बुधवार, 9 जुलाई 2014

ये बन्दूकें क्यूँ बोते हैं '

किसी शायर ने सटीक कहा है।  

' हम अपने-अपने खेतों में ,
गेहूँ की जगह , चावल की जगह ,
ये बन्दूकें क्यूँ बोते हैं '

नफ़रत की चिन्गारी को हवा देते ही शोले भड़क उठते हैं।  चन्द लोगों के सीने की नफ़रत व्यवसाय का रूप क्यों ले लेती है ? कम उम्र का युवा मन जिसे कच्ची मिट्टी की तरह जिधर चाहे मोड़ लो , चोट खाये हुए दिल को और उकसा कर विध्वंसक गतिविधियों में उलझा दिया जाता है।  उसे पता ही  नहीं चलता कि उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।  उसका रिमोट तो आकाओं के पास है , जिन्होंने उस चिन्गारी को बारूद में ढाला है।
इन्सान का दिल हमेशा पुरानी चीजों को याद करता है।  बचपन , माँ , सँगी-साथी क्या कभी भूले से भूलते हैं।  अतीत क्या कभी यादों से मिटाया जा सका है।  उनसे आँख चुराने का मतलब ही यादें कड़वी हैं।  जिस दिन 'कसाब' को उसके गाँव के लोगों ने पहचानने से इन्कार कर दिया था , उसके माँ-बाप भी वो गाँव छोड़ कर कहीं चले गये थे।कलम ने लिखा था.…… 

वो गलियाँ , वो दीवारें
बेज़ुबान बोलें कैसे
पहचानतीं हैं तेरी आहटें
मगर भेद खोलें कैसे

नक़्शे में है तेरा वतन
जैसे है वो तेरी यादों में
लाख कर ले तू जतन
वक़्त के मोहरे को वो अपना बोलें कैसे

तेरे वतन के लोग
जिनके लिये तूने दाँव खेले
साथ देती नहीं परछाईं भी
मुसीबत में ,वो ये बात खोलें कैसे

आतँक-वाद की दुनिया ही अलग होती है।  जिस काम को दुनिया से छिपा कर किया जाये , निसन्देह वो गलत होता है।  अपने ही वतन से जैसे जला वतन कर दिये गये हों।  दुखद बात ये है कि फिर लौटा नहीं जा सकता।न जमीं बचती है पैरों तले , न आसमाँ ही शेष रहता है। जमीं मतलब ज़मीर , इन्सान का खून देख कर भी जो न पसीजे, उसे क्या कहेंगे। उसने ज़मीर के मायने ही गलत उठा लिये हैं।  आसमाँ मायने स्वछन्दता , निडरता ... जहाँ तू आराम से उड़ सके।  निश्छलता के बिना ये आसमान तेरा नहीं।  खौफ के साथ निडर कभी रहा ही नहीं जा सकता।  

हम दुनिया में ये सब तो नहीं करने आये थे।
हर ज़र्रा चमकता है नूरे-इलाही से 
हर साँस ये कहती है के हम हैं तो खुदा भी है 

बस कोई नूर वाली आँख ही उसे देख सकेगी , महसूस कर सकेगी। जो किसान हमें गेहूँ चावल देता है , आम आदमी जो कपड़ा छत मुहैय्या कराता है , जिसके दम पर हमारा जीवन और वैभव आश्रित है , हम उस पर ही अन्याय कर बैठते हैं।  जैसे अपनी ही जड़ें खोद रहे हों।  बन्दूकें बोयेंगे तो बन्दूकों की फसल ही काटेंगे।  जिस तकलीफ ने उकसाया हो , रुक कर जरा सोचें कि इस तड़प को…इस उनींदी को सार्थक कर लें।  कोई सुबह होने को है।  मन को भी वो दिशा दें कि फिर ये हादसे न घट पाएं।  अपने जैसों को भी उबार लाएं।  

