शनिवार, 1 मई 2010

टिप्पणियों की चाह

जरुरी नहीं कि उत्कृष्ट लेखन पर भी आपको बहुत टिप्पणियाँ मिलें । टिप्पणियाँ पाने के लिए , ध्यान दिलाने के लिए अपनाए गए हथकण्डों से मन को क्षणिक तृप्ति मिल सकती हैइस सब में भटक कर क्या हम अपना असली मकसद भूल नहीं गए ! हमारा लिखा हो सकता है बहुत लोग पढ़ पाए हों , या हो सकता है पढ़ भी लिया हो तो टिप्पणी लिखने का वक्त बचा हो या कई बार नेट की , कम्प्यूटर की गड़बड़ भी सामने आती हैबिना किसी दबाव के पाई गयी टिप्पणियाँ ही सार्थक हैं

लेखन एक शौक की तरह उभर कर सामने आता है और धीरे से हमारी आवश्यकता बन जाता हैबिना लिखे रहा नहीं जाता , मगर लिखा अपने आप जाता हैयानि ख्याल ही हमारी ताकत बन जाता हैहमारे आस-पास जीते जागते लोग जो हमारी आज की स्थिति के लिए जिम्मेदार होते हैं यानि हमारे लेखन का बहुत कुछ दारोमदार परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उन पर भी होता है ; उन्हें हम अनदेखा कैसे कर सकते हैं ! ब्लॉग अपने कर्तव्यों से बढ़ कर नहीं है , रिश्तों की खटास के असर से लेखन अछूता नहीं रह सकेगाटिप्पणियों की प्रतिक्रिया स्वरूप हौसला अफजाई तो होती है , मगर टिप्पणियों को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए , इससे हम उलझ कर अपने उद्देश्य से भटक जायेंगेदमदार लेखन तो खुद ही बोल उठेगासराहना भी हो तो भी दिल छोटा नहीं करना चाहिए

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
तब जाकर कहीं होता है , चमन में दीदावर पैदा

वो आँख वाला तो किस्मत से पैदा होता हैहमें तो अपना अपना काम करते चलना हैये भी सच है ' लगती है एक उम्र , तेरी जुल्फ के सर होने तक ' । अचानक की उम्मीद नहीं कर सकते , तपने में वक़्त तो लगता है

टिप्पणियों के लिए तो ये ही कहा जा सकता है ....उलझ मत दिल बहारों में , सहारे टूट जाते हैं , सहारों का भरोसा क्या ........आधार तो अपने अन्दर है

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

जिन्दगी को एक साधक की तरह जिएँ


अब जो बात मैं कहने जा रही हूँ वो जिन्दगी में कभी अवसाद को आने ही नहीं देगी | आप सिर्फ ये शरीर नहीं हैं , बल्कि एक बड़ी शक्ति से अलग होकर आई हुई प्रकाश पुँज आत्मा हैं | जिस तरह हम प्रार्थना करके सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करते हैं , उसी तरह हम ऊर्जा को दूसरी आत्माओं को भी वितरित कर सकते हैं | मन के अन्दर इतनी ताकत है कि किसी भी गिरते हुए मन को सँभाल ले | बाहर जो गुजर रहें हैं वो हालात हैं , गुजर जायेंगे , आप अपने अन्दर उन्हें गहरा न उतारें , आपको तो सिर्फ ये देखना है कि ऐसे में आप कितने विवेक-पूर्ण निर्णय लेकर अपने आप को जीतते हैं |


कहते हैं कि प्रकृति न्याय करती है जो कभी-कभी इन खुली आँखों से नहीं भी नजर आता ; मगर आप ख्याल करें कि जब-जब आपने गुस्सा किया तो गुस्सा करने से पहले और बाद में आप कितना कुढ़े ? आपने कितनी ऊर्जा गँवाई , कितनी शांति खोई और कितने दिन दुश्मन सोते जागते आपकी आँखों के सामने रहा ? ये न्याय तो ' इस हाथ दे और इस हाथ ले ' वाला हो गया | सोचें तो जरा , कोई खोट तो होती है ऐसे विचारों और क्रियाओं में जो हमें शांति से दूर ले जाती है | अच्छा होता अगर हम शान्तिपूर्ण हल ढूँढ़ते | दूसरे को परिस्थिति वश जान कर अगर हम उसे तहे-दिल से माफ़ कर सकें तो उससे बड़ी करुणा नहीं है |


