेंगे।घर में झगड़ा तन-मन राख कर देता है। ऐसे में आप व्यक्तित्व-विकास , आत्म-विष्वास , संतुलित व्यक्तित्व और सुख-चैन की बड़ी-बड़ी बातें भूल जाइये। हम अपना कितना बड़ा नुक्सान कर बैठते हैं ! कहते हैं कि अगर आप सँवार नहीं सकते तो बिगाड़िये मत। बस इतना सा ही प्रयत्न करना है। मगर क्या ये बातें समझाने से कोई मानेगा ! सिर्फ जब बात अपने दिल से उठेगी , तभी ज़िन्दगी पर लागू होगी।

आपका सुकून , आपका स्वर्ग आपके घर में है। जब यहाँ सुखी होंगें , तभी सम्पूर्ण विकास हो पायेगा। पहले घर फिर समाज सेवा। जिम्मेदारियों से भागना जीवन से भागना है। स्वीकार भाव के साथ कर्म करने से सब आसान लगता है।  जँग लग कर खत्म होने से अच्छा है , किसी के काम आयें। भले ही दुनिया की नजरों में कुछ हासिल न कर पायें , मगर ये क्या कम है कि आप अपने घर के चार लोगों की ज़िन्दगी को मुस्कान दे पायें या सँवार पायें या कम से कम उसे बिगड़ने से रोक पायें। आपका सुकून आपका आत्म-विष्वास है , आपकी सुन्दरता है।



शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

बुराड़ी काण्ड ,अन्ध-विष्वास की पराकाष्ठा

बुराड़ी काण्ड , एक साथ ११ लोगों की दिल दहला देने वाली आत्महत्या ; पहली ही नजर में ये तो साफ समझ में आता है कि उनमे से कोई भी ये समझ नहीं पाया था कि इस हादसे में उनकी जान चली जायेगी।  अगले दिन के लिये छोले भिगो कर रखना , दही जमा कर रखना और फिर ललित का उसी दिन फोन रिचार्ज कराना ; कहते हैं कि इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते , सालों बाद भी गढ़े मुर्दे बोल पड़ते हैं। अगर इन आत्म हत्याओं के पीछे उकसाने जैसी कोई साजिश नजर आती है तो ललित के फोन का बैलेंस देख कर समझ आ सकता है कि कितना इस्तेमाल हो चुका था।  उनकी किसी डायरी में ये भी लिखा है कि फोन का इस्तेमाल कम से कम करना ; फिर उसी दिन रिचार्ज भी कराया जाता है , हो सकता है कॉल्स डिलीट भी कर दी जाती रही हों। मद्धिम रोशनी तो हिप्नोटिज्म में इस्तेमाल की जाती है। अगर किसी को इन सबकी मौत से फायदा होता हो या हो सकता है कि  इसकी तह में कोई रंजिश ही हो। और पूर्व जन्म और आत्मा-परमात्मा में विष्वास को भुना लिया गया हो। 

प्रथम दृष्टया ये अन्धविष्वास की कहानी ही नजर आती है। मृत पिता को साक्षात देखने और उनके निर्देश मानने में पूरे परिवार का आँख मूँद कर विष्वास था। हैरानी की बात है कि छोटे बड़े सब इस बात को हजम कर गये  और इसकी किसी को भनक तक न लगी। एक संभावना ये भी है कि मैडिकल साइंस के अनुसार ऐसी बीमारियाँ होती हैं ; जैसे कि हैल्युसिनेशन में मरीज जिसके बारे में सोचता है उसे भ्रम होता है कि वो उसके सामने है। अब यहाँ तो पूरा परिवार ही उसके साथ हो लिया। शायद कहानी बदल जाती अगर एक भी व्यक्ति इसमें विष्वास न करके उसे डॉक्टर के पास ले जाता ,फिर मोक्ष पाने की नाटकीयता उन्हें ले डूबी। कोई सही मार्ग-दर्शक उन्हें मिलता तो समझाता कि कि स्वर्ग-नर्क इसी दुनिया में हैं और मुक्ति भी इसी दुनिया में पाई जा सकती है। मुक्ति शरीर त्याग है ही नहीं। मुक्ति मिलती है आसक्ति त्याग से। आसक्ति त्याग से सुख में अहँकार नहीं आता और दुख में दुख का अहसास नहीं होता। अपनी समझ खोलने का ये परिश्रम शरीर रहते ही सम्भव है। इतना अनमोल जीवन और कौड़ियों के भाव खो दिया। 

