शनिवार, 27 अप्रैल 2013

टूटे खिलौने सा धर दिया

न जाने कितनी दामिनियाँ , गुड़ियाँ आदमी की कुत्सित सोच की भेंट चढ़ गईं। कहते हैं कि विध्वंस के लिये आदमी जितनी जल्दी एकजुट होता है , उतनी जल्दी सृजन के लिए नहीं होता। दामिनी की बदनसीबी देखिये कि उन छह दरिंदों में से एक ने भी इस काण्ड को अंजाम देने से रोकने के लिये विरोध तक न किया। आदमी की होशियारी देखिये कि बिना बोले आँख से ही खिल्ली उड़ा लेता है , दूसरे की टाँग खींच लेता है , एक बार भी नतीजे की परवाह नहीं करता। 
'जहाँ न पहुँचे रवि ,वहाँ पहुंचे कवि ' की तर्ज़ पर हमारा मीडिया हर जगह पहुँच जाता है। अपराधियों ने कभी न सोचा होगा कि उनके अपराध जग-जाहिर हो जायेंगे। और अगर आत्मा जगी हुई होती या अपराधों के प्रकाश में आने का डर उन्हें होता तो वो इतने जघन्य अपराध कर ही नहीं सकते थे। 
हम लोग लगे हुए हैं पुलिस , मुकदमा , सख्त सजा , सरकार का दबाव बनाने में।इतनी सख्त सजा जो किसी की रूह कंपा दे ..यानि भय से एक हद तक अपराध काबू में रह सकते हैं। यहाँ विचारणीय विषय यह है कि बढ़ते अपराधों का कारण क्या है। बहुत खुलापन या सीमा में रखने की कोशिश में पड़ा हुआ दबाव। यूरोपीय देशों की तर्ज़ पर फैशन , सर्वसुलभ मोबाइल और नेट पर मिली सुविधाओं का गलत प्रयोग और लुप्त होते हुए नैतिक मूल्य ..आदमी को कहाँ पहुँचायेंगे। जिस बात को दबाया जाए वो भी दुगनी ताकत से फूट पड़ती है , ये जग को विदित है। आदमी की सोच मायने रखती है , वो अपनी ताकत को सही दिशा देता है तो सृजन होता है। भटकने में देर नहीं लगती , अँकुश नहीं है तो विध्वंस भी दूर नहीं है। 
सारी कवायदें ज़िन्दगी की ज़िन्दगी के लिए 
सारे डर मौत के , विध्वंस के 
मेरी नजर में तो आदमी जीने के लिए सारी कवायदें करता है ..फिर ये क्या होता है कि भटक कर बिच्छू की तरह अपनी ही पूँछ खाने लग जाता है। 
इन अपराधिओं की मनो-चिकित्सकों द्वारा स्टडी की जानी चाहिए कि इनके बचपन या रोजमर्रा की ज़िन्दगी में ऐसा क्या-क्या शामिल था , जिसने इन्हें ऐसी कुत्सित सोच की तरफ धकेला। जब बीज पड़ा ही था उसे खाद-पानी न दिया जाता तो पौधा पनपता ही नहीं। गुड़िया के एक अपराधी की छह महीने पहले ही शादी हुई थी ,उसकी पत्नी कुछ दिन पहले उसे छोड़ कर चली गयी थी ; ऐसा टी वी न्यूज से पता चला। उसकी पत्नी से उसके रिश्ते कैसे थे , ये भी अपराधी की मानसिकता पर प्रकाश डाल सकते हैं। बीमार मानसिकता ही उन्हें इन अन्धी गलियों के कगार पर छोड़ गई है। 
निठारी-काण्ड को लीजिये। कितने बच्चों के कंकाल नाले से और किडनियाँ लिवर फ्रिज से मिले थे। सोच कर ही उबकाई आने लगती है। निष्ठुरता , बर्बरता कहें या क्या ? आदमी को आदमी भी न समझा गया। ये किसी स्वस्थ्य दिमाग का काम नहीं है। इनकी केस-हिस्टरी से शायद कोई ठोस हल निकल कर आये ..संस्कार-वान माँ-बाप , स्वस्थ्य बचपन के लिए किये गये उपक्रम ही समस्या के निदान का असली हल हैं। 