परेशानियों को हमेशा सबक की तरह लें , प्रकृति आपको सिखाना चाहती है , परीक्षा लेती है , कितने खरे उतरते हो , कितने अडोल हो ? इस रोल के लिए आपको चुना गया है | आप चाहें तो टूट कर बिखर जाएँ , आप चाहें तो निखर जाएँ |


अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें |जब आप इस अहसास से भरे होंगे कि आपके आस-पास इतने सारे लोग , सब उस सर्व-शक्तिमान के अंश हैं , सिर्फ शरीर रूपी आवरण की वजह से भटके हुए हैं ; तब आप किसी के साथ अन्याय नहीं कर पायेंगे | ' सकल ते मध्य सकल ते उदास ' जब आप अकेले हैं तब भी आपको अकेले नहीं लगेगा , दूर उसी शक्ति से लय जुड़ जायेगी ; और जब भीड़ में इतने लोगों के बीच में होंगे तब भी आप अकेले हैं क्योंकि मन की ये यात्रा तो आपको अकेले ही तय करनी है ना | अच्छा है इस यात्रा को हम सहज बनाएं , अपनी तरफ से जटिलताएं न जोड़ें | यदि हम सबको अपना समझते हुए किसी का दिल नहीं दुखाते हैं ( मजबूरी वश किसी के भले के लिए हमें कभी-कभी सख्त रवैय्या अपनाना पड़ता है , वो एक अलग बात है क्योंकि उसमें भी दूसरे की भलाई छिपी है ) , तो प्रकृति भी न्याय करती है , वो आपको शांति सब्र जैसे गुणों से भी बढ़ कर कैसे भी उपहार से नवाज सकती है | सबसे बड़ी अदालत है प्रकृति , जिस ऊर्जा को व्यर्थ गँवा रहे थे , हो सकता है उसका रुख मोड़ते ही , वही आपकी ताकत या पहचान बन कर उभरे | और हम सारी प्यासी आत्माएं अपना वजूद ही तो तलाश रहीं हैं | अब इस वजूद की तलाश में एक-दूसरे से टकराना नहीं है , सबको गले लगाना है | मैं रूहानी प्रेम की बात कर रही हूँ , साथ ही सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए हमें अपनी मर्यादाओं को नहीं भूलना है , बस यही कला सीखनी है कि मन पर दुःख का लवलेश भी न हो |


हाँ , तो अगर हम किसी का दिल नहीं दुखाते हैं ( आपका मन हर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बात समझता है कि कितने ही तरीकों से किसी को भी दुखाया जा सकता है ) , दुनिया की सबसे बड़ी अदालत जो आपके मन के अन्दर भी लगती है , कहिये कि आप कहाँ खड़े हैं , कटघरे में या मुस्कराते हुए इस गुजरते हुए मँच के साक्षी बन कर .....इसी का हिस्सा बने हुए ? इस अहसास के साथ ही आप जीवन जीने की कला सीख जायेंगे |


मन की नकेल अपने हाथ रखिये , चिंता और डर को हावी न होने दें | भाव और बुद्धि का सामंजस्य बिठाते हुए चलें | भाव के बिना सब नीरस है , बुद्धि के बिना सब आफत है | जो छूट गया है , जिसका आप दुख मना रहे हैं , चाहे वह महत्वाकांक्षाएं थीं या इच्छाएं , सुख-सुविधाएं या बड़े प्रिय अपने या मान-सम्मान या फिर सपने ; वो तो महज़ बैसाखियाँ थीं जो आप ने अपने जीने के लिए सहारे या कहिये बहाने की तरह खोज लिए थे , आप अपने सहारे या अपने नूर के साथ चले ही कहाँ ? आपने अपनी दुनिया भी इतनी सीमित कर ली थी , ज़रा अपनी दुनिया का दायरा बड़ा कीजिये , दूसरों का दुःख नजर आएगा तो अपना दुख छोटा नजर आएगा | सकारात्मक चिंतन ही सही दिशा दे सकता है |


दूर कहीं उस सर्व-शक्तिमान की मर्जी से लय मिला कर , मार्ग को सुगम बना कर , तकलीफों को प्रसाद समझ , कुछ कर दिखाने का अवसर समझ , हर दिन को उत्सव समझ चलना चाहिए , यही तो साधना है | आपने मस्त फ़कीर को देखा है , जब गाता है तो कायनात गाती है , जब छोड़ के चल देता है तो कुछ भी नहीं अपना | ऐसे ही हम दुखों को छोड़ दें , बोझ की तरह ढोएँ नहीं , और गायें तो ऐसे कि रोम-रोम गाये | जिन्दगी एक तपस्या है , जीवन को साध कर एक साधक की तरह जियें , बच्चे की तरह नहीं कह सकती क्योंकि हम सब बड़े हो गए हैं |