ऐसी कैसी वट-पूजा होती है कि सब के सब बरगद की जटाओं सा लटक गये। आँखों पर पट्टी ,हाथ बँधे हुए और गले में फन्दे , कौन मूर्ख इस खेल का अन्जाम नहीं जानता। ये तो अन्ध-विष्वास की पराकाष्ठा हो गई ;पहले मृतात्मा से लगातार साक्षात्कार फिर अन्ध-भक्ति के साथ ऐसी क्रियाएँ करना। 

बुराड़ी काण्ड जैसे काण्डों से हमें सीख लेनी चाहिये कि किसी भी काली या मैली विद्या का फल सकारात्मक हो ही नहीं सकता। इसलिए किसी भी भेड़-चाल में मत आइये।  तान्त्रिक बाबाओं , टोने-टोटके वालों का मकसद आपके विष्वास और भावनाओं को उकसा कर अपनी जेबें भरना है बस। होने वाली बात होगी , नहीं होने वाली बात नहीं होगी ; दिया आपकी अपनी आस्था ने जलाया होता है। कोई शरीर रहते किसी अशरीरी आत्मा को नहीं देख सकता।  ऐसे बहुत सारे उदाहरण हुए हैं जब लोग भगवान देखने से लेकर भगवान बन जाने तक की बात करते हैं ; और वो भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं निकले। प्रेरणा हमेशा शुभ संकल्पों से जुड़ी होती है। ईश्वर तो है ही अदृश्य न्याय-सत्ता का नाम। आपने जाने-अन्जाने जो भी दुनिया को दिया , लौट कर आयेगा। इसलिये विवेक बुद्धि से चलिए , अपनी तरफ से गल्ती न करिये ,अपनी आँखें खुली रखिये। कर्म-काण्डों , नकारात्मक ऊर्जा के नाम पर किसी की भी चाल में मत  आइये।  ये लोग उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ लेंगे। आत्मिक उन्नति का रास्ता और मैली विद्याओं का रास्ता पृथक-पृथक होता है। 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

लगातार बढ़ती हुईं रोड रेज की समस्याएँ

 आज मामूली सी कहासुनी भी वाद-विवाद में बदल जाती है। राह चलते जरा सी झड़प भी कब हिंसा में तब्दील हो जाती है कि अन्जाम काबू से बाहर हो जाता है , कह नहीं सकते। इस भागती-दौड़ती दुनिया में हर कोई व्यस्त भी है और कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। लगातार बढ़ते हुए ट्रैफिक और पार्किंग की समस्या भी मुँह बायें खड़ी है। व्यक्ति पहले से ही तनाव में है। न तो वो खुद को तनाव-रहित कर पाता है न ही और ज्यादा तनाव बर्दाश्त करने की क्षमता उसके पास बचती है। ऐसे लगता है कि जैसे वो बारूद के ढेर पर बैठा है ; बस चिन्गारी दिखाने भर की देर है कि बम सा फट पड़ता है। दूसरी बात वो किसी और को स्वीकार ही नहीं कर पाता।  अहम इतना ज्यादा है कि अपना हाथ ऊपर ही रखना चाहता है।  अपने तरीके से दुनिया को चलाना चाहता है। दुनिया के बीच ही नहीं घर में चार जनों के बीच भी टकराव ही मिलेगा। 