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

भाषा का गिरता स्तर

सड़क पर गुजरते हुए कुछ अठारह-बीस साल के लड़कों को बातें करते सुना। वो अपनी भाषा में गालियों का प्रयोग बड़ी हेकड़ी के साथ कर रहे थे ; जैसे ये उनकी शान बढ़ा रही हों।कम पढ़े-लिखे लोगों के साथ-साथ सभ्य बुद्धि-जीवी कहे जाने वाले लोग भी कम उद्दण्ड नहीं हैं।हमारे फिल्म-जगत ने ऐसे किरदारों को भी पर्दे पर उतारा है। व्याकरण की त्रुटियाँ या भाषा की समृद्धि की बात तो दूर रही ; गालिओं का इस तरह धड़ल्ले से प्रयोग समाज को क्या सन्देश दे रहा है। भाषा का गिरता स्तर चिन्ता का विषय है।

आये दिन अखबारों में किशोरों की बढ़ती नशे की लत के बारे में , छोटी-छोटी बात पर तू-तड़ाका करने पर उतारू , हत्या-आत्म-हत्या करने तक से बाज नहीं आने के बारे में ख़बरें छपती हैं।हमारे नैतिक मूल्यों का गिरना और दिशा भ्रमित होना ही इन सारी समस्याओं का कारण है।आज हर कोई साम ,दाम, दण्ड ,भेद किसी भी जोर पर सबसे ऊपर खड़ा होना चाहता है। बिना मेहनत किये जीवन के अर्थ ही गलत लगा लिए गए हैं।व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसकी कुण्ठायें उसे कहाँ ला के छोड़ने वाली हैं।  ख़ुशी क्या ज्यादा पैसा पाने से मिल सकती है ? पार्टी करना , मौज मस्ती करना ही जीवन का ध्येय नहीं है।मौज-मस्ती में भी आप हर किसी का ख़्याल नहीं रख सकते , और एक जरा सा खलल और सब मस्ती गुड़-गोबर हो जाती है।  

ये मायने नहीं रखता कि आपने ज़िन्दगी से क्या पाया ,कितना पाया या कितनी लम्बी ज़िन्दगी जी ; वरन ये मायने रखता है कि आपने कैसी ज़िन्दगी जी।भाषा ज्ञान को अगर बाहरी आडम्बर मान भी लें , तब भी आन्तरिक गुणों को अभिव्यक्ति तो भाषा के माध्यम से ही मिलती है। कहते हैं कि किसी व्यक्ति की मातृभाषा या असली स्वभाव के बारे में जानना हो तो उसे थोड़ा सा क्रोध दिलाओ और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखो।अगर वो गालिओं में पला-बढ़ा है तो वो अपनी भाषा में गालिओं की बौछार कर देगा। ये मत भूलें कि स्कूल से भी पहले की पाठशाला घर होता है।घर व आस-पास का वातावरण ताउम्र प्रभावी रहता है।जो व्यवहार हम दूसरों से अपने लिये नहीं चाहते , वो व्यवहार हम दूसरों के साथ न करें।  

धरती पर जीव-जन्तुओं में मनुष्य ही अकेला ऐसा प्राणी है , जो बुद्धि-जीवी है।सदियों से मनुष्य ने लम्बी विकास की राह तय की है। सभ्य-सुसंस्कृत समाज ने अपने माप-दण्ड तय किये हैं।उन्हें निभाते हुए हमें आगे बढ़ना है।भाषा शिक्षा हमारा मौलिक अधिकार भी है और व्यक्तित्व का सच्चा श्रृंगार भी है।  

शिक्षा सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान नहीं है ; हमारे अन्दर विवेक , उत्तर-दायित्वों , कर्तव्यों ,आचार-व्यवहार के प्रति जागरूकता पैदा करना भी शिक्षा का ध्येय है।मनुष्यता के मौलिक गुणों के विकास में शिक्षा सोने पे सुहागे का काम करती है।इसमें सन्देह नहीं कि भाषा हमारे जीवन मूल्यों का आईना है।शिक्षा , सँस्कार , ज्ञान के सामने ही दुनिया सिर झुकाती है।  