गुड़िया , खिलौने ला के देने की बजाय ,
तुझे खिलौना समझ लिया 
ये कैसे सिरफिरे हैं , 
कि बचपन मसल दिया 
ऐसे दागों के साथ परहेज करती है ज़िन्दगी ,
हक़ उसका सरे-आम कुचल दिया 
नन्हीं मैना क्या बतायेगी ,
टूटे खिलौने सा धर दिया 
गुड़ियों की दुनिया होती है बड़ी हसीन ,
चन्दा मामा होते हैं ,होती हैं परियाँ जादू की छड़ियाँ लिए हुए 
झरते हैं फूल डालियों से 
लग गये ग्रहण , तोड़ डाली कलियाँ ,
मन्जर बदल दिया 
मेरी गुड़िया ,सपने में भी तुझे सताये न कोई डर ,
हाय, माँ के काले टीके ने भी कोई असर न किया ...

शनिवार, 16 मार्च 2013

अन्तर्जाल की सुविधा

गाँव शहर एक होने लगे
दुनिया ग्लोबलाइज़ होने लगी
न्तर्जाल की दुनिया ने हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति के भी अन्तरंग पलों में झाँक लेने की सुविधा हमें दी है। गूगल सर्च तो जैसे हर मर्ज का इलाज हो। कैसा भी विषय हो हर सम्भव जानकारी और हल के सारे औप्शन्स  बस एक क्लिक के साथ हाजिर हो जाते हैं। मोबाइल और कम्प्यूटर ने नेट के जरिये दुनिया को छोटा कर दिया  है या यूँ कहिये हमारे दायरे को विस्तार दे दिया है।
चिन्ता का विषय ये है कि हर हाथ में अन्तर्जाल की सुविधा ने जैसे हर किसी को नेट पर व्यक्तिगत डायरी लिखने का जन्म-सिद्ध अधिकार दे दिया हो। अश्लील विकृत मानसिकता दर्शाती हुई हर सम्भव जानकारी यहाँ परोसी जा सकती है। न चाहते हुए भी आप अन्जाने ही कभी उनके लिंक्स तक पहुँच सकते हैं। ये लिंक्स कुकुर-मुत्तों की तरह उग आये हैं। हमारे नौनिहालों के हाथों में लैप-टॉप पहुँच चुके हैं , नई पीढ़ी जरुरत से ज्यादा तेज दिमाग वाली है , उसे काबू में रखना कठिन है ; और आप कितने पहरे बैठा लेंगे ! ऐसी साइट्स अच्छे-भले सँस्कार-शील चित्त को भी भ्रमित करने के लिये काफी हैं तो बच्चे तो कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं , उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ ठीक नहीं है।
विचार तरँगों की तरह फैलते हैं , छोटा अणु ही इकाई है ...परमाणु का जिम्मेदार कहीं ...ये कितना विस्फोटक हो सकता है ! हम इतने क्षुद्र कैसे हो सकते हैं , हम शुद्ध-बुद्ध हैं ...निकृष्ठ बातों में उलझ कर तरक्की कैसे करेंगे।
जो लोग नेट पर अश्लील लिखते हैं , दरअसल वो उनके मन की गाँठें हैं , जिसे वो बिना अपना नाम लिखे दुनिया को बाँट रहे हैं।नारी उपभोग की वस्तु नहीं है।प्रेयसि शब्द प्यार झलकाता है , आप जब किसी को प्यार करते हैं तो स्वयम अपने आप से प्यार करते हैं। सब कुछ मर्यादा में ही अच्छा लगता है, वरना जँगल-राज हो जायेगा। सारी उन्नति , सारे नियम-कायदे बेमायने जायेंगे। ऐसा कुछ भी लिख कर जिसे पढ़ कर शर्म से सिर झुक जाये या जिसका लिन्क ही पढ़ कर लगे कि इस वेब पेज को भी कम्प्यूटर की हिस्टरी से भी डिलीट कर दिया जाये ; कितना हानिकारक है। लेखन वही सार्थक है जो किसी के काम आये , जो किसी का मन उठाये या किसी का दुख हल्का करे। 
नेट की दुनिया को आभासी दुनिया कहा जाता है। सामीप्य का आभास तो होता है मगर अहसास नहीं होता।   जहाँ पहचान छुपा ली जाती है या बढ़ा-चढ़ा कर बताई जाती है , यानि सच में कमी सी है। सामीप्य की प्यास लिए आप आते हैं कुँए की तस्वीर के पास , तृप्ति क्या मिलेगी। इसलिए कर्तव्यों , अधिकारों , अपने आस-पास की जीती-जागती दुनिया से मुँह मोड़ कर इन आभासी रिश्तों से दिल लगाना अक्लमंदी नहीं है। सारी सोशल साइट्स भी व्यवहार का ही रूप हैं , इतने लाइक्स , इतने कमेन्ट्स ....आप देते हैं तो पाते भी हैं। आज की युवा पीढ़ी तो जैसे इस सबके पीछे पागल ही है। तकनीक का इस्तेमाल तकनीक की तरह ही किया जाना चाहिये।
          नेट ही वो माध्यम है जिससे बिना कुछ खास खर्च किये कॉलेज के फ़ार्म , नौकरियों के आवेदन-पत्र , बिजली के बिल घर बैठे ही भरे जा सकते हैं। ऑन लाइन शौपिंग , बैंकिंग , ई-टिकेटिंग और न जाने क्या क्या कर सकते हैं। स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के लिये ब्लॉगिंग कर सकते हैं। मेरे जैसे लोग तो शायद कागज ही काले करते रहते और वो कभी प्रकाश में न आता अगर ब्लॉगिंग न होती। सोशल साइट्स ,वीडिओ चैट घर बैठे ही दुनिया जहान से जोड़े रखती हैं। इस भागती-दौड़ती दुनिया में नेट एक आवश्यकता बन गया है , तरक्की का पर्याय भी बन गया है व समय और धन का संरक्षक भी बन गया है। मगर फिर भी ये मायने रखता है कि आप अपने साधनों का इस्तेमाल उत्थान के लिये करते हैं या पतन के लिए। 