दृश्य की दूसरी साइड वो देख ही नहीं पाता।  कोई जान-बूझ कर हादसा नहीं करता।  जल्दबाजी , कम एक्सपर्टाइज ( अनुभवहीनता ) या फिर वही तनाव और उम्मीद टकराहट का कारण बनते हैं। फिर न कोई उम्र देखता है न इज्ज़त ; गलत हमेशा दूसरा ही होता है।अब लड़ाई में , अनर्गल गाली-गलौच में ,मार-कुटाई में वक़्त का कितना भी नुक्सान हो जाता है। और उस से बढ़ कर भी जो तनाव उसके मस्तिष्क की नसों ने झेला ; वो रात-दिन उसे सोने नहीं देगा। ये किसी को नहीं पता होता कि मामूली सी झगड़ा भी कत्ले-आम की वजह तक बन सकता है। 

बात को सँभाल ले जाना या बर्दाश्त कर लेना , ये तो समझ-दारी की बात है न कि कमजोरी की। अपने स्वाभिमान को सबके सम्मान के साथ जोड़ लें तो टकराव होगा ही नहीं ; या फिर कम से कम होगा। जरुरत है तो बस तनाव-रहित रहने की।  जिस तरह आप ट्रैफिक में गाड़ी बचा-बचा कर निकालते हैं ; उसी तरह अनावश्यक रूप से उलझने की बजाय अपने आपको बचा कर निकालिये। क्योंकि जिनसे आप उलझते हैं वो कम या ज्यादा आपकी सी ही मनो-दशा से गुजर रहे होते हैं। कोई भी भौतिक नुक्सान पैसे का या वक़्त का,आपकी मानसिक शान्ति या ज़िन्दगी से बढ़ कर नहीं होता। रुक कर जरा सोचें कि उलझ कर जो नुक्सान होगा ; उसकी भरपाई वक़्त भी न कर सकेगा। आप सारी दुनिया को सिखा नहीं सकते। सिर्फ वही बदलेगा जो आपकी बात सुनना चाहेगा। जोर-जबर्दस्ती या डण्डे के बल पर कोई बात अगर मनवा भी ली जाये तब भी दूरगामी परिणाम कभी अच्छे नहीं आते।  इतिहास गवाह है कि दबाने के साथ विद्रोह या बगावत के स्वर भी साथ ही उठते हैं। आवेश और उत्तेजना में कोई भी निर्णय सही नहीं लिया जा सकता। और ज़रा अपना चेहरा देखें कि क्या हाल हुआ है। क्रोध पर नियन्त्रण रखें तभी आप दूसरी तरफ के हालात देख पायेंगे यानि दूसरे के दृष्टि-कोण से भी सोच पायेंगे और रोड-रेज के कारण हुई क्षति पर लगाम लग पायेगी। 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

नशा , ड्रग्स और एडिक्शन

वो बज़ आने तलक ग्लास पर ग्लास चढ़ाता जा रहा था। आज की युवा पीढ़ी या किशोरावस्था के बच्चे एल्कोहल , ड्रग्स या नशे के लिए प्रयोग की जाने वाली दूसरी वस्तुओं को बड़ी आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। उसे सब्जबाग दिखाये जाते हैं कि पार्टी करना , मौज-मस्ती करना ही जीवन का ध्येय है।  और इस तरह वो इनके चँगुल फँसता है। गम गलत करने को यानि दुनिया से भागने को भी उसे यही इलाज दिखता है। दो चार बार लेकर ये जरुरत बनने लगता है और फिर इन्सान को एडिक्ट कर देता है यानि नकारा बना देता है। जैसे उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ लिया हो उसने। अब वो किसी भी कीमत पर उसे पाना चाहता है। नशे के लिए चोरी ,सीना-जोरी सब सीखता है। 