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

ढल जाती है जब उम्मीद

 अपने एक ब्लॉग का अवलोकन कर रही थी कि ट्रैफिक स्त्रोत देखा , कि किस किस जरिये से कोई उस ब्लॉग तक पहुँचा था ; गूगल सर्च पर की-वर्ड ' आत्महत्या कैसे करूँ ' लिख कर कोई मेरे उस ब्लॉग तक पहुँचा था , हालाँकि  मेरे ब्लॉग पर उसे मन को उठाने वाली सामाग्री ही मिली होगी।  बहुत दुख हुआ कि इस प्रवृत्ति पर अँकुश कैसे लगेगा। दुनिया से छुपा कर जो उसने नेट से शेयर  किया था , अगर किसी साथी से पूछता तो वो शायद उसे ज़िन्दगी का महत्व समझाता , उसके दुख को हल्का करता।  नेट और इन्सान में बहुत फर्क होता है।  नेट आपके खाली वक्त का साथी जरुर है , गूगल पर विषय से सम्बन्धित सारे ऑप्शन्स आ जायेंगे ;मगर सही गलत का निर्णय वो आपको नहीं करा सकेगा , वहाँ गर्मजोशी नहीं मिलेगी , वो जो दुनिया मिलेगी वो आभासी दुनिया है , आँख मूँद कर आप विष्वास नहीं कर सकते।  और हम अपनी जीती-जागती दुनिया से मुँह मोड़ कर सिर्फ वहीँ तक सीमित रह गये , तो क्या पायेंगे ? 

आत्महत्या का निर्णय लेना क्या आसान है ? ये तो अपनी परिस्थितियों से भागने का निर्णय है।  दुख में आकण्ठ डूबा हुआ मन ये नहीं देख पाता कि किन कारणों से वो इस स्थिति तक पहुँचा है।  आकाक्षाएँ या अपनी छवि से मोह हम छोड़ नहीं पाते हैं ; वही मोह जब ज़ख्मी होता है तो मन बगावत कर देता है।  जबकि जान है तो जहान है , न वक्त बदलते देर लगती है न ही मन की स्थिति बदलते देर लगती है।  इतना शक्ति-शाली शरीर मिला है , उस पर मस्तिष्क जो नेट पर बैठ कर सब कुछ खोज लेता है , उसे सिर्फ सही दिशा देने की जरुरत है। वो अपनी ही शक्तियों से अन्जान है।  अपना रिमोट उसने हालात के हवाले कर दिया है ; वो चाहे उसे जैसे चाहे नचा लें।  

एक खुला दिल लेकर ही वह अन्तर्मुखी से बहिर्मुखी हो सकता है।  खुले मन से सबका स्वागत ,दिनचर्या का अनुसरण करते हुए , सबको स्वीकार करते हुए , माहौल का हिस्सा बन कर रहने से.…… धीरे से मन उसी सब में वापिस रम जाएगा।  

कब ढलता है सूरज , दिन के ढल जाने पर 
ढल जाती है जब उम्मीद , समझो के शब हुई 

माना कि दुख की रात बहुत लम्बी होती है। मगर सबेरा तो हर रात का होता है।  अगर तुम सूरज के खो जाने पर आँसू बहाओगे तो अपने चाँद-तारों को भी खो बैठोगे।  इसलिये झिलमिलाते हुए अपने चाँद तारों को सहेजिये।  बहुत कुछ होगा जो आपकी तरफ आस से निहार रहा होगा , उसे ज़िन्दगी से भरपूर कर दीजिये।  

हो सकता है आप अपने गंतव्य तक पहुँचने में विफल रहे हों , या कुछ भी कैसा भी गम हो , सारी दुनिया वीरान सी नज़र आती हो ; ऐसे पलों में आपने जान लिया होगा कि ज़िन्दगी से भरपूर रहने के मायने क्या होते हैं।  कितनी भी विषम परिस्थितियों से गुजरे हों ,एक बार फिर से अपने शौक , अपनी प्राथमिकताएँ अपनी खासयितें तय कीजिये।  अपनी सौ प्रतिशत कोशिश इनमें लगा दीजिये।भटके हुए मन को दिशा मिलते ही दशा सुधर जायेगी।  

दरअसल ये तो अन्तर्मुखी से बहिर्मुखी होने की कोशिश है।  अगर आप फिर कभी ऐसी निराशाजनक स्थिति से गुजरना नहीं चाहते तो धीरे से अध्यात्मिक बदलाव से जुड़ जाइये ; जो आपको आपके अन्तर्मन और बाहरी दुनिया के बीच सामन्जस्य पैदा करना सिखा देगा।  

हर ज़र्रा चमकता है अनवारे-इलाही से 
हर साँस ये कहती है के हम हैं तो खुदा भी है 

कुछ पंक्तियाँ पेश हैं........ 