जब मन पर बोझ नहीं होगा तो ग्लानि भी नहीं होगी | पिछली गल्तियों को भूल जाइए , ' जब जागे तभी सबेरा चरितार्थ ' हो जायेगा | ये सफ़र , ये जीवन-यात्रा ही सब कुछ है , इसे सरल बना कर , इसी के सजदे में सिर झुकाइये |


उम्र के त्यौहार में रोना मना है
जाग , गले लग हँस कर कि सोना मना है
छूट गया जो , छोड़ो यारों , अपना नहीं था
सजदे में सफ़र के , आज को सँवारा नहीं था
पकड़ते हैं उँगली बड़े-बड़े सपने
हमने तो खुद को पुकारा नहीं था

शनिवार, 27 मार्च 2010

जिन्दगी का अपना एक अलग ढँग है , हमें सिखलाने का


२२ मार्च , इन्द्रप्रस्थ पार्क , दिल्ली के सामने फ्लाई ओवर पर चढ़ने की बजाय गलती से गाड़ी नीचे की ओर ले बैठे , जाना तो सीधे था | बेटा ड्राइव कर रहा था , स्पीड ज्यादा नहीं थी | कहीं कोई बोर्ड भी नहीं था कि स्पीड कम रखनी है | और ढलान पर गाड़ी ऑटोमैटिकली फिसल कर खुद भी तेजी से नीचे आती है | पुलिसवालों ने अच्छी जगह खोज रखी थी शिकार पकड़ने के लिए | हमारी गाड़ी रोक ली गई , ४०० रु का चालान भरवाया गया | कुछ मीटर पीछे दिल्ली पुलिस की गाड़ी खड़ी थी , बेटे ने कहा देख कर आता हूँ , इंट्रा-सेप्टर पर स्पीड कितनी आई है | अपने पापा के साथ वो वहाँ तक पहुँचा| बहस होती देख बेटी व उसकी मित्र भी वहाँ पहुँच गए | वहाँ मौजूद ऑफिसर अपने पद के अहम में बिफर कर बोलता और बार-बार किसी कागज़ पर हस्ताक्षर करने के अन्दाज़ में झुकता और कहता कि अब रैश-ड्रायविंग के लिए १४०० रु का जुर्माना लगाऊँगा | बेटे ने कहा कि स्पीड का रेकोर्ड इंट्रा-सेप्टर ७४ दिखा रहा है , कैसे जुर्माना लगाओगे ? हमारा डॉक्टर के साथ अपौइंटमेंट था , इस आदमी की वजह से लेट हुए ....अगले दिन बेटे का इम्तिहान भी था | बेटे ने उसका नाम , गाड़ी नम्बर सब लिख कर रख लिया कि शिकायत जरुर करनी है | मैनें भी सोच लिया ब्लॉग में लिख कर इस आदमी को ,इस जैसे और कईयों को सबक सिखाना है |
मगर अब नाम नहीं लिखूँगी , इसी तरह पिछले साल एक हॉस्पिटल में जब हमें न तो पूरा ध्यान मिला न ही किसी ने कागजी कार्य-वाही में सहयोग दिया ....उस दिन मैं इतना रोई थी कि खफा होकर एक एक का नाम लिख लिया था कि ब्लॉग में इन सबका भण्डाफोड़ करना है | मेरे भाई जी ने समझाया , काम तुम मेरे ऊपर छोड़ दो , ये सब राम भरोसे चल रहे हैं ....इन्हें खुद भी अपनी प्रणाली की जानकारी नहीं है , दूसरे हमारा मरीज ठीक होना चाहिए ...बस | उफ्फ़ , मैं कहाँ उलझ गई थी , इस सब में उलझ कर मैं अपनी प्राथमिकता से दूर होने जा रही थी | नाम पते के साथ लिख कर मैं अस्पताल को भी बदनाम करती .....इन शब्दों की गूँज से क्या मैं अपरिचित हूँ ...जो मेरे अन्दर इतना शोर मचाये हुए है वो मेरी इस क्रिया के बाद उनकी प्रतिक्रिया ..और फिर एक सिलसिला ....कहाँ जा कर ख़त्म होगा सब | मैंने दोनों हाथ उठा कर दुआ माँगी उनकी सद बुद्धि के लिए | अपनी भी बुद्धि का स्वामी मँगल और लग्नेश चन्द्रमा दोनों उकसाते रहते हैं गुस्से और आंसुओं को बाँध तोड़ व्याकुल करने के लिए | खुद को सिखाना पड़ता है कि दूसरे की क्रिया के पीछे मौजूद उसकी परिस्थितियाँ , उसकी समझ , उसकी मजबूरियाँ देखने की कोशिश करूँ | बस यही दृष्टिकोण मदद कर सकता है , वरना प्राण-शक्ति का धागा ज्यादा कस देने से टूट भी सकता है ....उसका भी....मेरा भी |