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

संवेदनाएँ जगा के देख ...

उसने अपनी माँ से पूछा कि " माँ , हमारे रिश्तेदारों को तो इस बारे में पता नहीं  चला है ?" 
उसे क्या पता कि कितने प्रदर्शन , धरने , मौन सभाएँ व कैंडल-मार्च उसके लिए किये गये हैं  अखबारों में , टेलीविजन , नेट सारी दुनिया की ख़बरों में है वो  उसकी वेदना सारे देश की वेदना है । नारी ही नहीं पुरुष वर्ग भी आहत है , ऐसा किसी की भी बेटी या बहन के साथ भी हो सकता था , नारी उपभोग की वस्तु नहीं है । पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे सुरक्षित माध्यम में भी नारी असुरक्षित है । संवेदना की ऐसी लहर उठी कि सारा देश सड़कों पर आ गया  जिससे सरकार को  सख्त कदम उठाने के बारे में सोचने के लिए विवश होना पड़ा 

माँ अपनी बेटी से क्या कहे ...कि  हाय मेरी बेटी ...दोष तेरा तो कुछ भी नहीं था ...सांत्वना भी नहीं दे सकती कि कहीं उन शब्दों से तेरा हौसला कम न हो जाए ..माली फूलों की सँभाल करता है ...ये दिन देखने के लिए नहीं ....रौंदा पड़ा है गुलशन ...मूक हो गये हैं शब्द ...भारी हो गये हैं कदम ...मगर तेरे लिए चलना है ...कलेजे का टुकड़ा है तू ...गर तू हिफाज़त से है ...तभी मुझे चैन है 

इतना दर्दनाक हादसा निर्भया के साथ हुआ , 'निर्भया ' नाम उसे किसी चैनल ने दिया था  हमारे यहाँ तो ऐसे किसी हादसे के साथ नाम जुड़ते ही , आम तौर पर लोग उसका जीना ही मुश्किल कर देते हैं । हादसे से उबरने में ही उसे कितनी ताकत लगानी पड़ती है , फिर दुनिया का उसे नजरों से चीरना , उसके तन मन का पोस्ट-मार्टम कर देता है 

इसी वजह से कई मामलों की रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं कराई जाती कि इज्जत बची रहे । दूसरी वजह लम्बी न्याय-प्रक्रिया है , अपराधी बच निकलते हैं , फिर पहले से भी ज्यादा जुल्म ढाते हैं । वकीलों की तगड़ी फीस , पुलिस-वालों की कड़ी पूछताछ भी रिपोर्ट दर्ज न कराने की वजह बनती है । ये ठीक है कि बेगुनाह को दण्ड नहीं मिलना चाहिए ...मगर जब सुबूत , साक्ष्य और परिणाम चीख-चीख कर कह रहे हों कि अपराधी गुनाहगार है तो वो माफी का हकदार नहीं है । 