ज़िन्दगी भोर है , सूरज सा निकलते रहिये 
मन का दीप जला , रात के सँग-सँग बहिये 
हौसला , ज़िन्दादिली ,उम्मीद का रँग देखो 
उग आता है सूरज , इनकी बदौलत कहिये 

गुरुवार, 27 मार्च 2014

आदमी का नट शैल

वो दोनों प्रिन्टर्स बुक-फेयर में एक ही स्टॉल शेयर कर रहे थे , मगर एक-दूसरे को कितना सहयोग दे रहे थे , इस बात से जाहिर है कि जब एक को दूसरे की किताब के विमोचन के अवसर पर किसी एक मेहमान के आने पर हॉल न. बताने के लिये कहा गया तो उसने साफ़ इन्कार कर दिया कि उसे याद नहीं रहेगा।  और ये दूसरे महाशय जिनसे किताब छपवाने का खर्च पूछा गया तो कहते हैं कि वे ऐसी वैसी कवितायें नहीं छापते ; जबकि पूछने वाले की कवितायेँ हाल में ही उन्हों ने ही छापीं थीं। अकेले तो कोई भी नहीं चल सकता , स्वार्थ-परता की हद है , जब अपना काम होगा तो दुनिया गधे को भी बाप बना लेने से नहीं हिचकती।  काम निकल जाने के बाद तू कौन मैं कौन हो जाता है। पहली ही नजर में अविष्वास , आदमी अपने नट शैल से बाहर ही नहीं आना चाहता। ऐसी कोरी-करारी दुनिया में कैसे चलिए।

जब भी हम किसी विषय-वस्तु पर बात करने से बचते हैं या कहते हैं कि अमुक विषय पर बात न की जाए ; दरअसल तभी हम दूसरे व्यक्ति से एक दूरी बना लेते हैं।  समस्या या सवाल जो अन्दर उबाल खा  रहे हैं , उन्हें रोकने का  मतलब अपने और उसके बीच एक दीवार खड़ी कर लेना है।  अब कोई भी सँवाद किसी भी नतीजे पर पहुँच नहीं सकता। दोनों के बीच रिश्ते अपना अर्थ खोने लगते हैं।  पता नहीं लोग कैसे कहते हैं कि we can agree to disagree . जबकि असहमति पर सहमति रख कर साथ चलना सम्भव ही नहीं हो पाता।  वो तो बस मजबूरी को ढोना मात्र होता है।  सँवाद-हीनता से भ्रम पनपते हैं… समस्याएँ खड़ी होती हैं।  फिर एक दिन ज्वालामुखी फूटता है।  

वो बात कर लेता तो…वो ऐसा न कहता तो........ जब हमारा रिश्ता इन बातों का मोहताज हो जाता है तो स्नेह-बेल पल्ल्वित होने से पहले ही अपने अस्तित्व के लिए हालात से जूझने लग जाती है।  रिश्ते की मजबूती के लिए स्नेह , विष्वास , स्वीकार-भाव और शौक का होना जरुरी है ; या यूँ कहिये कि प्यार और प्रेरणा ही रिश्तों का सम्बल है।  

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

कोहरा कफ़न नहीं होता

मौसम में छाया कोहरा और अस्पतालों में डिप्रेशन के मरीजों की बढ़ती सँख्या , चिन्ता का विषय है।  आज आदमी बाहर के मौसमों को अपने अन्दर उतार बैठा है।  बाहर खराब मौसम तो उदास , बाहर खिली धूप तो चेहरे पर भी मुस्कान , अहम् को पुष्ट करने वाला सामान तो आदमी खुश , नीचा दिखाने वाली ज़रा सी बात में भी झगड़ा करने , मरने-मारने पर उतारू।  दूसरों पर व्यँग कसने में आनन्दित , खुद व्यँग-बाणों का शिकार होने पर दुखी , मन चाहे का साथ मिले तो प्रसन्न , न मिले तो खिन्न। हमारी ज़िन्दगी के आधार कितने छोटे और ओछे हो गये हैं।  दुःख तो तब होता है जब हमारी नई पीढ़ी बच्चे युवा भी इसी राह पर चलने लगते हैं।