ड्रग्स यानि नशा शारीरिक सेहत , मानसिक सेहत ही नहीं सोशल आस्पेक्ट्स पर भी असर करते हैं। शरीर के पोषक तत्व नष्ट होते जाते हैं। इम्युनिटी कम होती जाती है। गर्म तासीर की वजह से बिलरुबिन काउन्ट बढ़ता है तो लिवर को नुक्सान पहुंचने लगता है। मानसिक तौर पर शुरुआत में कन्सन्ट्रेशन की कमी होती है , सर दर्द ,पढ़ने में या किसी भी काम में मन नहीं लगता ; हर वक़्त वही धुन समाई रहती है।  अपनों से , सामाजिक कृत्यों से वो जी चुराने लगता है।  जिनके साथ ड्रग्स लेता है बस उनकी ही सँगत करता है।  समाज में लोग ड्रग्स लेने वालों का बहिष्कार करते हैं। बात-बात पर गुस्सा आता है , चिड़चिड़ाहट होने लगती है।  स्वाभाविक तौर पर अपनी जिम्मेदारियों से भागता है। 

युवा पीढ़ी की दलील होगी कि उसे इसमें ही ख़ुशी मिलती है। इस भ्रम से निकालना आसान तो नहीं , मगर नामुमकिन भी नहीं। जिस पार्टी मौजमस्ती की बात वो करते हैं वो तो कोई जूस पार्टी , फ्रूट पार्टी , भुट्टा पार्टी या पूल लन्च या डिनर मना कर भी पाई जा सकती है। ख़ुशी तो हमारे ख्यालों में होती है एल्कोहल या नशे में नहीं। इससे पहले कि बहुत देर हो जाये अपनी सेहत , अपने मन-प्राण सँरक्षित कर लो। अपने लिये नहीं तो अपने परिवार , अपने साथी और समाज के लिये खुद को और खुद की इमेज को बचा लो। दिल में कोई उदासी , फ्रस्ट्रेशन , नाउम्मीदी है तो उसे अपने परिवार के साथ शेयर करो।  हर डर का सामना करो वो भाग जायेगा।  ड्रग्स की खोज बीमारी में दवा की तरह प्रयोग करने के लिये हुई थी। ड्रग्स का व्यापार करने वालों ने अपने नफे की खातिर युवा पीढ़ी और कमजोर मानसिकता वालों को निशाना बनाया , क्योंकि वो ही आसानी से फँस सकते हैं। यानि आपका इस्तेमाल किया जा रहा है। ये जानलेवा भी हो सकता है।

जागो युवा पीढ़ी , इस भ्रम से बाहर निकलो। होशो-हवास खो कर भी कोई खुश कैसे रह सकता है।  ऐसी हालत में कुछ भी उन्नीस इक्कीस हो सकता है ; जिसका बाद में पछतावा हो और जीवन भर शर्म आये। अपनी क्षमता को पहचानो। अच्छे आचरण की मिसाल बनो। भविष्य इन्तिज़ार कर रहा है , अपनी नींव खोखली मत करो। 

इक अदद सूरज की तलाश है 
कर दे उजियारा जो मलिन बस्ती में भी    

सोमवार, 26 जून 2017

छूटते जा रहे दादी-नानी के घर

सभी लोग छुट्टियों का भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं। पहाड़ों की हसीन वादियों का सफर हो या गोवा , महाराष्ट्रा , दक्षिण भारत या देश-विदेश के समुद्री तटों की सैर हो ; हर बार किसी नई जगह को नापने की इच्छा मन में जागती है। तरह-तरह के लज़ीज व्यँजन और रैस्टोरेन्ट्स का स्वाद मन को लुभाता है। पर्यटन को बढ़ावा देना व अपने विभिन्न प्रान्तों की सँस्कृति से परिचय देशाटन के जरिये जरूर सम्भव है। 