महज़ हाड़-माँस का पुतला नहीं थी वो 
तेरी तरह ही इन्सान थी 
हो सकती थी वो तेरी बेटी या बहन भी 
रिश्तों की लाज रखता है , संवेदनाएँ जगा के देख 
चुभ जाती है सुई भी , तो दर्द होता है 
ये कैसे वार हैं नासूर से , ज़िन्दगी भर को दे दिए 
सोयेगा क्या चैन से किसी पल , किसी घड़ी भी 
हाय , मेरे समाज में नारी का मान क्या 
करवा-चौथ , वट-सावित्री के व्रतों का भान क्या 
गिर गये हैं मूल्य सभी , खो गई ख़ुशी कहीं 
बीमार हो गये हैं हम , अपने कारनामे गिना के देख 
बनता है तू शिकारी सदा , 
कभी शिकार की आँख से देख 
संवेदनाएँ जगा के देख ...

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

आधार

किसी भी दुख का इलाज प्यार हो सकता है  मगर शरीर से या रिश्ते से प्यार तो भुलावा है ...छलावा है । जी तो  आप बाहरी आधार पर ही रहे हो , जो कभी भी आप के हाथ से फिसल सकता है । इसलिए ऐसा आधार जो अपने क़दमों चलना सिखाये , अभ्यास में लाना जरुरी है । ये आधार है अपनी चेतना के अनुभव का  जैसे ही आप महसूस करेंगे कि शरीर मन बुद्धि के सारे क्रिया-कलापों को  चलाने वाली आत्मा आप ही हैं , सब कुछ आप के नियंत्रण में हो सकता है । सारी आत्माएँ अपने अपने रोल के अनुसार या कहिये हमारे पिछले लेने देने के हिसाब के अनुसार हमारे समीप आतीं हैं , अपना अपना रोल अदा करतीं हैं ; इस सब में हमें बिना विचलित हुए अपना पार्ट बखूबी अदा करना है ...हाँ और काँटे नहीं बोने हैं यानि और कर्मों की खेती नहीं करनी है । जहाँ आपने बन कर बात की या श्रेय लेने की कोशिश की , वहीं अहं का पुट आ जायेगा , ये छाप मन पर उतर जायेगी , दूसरा आहत हो जायेगा और फिर कर्मों का दूसरा सिलसिला शुरू हो जाएगा । 

जिस तरह कहते हैं कि  बाँटा हुआ सुख दुगना हो जाता है और बाँटा हुआ दुख आधा रह जाता है ; बिलकुल उसी तरह जब मन दुःख बुद्धि के साथ बाँट लेता है तो शरीर का दुःख भी आधा रह जाता है । अब मन को खुद को समझाना आ जाता है ; मन शरीर और आत्मा में भेद करना सीख जाता है । शरीर के दुःख को , कमियों को , रिश्ते-नाते , स्थूल सूक्ष्म , मन के तल पर उतरते कैसे भी दुःख को हल्का करते हुए मन तक नहीं पहुँचने देता । ये आसान नहीं होगा ,मन बार बार बाहरी स्थूल दृष्टि में उलझेगा क्योंकि मन ने शरीर धारण किया है तो स्वाभाविक तौर पर इन चक्षुओं से से वही दिखता है । सूक्ष्म दृष्टि  बार बार मन को अटकने से बचा लायेगी । इस तरह अन्तर्दृष्टि का अभ्यास आत्मा के अनुभव ( सोल कौन्श्य्स नेस ) में लौटा लाएगा । धीरे धीरे डिटैचमेंट का अनुभव होगा । मन पर किसी के लिए भी मैल का दाग मत रखो । ये कैसी विडम्बना है कि गैरों को तो हम फिर भी माफ़ कर देते हैं , मगर बहुत अपनों से बहुत उम्मीद रखते हुए लगातार एक शीत युद्ध पाले रखते हैं । वो आत्मा भी अपना रोल अदा कर रही है और यहीं तो हमारी आत्मा का अभ्यास काम में आना है , या कहो यहीं तो हमारी परीक्षा है । 