अन्धेरे में चलना किसे रास आता, कुछ ऐसी रोशनी मुहैय्या करा दो

अँगने में खड़ा सूरज , अँखियों पे पड़ा पर्दा हटा दो

अँधेरा नहीं है जीवन की डोरी ,उजली किरण ही है आशा की लोरी

ठण्डी हवाओं को आने की दावत , सावन की पेंगें बढ़ा दो

बेलगाम पानी क्यों बहे नालियों में ,मेढ़ों को बाँधो खेतों को सजा दो

जड़ों में पानी डालो,सूखी टहनिओं पे भी हरे पत्ते सजा लो

सावन-भादों के आने की देरी, फूलों के खिलने में फ़िर क्या है देरी

देखा है फूलों को टकटकी लगाये ,सूरज सँग सोते सूरज सँग जगते

क्या है ये नाता धरती और सूरज का ,जीवन और किरण का , मन को समझा दो

सुनहरी रँग किसे नहीं भाता ,खप जाता है हर रँग सँग ,सबसे मुखर होकरये ख़ुद को सिखा दो

आदमी जब खुद भटका हुआ है तो अपने बच्चों को सही दिशा कैसे दिखा पायेगा।  उद्देश्य सामने रख कर प्रयत्न करने में लग्न दिखती है , मगर जोश के साथ होश रखना बहुत जरुरी है।पहले अपनी प्राथमिकताएं तय कर लें , आपके लिए क्या क्या जरुरी है ,जिसे आप किसी कीमत पर खो नहीं सकते।  कुछ किस्मत माथे पर लिखी होती है , कुछ हम अपने हाथों से लिखा करते हैं।  परिश्रम व व्यवहार दोनों बहुत मायने रखते हैं।  जब आपका भाव शुभ है तो बाकी बातें छोड़ दीजिये , यही हमारी तृप्ति के लिए काफी होना चाहिए।

मनुष्य सब के बीच रह कर ही खुश रह सकता है , इसीलिये उत्सव मनुष्य का स्वभाव है।  मगर ये ध्यान रखना चाहिए कि सबको सहृदयता से मिलें वरना ख़ुशी काफूर होते देर न लगेगी।  हर दिन आप पार्टी तो नहीं मना सकते , इसलिए हर घड़ी ईश्वर ने आपके लिए क्या रचा , उसे ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कीजिये।  सबसे बढ़िया तरीका है निष्काम सेवा भाव से जुड़ जाइये।  सबसे पहले घर , घर के लोग आपसे तृप्त होने चाहिये।  बाकी निष्काम सेवा के मौके खुद-ब-खुद आयेंगे।  आपका ये भाव ही आपको खुश रखेगा।  अन्दर अगर तापमान नियंत्रित होगा तो मौसम का कोहरा अन्दर क्यों उतरेगा ; ये अन्धेरा भी सार्थक होगा … यूँ समझिये के किसी नई सुबह से परिचय होने को है।  


कोहरा कफ़न नहीं होता 
सूरज दफ़न नहीं होता 

किसी की कही हुई ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं ,आगे की पंक्तियाँ मेरी कलम ने रच लीं ……


कोहरा कफ़न नहीं होता 
सूरज दफ़न नहीं होता 
क़ैद तो तेरी अपनी है 
बचना कभी अमन नहीं होता 

ढलना नमन नहीं होता 
हौसला तपन नहीं होता 
बढ़ , गले लग ज़िन्दगी के 
दूर कभी सजन नहीं होता 