इंटरनेट ने घूमने-फिरने की सम्भावनाओं को सर्व-सुलभ और सुविधा-जनक कर दिया है। मगर इस सब में छुट्टियों में नानी-दादी के यहाँ जा कर लम्बी छुट्टियां मना कर आना बंद सा होता जा रहा है। छुट्टियों में बुआ , मामा , मासी , चाची , सबके बच्चों का जमावड़ा , साथ मिल-बाँट कर खाना , खेलना , काम करना और चौपाल जमाना , इस सब का मजा ही कुछ और था। दादी नानी के किस्से-कहानियों के साथ कब अच्छे सँस्कार बच्चों के दिल में उतर जाते ; पता ही नहीं चलता था। आज नेट और मोबाइल की दुनिया में डूबे बच्चे आभासी रिश्तों में जी रहे हैं। अपने आस-पास की जीती-जागती दुनिया से मुँह मोड़ कर कई बार हम अपने जरुरी काम भी पूरे नहीं कर पाते। शारीरिक खेल-कूद अब छूटते जा रहे हैं। वो अपनत्व , मजबूत भावनात्मक जुड़ाव ,जीवन मूल्य और प्रगाढ़ रिश्ते जैसे हम खोते जा रहे हैं। 

किताबें पढ़ने का वक़्त किसी के पास नहीं है। कोई भी देश अपने कविओं और साहित्यकारों की रचनाओं से समृद्ध माना जाता है।न तो आज किसी के पास पढ़ने का समय है न ही लिखने का। किण्डल , नेट और टी. वी. पर आँखें गढ़ाये बच्चों की आँखों पर चश्मा भी कम उम्र में ही चढ़ जाता है। 

गाँवों के चबूतरे अब सूने पड़े हैं। पार्टी करना आज भी सब बच्चों को पसन्द है ; मगर औपचारिकताएं ( फॉर्मेलिटी ) सबको आसानी से मिलने नहीं देतीं। बचपन उस अपनत्व और उन जीवन मूल्यों के बिना अधूरा है। कुल मिला कर हमने खोया ज्यादा और जो पाया वो ज्यादा सुकून नहीं पहुँचा सका।  

नई पीढ़ी के बच्चों ने नहीं देखा
धूप के रँगों को साँझ में घुलते हुए
हो गये हैं प्रकृति से दूर
खुद में उलझे हुए


कैसी होती है सुबह
नहीं देखा पूरब में सूरज को उगते हुए
नहीं देखा हवाओं को ,
चिड़ियों सा चहकते हुए


तुम्हारे घर में है भैंस , पेड़ ,
बिल्ली और बच्चे खेलते हुए
नहीं देखा शहरी पीढ़ी ने
जिन्दगी की खनक को गीत में ढलते हुए
नहीं देखा मिट्टी की सनक को ,
रूह में मचलते हुए
नई पीढ़ी के बच्चों ने नहीं देखा



बुधवार, 21 जून 2017

हर कोई अपनी-अपनी मनःस्थिति में जीता है

हम सभी लोग ज्यादातर अपनी अपनी परिस्थितियों के गुलाम हैं। ऐसा क्यों होता है कि कई बार किसी से बात करते हैं तो वो अचानक ऐसी प्रतिक्रिया देता है जो हमारी आशा के विपरीत होती है। हमें हैरान कर देने वाले नतीजों का सामना करना पड़ता है। किसी के दिल में क्या चल रहा है , कोई नहीं जानता।


हमारी अपनी पूर्व-निर्धारित धारणाएँ , सँस्कार ,आस्थाएँ और विष्वास हमें चलाते हैं। हमने धोखे खाये हैं तो सारी दुनिया के लिये एक ही दृष्टिकोण बना लेते हैं। अचानक विस्फोट जैसी प्रतिक्रिया ये बताती है कि उसका मन विक्षोभ से भरा हुआ है , और ये किसी एक दिन की सोच का नतीजा नहीं होता। किसी के बारे में हम एक बार कोई राय कायम कर लेते हैं तो फिर टस से मस नहीं होते। जबकि हमारा अपना मन पल-पल बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदलते देर नहीं लगती , मगर हम पर कैसे-कैसे प्रभाव छोड़ कर जाती हैं।मकड़ी की तरह अपने ही ख्यालों के बुने हुए जाल में फँसना नहीं चाहिए। 