ऐसा नहीं है कि शरीर से आत्मा की विरक्ति का अनुभव आपको सिर्फ दुखों से मुक्त करता हो और आनन्द से वंचित कर देता हो । जब आप एक सूक्ष्म दृष्टि जिसमें सभी जीव भाव यानि आत्मा के स्वरूप में दिखते हैं तो सभी आप सामान दिखते हैं , तो ' न काहू से दोस्ती , न काहू से बैर ' वाली बात हो जाती है । सब की ख़ुशी अपनी ख़ुशी । आप एक अजब सात्विक आनन्द से भर उठते हो ; और ये वो ख़ुशी है जो बिरलों को प्राप्त होती है । इस तरह जीते जी मुक्ति का अनुभव होता है , न तो दुक्खों ने आत्मा पर बोझ डाला हुआ होता है , न ही आत्मा अपने असली स्वरूप सत चित आनन्द से वन्चित होती है । इस तरह आप अपनी जिम्मेदारियाँ ज्यादा अच्छी तरह व ज्यादा सन्तुलित रहते हुए निभा सकेंगे । मनुष्य जन्म अनमोल है इसलिए इसकी हिफाजत करना हमारा धर्म है , मगर ये तभी सम्भव है जब हम अपनी आत्मा की भी सम्भाल करें । हमारे जन्म का एक उद्देश्य ये भी है कि हम अपने स्वरूप को पहचान लें । 

कहते हैं सपना न हो तो उड़ान भी नहीं होती । आँखों में सपना गालों पर रँगत तो दे सकता है , मगर इस रँगत को स्थायित्व नहीं दे सकता । टूटे हुए सपनों की किरचें जीवन भर बटोरते हुए आत्मा लहू लुहान ही रहती है । आदमी आसानी से जब इस रास्ते पर नहीं आता तब यही ताप उसे इस दरवाजे पर धकेल जाते हैं । निराशा और वैराग्य में बड़ा अन्तर है  । निराशा पल पल डूबते हुए मन को वहीँ घुमाए रखती है , पीछे छूटा हुआ भी अपने पास लगातार ज़िन्दा रखती है ; वैराग्य ' रात गई बात गई ' की तरह सब भूल कर एक परम आनन्द में डूबा रहता है ; इसका ये मतलब कदापि नहीं है कि सब छोड़ दिया है ...बल्कि ये तो वो चाभी है जिससे दुख के बड़े बड़े जंग लगे ताले भी खुल जाते हैं ...तो कुछ ऐसा लिखें कि खुदा को अपनी लिखी हुई इबारत भी दुबारा लिखनी पड़े । 


शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

क़दमों के निशानों पे चलो

आज फिर अख़बार के साथ साईं बाबा के पर्चे बांटने पर महिमा व पर्चे न बाँटने पर होने वाले नुक्सान के बारे में  लिखे हुए पर्चे बाँटे गये । ये उनकी महिमा का प्रचार प्रसार नहीं है , ये तो एक झूठी आस्था का प्रचार है , निसन्देह ये किसी एक के ऐसा ही परचा पाने पर पैदा हुए डर का प्रतिफल है । बहुत पहले भी ऐसे ही पर्चे किसी न किसी भगवान के नाम पर बाँटे जाते थे । 

हमारा मन कितना कमज़ोर और कितना ताकतवर होता है कि छोटी छोटी आस्थाओं में कितने बड़े बड़े विष्वास पैदा कर लेता है और उनकी छाँव में ही महफूज़ महसूस करता है । यहाँ तक भी ठीक ही है मगर जब नकारात्मक ऊर्जा पैदा करने लगता है तो बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है । डर भ्रम की कोई सीमा नहीं होती । 

ये तय है कि होने वाली बात होगी न होने वाली बात नहीं होगी । आप अपने विचारों को बदल लें , सारी दुनिया बदली हुई नजर आयेगी । खुद साईंबाबा का जीवन सेवा भाव को समर्पित था । उन्होंने कभी कीर्ति की परवाह नहीं की थी , फिर सिर्फ ये पर्चे बाँट कर किसी पर भगवान कैसे मेहरबान हो सकता है । जब तक कर्म और भाव न सुधरे , प्रकृति मेहरबान नहीं हो सकती । बेवजह डर पाल कर हम अपनी ही ताकत को भुला देते हैं । 

भगवान को महसूस करने के लिए दुनिया से आँखें फेरनी पड़ती हैं यानि भौतिक जगत की हलचल , अहं भाव जब तक मन में रहता है , हम उस सत्ता को महसूस ही नहीं कर सकते । एक पतली सी लकीर ' मैं ' भाव की भी ज्ञान चक्षु खुलने नहीं देती । जो सिद्ध पुरुष होगा वो कभी बाहरी जगत में उलझेगा नहीं । वो किसी और ही मक्सद के लिए जीता है । इसलिए किसी तरह के बहकावे में नहीं आना चाहिए । 