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

रिश्तों के पौधे

हम जब अपनों से झगड़ा करते हैं तो सिर्फ उसके अवगुण देखते हैं ,गुणों को भूल जाते हैं।  लिस्ट बनाने बैठेंगे तो उसके गुणों की या फेवर्स की लिस्ट लम्बी होगी , मगर हमें तो वही दुर्गुण दिखता है।  A few drops of yogurt curdles the milk or a single drop of poison is sufficient to deteriorate the substance. जब भी कोई गुस्सा करता है ,  तब उसके दिल में दुःख या कोई frustration होता है या फिर उसने ज़िन्दगी के मायने ही गलत उठा लिये हैं।  हम उसका दर्द समझने की बजाय उससे झगड़ा करने लगते हैं।  पैसा ज़िन्दगी को आसान बनाता है , बहुत कुछ है , पर सब कुछ नहीं है।  न कभी चीजों से मन भरेगा , न कभी ख़ुशी की तलाश ही कम होगी।  हम हमेशा प्यार भरे दिल की तलाश में रहते हैं , जो हमें जैसे हम हैं वैसे ही स्वीकार करे और चाहे।  मगर खुद उसे उसकी कमिओं के साथ कभी स्वीकार नहीं करते।  उसके behaviour के पीछे उसकी नासमझी , frustration या expectation वाले कारण को नहीं देख पाते।  वो तो करुणा का पात्र है।  जब तक कोई receiving mind में न हो , हम उसे कुछ भी नहीं सिखा सकते।  प्यार सबसे बड़ा अस्त्र होता है , ये दिखाना नहीं होता , इसका असर अपने आप दिखता है।  प्यार ने हमेशा वो काम भी करवाये हैं , जो नामुमकिन होते हैं। प्यार ही आदमी को तनाव-मुक्त  रखता है ,will power को बढ़ाता है। सही रास्ता दिखाता है।  माफ़ करने वाला हमेशा गलती करने वाले से बड़ा होता है।

मित्र-दोस्त तो हम बना सकते हैं , मगर रिश्तों के साथ तो हम पैदा होते हैं।  भाई-बहन , माँ-बाप ,पति-पत्नी , बच्चे ये रिश्ते किसी कारण से होते हैं।  यहाँ हमें अपना कर्तव्य याद रखना है।  ये खाता (account )भगवान ने खोला है इसके पीछे का भेद जान लो। जिम्मेदारी हमेशा आगे बढ़ कर ली जाती है।हमें ये ध्यान रखना होता है कि हम राह न भटकें , और ख़ुशी ख़ुशी अपने रिश्ते निभायें। 

कहते हैं आज जो हम बो रहे हैं कल वही फसल काटेंगे।जो हम बाहर दे रहे हैं , it comes back to us in double amount whether it is hatred or love.ये मन हमसे क्या कुछ नहीं करवा लेता , ये छोटा मन है , हमारी Ego टकराती है , हम अपना remote अपनी ईगो को दे देते हैं।  वो चौराहे पर हमारे relationships की ,हमारी upbringing की , हमारे existence की धज्जियाँ उड़ा  देती है।  हमारी रातों की नींद हराम कर देती है।  समझदारी ये कहती है कि ज़िन्दगी उलझने में नहीं , अपना रास्ता आसान बनाने में है।  सत्ता देनी ही है तो बड़ी ego को दो , जो सबको अपना समझे।  बंद मुट्ठी है लाख की , ' हम ' शब्द ही unity बताता है , दिल में power बढ़ा देता है।  हमें तो फूलों की तरह खिलना है।  

 धैर्य के साथ अपनी बात दूसरे को समझानी चाहिए ।  मित्रों -दोस्तों की पोल तो आड़े वक्त में देर-सबेर खुल ही जाती है।  रिश्ते ही घर को घर बना सकते हैं।  ताकि दुनिया की ठोकरों से जब घबरा के कोई घर लौटे तो कोई छाया तो हो उसे आराम देने के लिए। रिश्तों के पौधों की जड़ों को अगर खाद-पानी न मिले तो पौधे सूख जाते हैं , पनप नहीं पाते।  जड़ें मजबूत हों तो फूल खिलते हैं , टहनियाँ आसमान छूती हैं। बड़ी-बड़ी बातें एक दिन में घटित नहीं होतीं।  छोटी-छोटी बातें ही आदमी को महान बनातीं हैं। 

रविवार, 22 सितंबर 2013

गुरु सँभाल के कीजिये

गुरु सँभाल के कीजिये। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु के बिना गति नहीं होती है। ऐसा इसलिये कहा गया है कि गुरु हमारा हमारे अपने ही असली स्वरूप यानि एक अदृश्य सत्ता से जुड़े होने का परिचय करवाता है।  राम-रहीम तो माध्यम भर हैं ; क्योंकि साकार में मन टिकता है ,इसलिये शुरुआत वहीँ से की जाती है , अदृश्य का भान इतनी आसानी से नहीं हो सकता।  