हमारी सकारात्मक भावनाएँ (इमोशन्स ) ख़ुशी , अपनत्व , प्रेरणा और प्रफुल्लता लाते हैं।नकारात्मक भावनाएँ द्वेष , झगड़ा , तुलना ,आत्म-हीनता का बोध हमेशा गुस्सा और उदासी लाते हैं। हर भावना एक केमिकल रिएक्शन करती है। हमारे शरीर में ऐसे केमिकल सिकरीट करती है जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करते हैं। नकारात्मक भावों के साथ सिर दर्द ,ब्लड-प्रेशर , डायबिटीज , मोटापा, गैस ,अल्सर , डिप्रेशन आदि तनाव जनित बीमारियाँ हो सकती हैं। कोई भी रोग हो नकारात्मकता के साथ तेजी से बढ़ता है। यदि भावनाएँ सकारात्मक हों तो बीमारी जल्दी ठीक हो जाती है। सकारात्मक सोच रखने वाले को बीमारी जल्दी पकड़ती ही नहीं। 

जब तक हम परिस्थितिओं , व्यक्तिओं , वस्तुओं के प्रति जैसी वो हैं , वैसा ही स्वीकार भाव नहीं रखते ; हम सहज हो ही नहीं सकते। जो सहज और सरल नहीं है वो खुश नहीं रह सकता क्योंकि वो बनावटी है ,उसका व्यवहार आडम्बर-पूर्ण है। सहजता ही तनाव-मुक्त रखती है। तनाव के कारण ही भूलने की बीमारी भी होने लगती है। मस्तिष्क में तनाव ने जगह घेर रखी है तो रचनात्मकता कैसे आयेगी।तनाव-रहित बुद्धि ही नये आइडियाज ,नई खोजें और क्रिएटिव काम कर सकती है। काम में परफेक्शन ला सकती है। ये वैसे ही है जैसे आपको यात्रा पर जाना हो और यदि आपकी हर वस्तु यथास्थान रखी है तो आप सूटकेस खोल कर अपनी वस्तुएँ उठा कर सूटकेस में रखेंगे और चल पड़ेंगे अपने गन्तव्य की ओर , कोई टेन्शन नहीं। मगर अगर सब गड्ड-मड्ड है तो आप घबरायेंगे। दरअसल ऐसा ही हमारे मस्तिष्क का हाल है , बहुत ज्यादा चीजें अपने-अपने खाने में नहीं हैं और हम घबरा रहे हैं। जो स्मृतियाँ आपको नकारात्मकता दे रही हैं  , उन्हें दिल से निकाल दीजिये , भूल जाइये , माफ़ कर दीजिये । लोगों की मजबूरियां होती हैं , बेबसी भी हो सकती है वो अपने अपने दृष्टिकोण से देखते हैं। उनकी भी कड़वी यादें हैं , वो भी भटके हुए हैं। उनके अपने सँस्कार  हैं। इसलिए अपने मन की डेस्क को साफ़-सुथरा रखें ,तभी मन शान्त रहेगा।जहाँ तक परिस्थितियों की बात है वो भी बदलती रहती हैं ; समझदारी से वस्तु-स्थिति को सुलझाइये। खुद को अशान्त रखना बीमारियों को दावत देना है। 

जिसे तुम आज दुश्मन मान कर बैठे हो , वो कल तुम्हारा दोस्त भी हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे जो कल तुम्हारा दोस्त था आज दुश्मन है। स्वीकार भाव से विचारों का मतभेद मिटाया जा सकता है। इस बात पर भरोसा रखो कि आदमी का मन बदलने में देर नहीं लगती। ऐतबार के दरवाजे खुले रखो। ऐतबार ही मन की खुराक है। अपनी ज़ुबान से सुकून ही बाँटो।ज़िन्दगी अनमोल है। कभी भी किसी अनहोनी का सबब न बनो।  इस जन्म को ,अपने होने को सार्थक करें।