ज्योतिष विद्या सच है , मगर सब पढ़ने की कोशिश ही करते हैं , अन्तर्यामी कोई नहीं है , इसलिए कह नहीं सकते कि कौन ग्रहों के फल को कितना सही पढ़ पाता है । ज्योतिष विद्या का भी ये नियम है कि किसी को भी आयु या आयु जैसे किसी भी संवेदन शील मुद्दे पर सटीक भविष्य वाणी नहीं करनी चाहिए । सच भी है , किसी का मन गिरा कर उसे जीवित ही मुर्दा कर देने का हक़ किसी को नहीं ; वैसे भी गोचर के ग्रह ,दशा ,अन्तर्दशा , महादशा आदि सही विवेचना को भ्रमित करने के लिए काफी हैं । क्योंकि ज्योतिष वैसे भी बहुत विस्तार वाला विषय है जितना भी अध्ययन कर लो कम है । ग्रहों को ठीक करने के लिए भी तो कर्म का सहारा लिया जाना चाहिए , बनावटी कर्म कांडों से कुछ होने हवाने वाला नहीं । 

बात छोटी सी हो या बड़े भारी दुख वाली , नकारात्मक रहस्यात्मक शक्तियों के प्रभाव का यकीन नहीं रखना चाहिए ; हम खुद एक शक्तिशाली ऊर्जा हैं , जिसे हमें इतना शुद्ध बनाना चाहिए कि  और कोई ऐसा विचार टिक ही न सके । दुःख तो वैसे भी समय के साथ गुजर जाने वाला है , हम भ्रम को भूत बना कर न बैठ जाएँ । 

मन इतना शक्तिशाली होता है कि विष्वास के दियों से रौशनी कर लेता है 
ये आस्था का सैलाब है या झूठे दियों की रौशनी से सपने का विस्तार 
दिया जल तो सकता है , आँधियों में मगर बुझते देर न लगेगी 
समय साधन समझ की बर्बादी है ये 
भटक के रेगिस्तानों में प्यास का ही दीदार करोगे 
सुकूने-दिल के लिए किसी का पेट भरो 
किसी की चोट का मरहम बनो 
किस्मत लिखनी है तो ऐसे लिखो 
साईंबाबा के क़दमों के निशानों पे चलो 

बुधवार, 26 सितंबर 2012

रन्ज का रँग

अरे भई ये तो कैमिकल लोचा है  खुदा ने जब इन्सान की मिट्टी को गूंथा होगा , किस अनुपात से रन्ज का रँग मिलाया होगा । आज भी डैस्टिनी के जरिये कभी थोड़ा कम कभी थोड़ा ज्यादा फ्लो करता रहता है हमारी मिट्टी में ।कोई बेवजह उदास है , कोई बहुत तीव्र प्रतिक्रियाएँ देता है । हम तो इसे भावनाओं का खेल समझते थे । दिल जिसे हम हथेली में उठाये घूमते हैं , वो न जाने किन-किन प्रक्रियाओं से गुजरता है। हमारे वश में हालात तो नहीं , मगर ये इक्वेशन्स तो हमारे बस में होनी चाहिएँ , क्योंकि इनका रिजल्ट कभी बहुत विस्फोटक भी हो सकता है

और इसके लिए हमें अपना खुदा स्वयं बनना पड़ेगा । जैसे खुदा दूर से सब कुछ देखा करता है , और मुस्कराया करता है ..या फिर जैसे ख़्वाब देखा करते हैं , जागती आँखों से देखना होगा ख़्वाबों को ...
ज़िन्दगी ख़्वाब है ,ख्व्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या .....