आज आदमी घबराया हुआ , भरमाया हुआ पहुँचता है गुरुओं के पास ; जो दिया उसकी आस्था ने जलाया होता है वो उसे गुरु का चमत्कार समझ लेता है।  उसे समझ ही नहीं आता कि दुख में आकण्ठ डूबे हुए उसकी आँखों पर पर्दा पड़ गया है और उसकी इसी हालत का फायदा उठाया जा रहा है।  टी. वी. चैनलों पर आई हुई धर्म-गुरुओं , बाबाओं , तान्त्रिकों और ज्योतिषिओं की बाढ़ ने आग में घी का काम किया है।  आदमी भूल जाता है कि अन्तर्मन का दिया जलाने के लिये जो तीली वो बाहर तलाश रहा है वो तो उसकी अपनी चेतना के पास मौजूद है। 

सदिओं से अतृप्त मन से उपजी विकृतियाँ समाज में समस्या पैदा करती रही हैं।  इसी सिलसिले में मुझे एक किस्सा याद आता है कि एक धर्म-स्थान के अधेड़ उम्र के गुरु हारमोनियम सिखाते थे , मैं छठी-सातवीं क्लास में पढ़ती थी ,वो एक एक कर लड़कियों को अन्दर बुलाते , बाहर बरामदे में बाकी बच्चे कतार में बैठे रहते।  सिखाते-सिखाते वो चिकोटी काट लेते , एक एक कर बच्चों ने सीखना बन्द कर दिया।  क्या पता वो उँगली पकड़ के पहुँचा पकड़ने की फिराक में हों।  उस उम्र में नासमझी के साथ-साथ न जाने कैसी दहशत सी भी होती है , और वो तो बीमारों को भभूत की पुड़ियाँ भी बाँटते थे , फिर बच्चों की बात का यकीन भी कौन करता। आज हाथ में कलम भी है , दिल में निडरता भी और समय की माँग भी।  बच्चों और किशोरों का यौन-शोषण ज्यादातर अधेड़ उम्र के लोग ही करते हैं।  आसाराम का नाम इस प्रकरण से जुड़ने के बाद मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ , मगर इस मामले में कभी किसी निरअपराधी को नपना नहीं चाहिए। 

भगवान न करे कि आदमी भगवान के नाम पर , दुख दूर होने के लिए , आकांक्षाएँ पूरी करने के लिए किसी भी रास्ते पर चल पड़े।  एक बार इनके शिकंजे में फँस गया तो ये उसे पूरी तरह लूट कर भी शायद न छोड़ें। 

गुरु का चयन ठोक-बजा कर कीजिये।  जहाँ बहुत पैसे का लेन -देन है , कर्म-काण्ड है , वहाँ भी ज्ञान नहीं लगेगा।  जो ज्ञान आपको अपने घर में अपनी प्रारब्ध से ताल-मेल बैठाना सिखाये , जो सबको अपना समझना सिखाये , सुख-दुख में सम रहना सिखाये , वही धीरे से आपको मन के चलायमान रहने से परे ले जा सकता है।  है न ये अतीन्द्रिय अनुभव ! भगवान है ही एक अदृश्य न्याय-प्रिय सत्ता का नाम , जो हमारे अन्दर ही विद्यमान है।  जो गुरु खुद से जोड़ कर अपनी छत्र-छाया में रखना चाहे , वो आदमी को पंगु बना देगा।  जो गुरु ,जो धर्म अपने वचनों पर चलना सिखलाये , आपको आपके अपने क़दमों का आधार दे ; वही हृदय में सहजता , शान्ति एवं निडरता ला सकता है।  सच्चे अर्थों में जीना इसी को कहते हैं।  

गुरु सँभाल के कीजिये 
गुरु ही तारण-हार रे 
एक गुरु आके निकट 
कर डाले है वार रे 
एक गुरु उँगली पकड़ 
भव से लगा दे पार रे 

दुख की मण्डी में सदा 
होता है व्यापार रे 
दाँव पर दिल है लगा 
उसके चाकू में धार रे 
आँखें खोल के रख जरा 
सुख-दुख जीवन सार रे 

अपने स्वरूप के ज्ञान से 
होंगीं आँखें चार रे 
मिल जायेगी दिशा तुझे 
बैसाखी पर न रखना भार रे 
सच्चा गुरू देगा तुझे 
तेरा ही आधार रे