किसी ने ज़िन्दगी को ख़्वाब कहा , तो किसी ने ग़मों की किताब कहा । यानि ज़िन्दगी न हुई , चूहे बिल्ली की आँख-मिचोली सी हुई । धूप-छाया की ठिठोली सी हुई । हम खाम-खाँ अपना दिल दाँव पे लगाने को आमादा हैं । 

सब कुछ तो क्षण भँगुर है । आँख खुलते ही पर्दे से मन्जर बदल जाता है । कभी ज़िन्दगी जुए सी लगती है , जिसके हाथ थोड़े इक्के आ जाएँ , दुनिया सलाम ठोकती हुई सी लगती है । ज़रा सी हार पर दिवाला पिटा सा लगता है । ज़िन्दगी सज़ा भी नहीं , बेशक कज़ा भी नहीं , और बेवफा भी नहीं , और फिर उम्र के त्यौहार में रोना भी तो मना है ।  

कौन सा रसायन रगों में दौड़ने लगता है कि दिल दिमाग की बात मानने से इन्कार कर देता है । फिर दिमाग पंगु हो जाता है , दिल अपना ही दुश्मन बना ,बिच्छू की तरह अपनी ही पूँछ खाने लग जाता है । हाँ भई , डाक्टर की भाषा में कुछ हार्मोन्ज ऐसे सिकरीट होने शुरू हो जाते हैं जो आदमी को गहरी उदासी में धकेल देते हैं । हम इलाज   में लग जाते हैं , मगर कारण की तरफ ध्यान नहीं देते  । मिट्टी लीप-लीप कर सतह को साफ़ दिखाते रहते हैं , मगर अन्दर इक ज्वालामुखी हलचल में रहता है, और मौका पाते ही विस्फोट कर सब तहस-नहस कर डालता है । 

किशोरावस्था आते-आते हार्मोन्ज अपना खेल दिखाने लगते हैं। अपनी वय के लोग , विपरीत सेक्स में आकर्षण जो तकरीबन कम ज्यादा सारी उम्र बना रहता है। धीरे-धीरे माँ के आँचल से लगाव कम होता जाता है ।जहाँ जितना जुड़ाव होता है , चाहे वो रोजगार से सम्बंधित हो या रिश्तों से ,उम्मीद भी ज्यादा होती है , फिर फ्रस्ट्रेशन भी ज्यादा होता है । परिस्थितियाँ मय इन्सानों के इस कैमिकल लोचे को ट्रिगर करते रहते हैं  । 

इस कैमिकल लोचे की शुरुआत कहीं हमारे भीतर से ही हुई होती है , इसको परवरिश भी हमारे ही मन ने दी हुई होती है। एक हद तक हम अपनी किस्मत खुद लिखते हैं । हालात कितने भी बदतर क्यों न हों , अपने अन्दर बैठे खुदा के नूर को हमें पहचानना होगा । दुनिया में बहुत कुछ होता है पर क्या खुदा अपने बन्दों से मुँह मोड़ लेता है  । प्रकृति की अवहेलना नहीं कर सकते , प्रकृति के साथ झूमना सीखिये।

बुधवार, 29 अगस्त 2012

नहीं हूँ मैं मन ...

चार महीने की लम्बी यातना सह कर जब खड़ी हुई तो क़दमों के साथ साथ मन ने भी चलने से इन्कार कर दिया । लगा कि अब आगे की ज़िन्दगी इसी असहाय सी अवस्था में काटनी पड़ेगी । वक्त कैसे कटेगा और मन ने अपनी पुरानी कमजोरियाँ भी उभार लीं ।मुझे पानी के नीचे जाने और बन्द कमरे में दम घुटने से डर लगता था ,इसीलिए मैं समुद्र में स्नौर्कलिंग भी नहीं कर पाई थी । मुझे समझ में आने लगा कि  मैं फिर से अवसाद की तरफ जा रही हूँ । छोटी से छोटी बात भी मन में खलबली मचा रही थी , घर में अकेले पड़ जाने से तो बेहद घबराहट हो रही थी ।यहाँ तक कि मौत का डर भी सता रहा था ...तो क्या हमारी मंजिल मौत है ...जब वक्त इतना भारी है तो क्या करेंगे जी कर ...मन ने दीन दुनिया से आँखें फेरनी चाहीं ।जब कि चार महीने जब तकलीफ़ ज्यादा थी तो एक अजब सी स्थिरता थी मन में ...तो फिर ये क्या मेरी सकारात्मक ऊर्जा खत्म होती जा रही थी।

मैंने हिम्मत कर के खुद से कहा कि ये तो मन है जो मुझे गुमराह कर रहा है ...और मैं मन नहीं हूँ ...नहीं हूँ मैं मन ...मैं तो इस मन को भी चलाने वाली चेतना हूँ । अपने आप को मैंने एक चपत लगाई ...जब मैं उस वृहत चेतना से अलग हो कर आई हुई उसी का अँश हूँ तो मैं अपनी ताकत क्यों भुला रही हूँ । मुझे याद आया कि अभी कुछ ही दिन पहले मैंने एक अखबार में पढ़ा था कि एक लेखक के एक्सीडेन्ट के बाद पीठ में गूमड़ और हाथ में डंडा आ गया था और किस तरह तैर-तैर कर उन्होंने अपना गूमड़ ठीक कर लिया था और डंडा त्याग दिया था । आदमी की इच्छा-शक्ति से तो असंभव काम भी संभव हो जाते हैं । इसके साथ ही याद आई पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की , वो क्या जानतीं थीं कि इतनी उम्र में वो प्रेजीडेंट बनेंगी । कौन जानता है कि कब ज़िन्दगी उसे उमँग से भरी एक नई दिशा दे देगी । राजनीति या कीर्ति में मेरी रूचि नहीं है , मगर ऐसे उदाहरण तो मन को उठाने वाले हैं और किसी भी क्षेत्र में हो सकते हैं । 

अगर हमारी किस्मत पहले से लिखी होती है तो मैंने समझा कि किसी बड़े अवाँछित कर्म का फल भोग लिया और दुःख से सही सलामत बाहर आ पाई यानि कर्म कटा । हमसे सीधे तौर पर जुड़े या अपरोक्ष रूप से जुड़े लोगों के साथ कर्मों का एकाउन्ट हम यूँ ही नहीं बन्द कर सकते । ये हम पर है कि हम वातावरण को बोझिल बनायें या खुशनुमा । ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में हर चेहरा भरमाया हुआ , घबराया हुआ ...हमें क्या देगा ,जब उसके पास ही वो नहीं है ...जिसकी उसे तलाश है और जो हम भी ढूँढ रहे हैं । और अगर हम ये सोच सकें कि मेरे आस पास की आत्माओं के प्रति जो मेरी जिम्मेदारी है उसे पूरा करने के लिए ही मुझे भेजा गया है , बेशक मैं बहुत सुविधा संपन्न या सक्षम न होऊं , मगर एक नैतिक भावना पूर्ण थपकी तो दे ही सकता हूँ । देने के लिए उठा हाथ ही मन को तृप्त कर देता है , मन को उद्देश्य मिलते ही दिशा मिल जाती है और दिशा मिलते ही मन सहज होने लगता है।

तो हाँ , कुछ दिन लगे मुझे सँभलने में। इस लेख को मैं इसलिए भी लिख रही हूँ कि ये किसी और के भी काम का हो सकता है ।मैंने समझा कि  मन किसी भी सीमा तक आदमी को भटका सकता है , पीड़ा में कुछ सूझता ही नहीं । अध्यात्म ही वो आईना है जो हमारी चेतना से हमारा परिचय करवाता है । हम तो इस मन को भी चलाने वाले हैं फिर हम इसका ही कहना क्यों मान लेते हैं । ज़िन्दगी जैसा उपहार पा कर भी हम उसका सम्मान नहीं करते । 

और याद आया , जो मुश्किल हालात तुम्हें मार न सकें , वही तुम्हारी ताकत बन कर उभर आयेंगे , क्योंकि तुम उनसे गुजर पाए यानि उतना तनाव तुम्हारी बर्दाश्त के अन्दर था । दुख के बहाव में बह जाना एक सीमित दृष्टिकोण से जीना है । ज़िन्दगी को अगर यज्ञ कहें तो कभी कभी ज़िन्दगी हमारी बड़ी ही प्यारी चीजों की आहुति भी माँग लेती है ,जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इक आग का दरिया है और तैर के जाना है , सूफिआना अन्दाज़ से ज़िन्दगी को देखें । 


ज़िन्दगी दरअसल लगाव और विरक्ति का मिला जुला रूप है यानि मध्यम मार्ग ही सुखी रख सकता है । लगाव पूरी दुनिया को अपना समझने का और विरक्ति इतनी कि एक दूरी बना कर चलना । ताकि दुख ज्यादा असर न कर पायें । सब ठीक है , बस अपना रास्ता चुन लें । 

कोई भी व्यक्ति जिसके पास सुन्दरता देखने की योग्यता हो , वह कभी वृद्ध नहीं हो सकता ..........फ्रेंक काफ्का 

सुन्दरता माने क्या ...जीवन सुन्दर बनता है सुन्दर विचारों से ...और विचार तो आपके हाथ की बात है । वीणा से सुन्दर स्वर निकालिये या बेसुरे ......