२३ की सुबह नैनीताल वापिस पहुँची , दुर्गा अष्टमी का दिन , मंदिर जा कर कन्या जिमानी थीं , जल्दी जल्दी काम निपटाए ...बस आख़िरी काम समेट कर अब अपना लैप टॉप खोला जाय ....ब्लॉग की दुनिया की सैर की जाय | मन्दिर से लौटा बैग फोल्ड कर कमरे में रखने गई , अन्दाज़ ही नहीं आया , कैबिनेट के तीखे कोने पर झुकते हुए जोर से मेरी दाईं आँख और माथा टकराया ....कस के हाथ से दबाया , खून ही खून , हाथ से खून के फ़ोर्स को रोकते हुए माँ की मूर्ति की ओर गई , दिया अभी जल रहा था , आर्त स्वर में पुकारा ' माँ , माँ मुझसे क्या गलती हुई ' , पलट कर एक हाथ से फोन मिलाया , निचली मंजिल पर जनरल मैनेजर रेजिडेंस है , फोन किया ' भाभी जी ,गाड़ी मंगवाइये , आँख में चोट आई है , आकर मेरे घर का ताला भी लगाइए |'
आँख बच गई थी , भौंह से ऊपर माथे पर दो टाँके आए | बाकी पूरी दोपहर , बिस्तर पर पडी सोच रही थी , अगर पूजा में कोई गलती हो भी गई हो तो भी माँ तो कभी अपने बच्चों को कष्ट देती ही नहीं हैं ....क्योंकि वो तो भाव देखती हैं , मैं तो आज भी इस अहसास से भरी हुई हूँ कि वो मेरे आसपास ही यहीं कहीं हैं .....और अगर ये कष्ट मेरे बच्चों पर आने वाला था और मुझ पर आया तो इस जैसे सात जन्म न्यौछावर | एक अपनी बड़ी पुरानी कविता दस्तक दे रही है .......


ऐ जिया , सवाल है
है किसका दिल तोड़ा मैंने
किसकी मधुर रागिनी को
सुन कर के मुँह मोड़ा मैंने
किसकी आहों का असर है मुझ पर
सुलगते दिल को छेड़ा मैंने
अपना ही कोई कर्म आया होगा आड़े
जब लिखा जा रहा होगा भाग्य
अपना रास्ता हम खुद हैं चुनते
नियति बन कर , है वही छलता रहा


कैबिनेट का तल्ख़ कोना और मेरी तल्ख़ जुबान , नतीजा किसी सीमा तक भी जा सकता था | हाँ , इसीलिये मैंने किसी के भी नाम पते नहीं लिखे , कलम तलवार भी बन सकती है और सुई धागा भी | जख्म सी कर , मांस को सही जगह बैठाना होता है ताकि निशान भी कम से कम आयें | कुछ दिन दुनिया से दूर , पल्यूशन फ्री , आराम से ध्यान रखना होता है | हर ठोकर अपने निशान तो छोड़ ही जाती है | जिन्दगी का अपना एक ढंग होता है सिखाने का .....कभी ठगती है , छलती है , कभी मरहम पट्टी कर सहलाती है | ईश्वर ने हमारी उंगली नहीं छोडी है , शायद हमने ही उस विष्वास की पकड़ ढीली कर ली है |

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

हवाओं से सुगन्ध आए


एक बार सर्दियों में जब हम तराई के अपने घर में रहने गए ,देखा कि हमारे किरायेदार बहुत सारी किताबें छोड़ कर लापता हो गए थे | अब रद्दी ठिकाने लगाते वक्त कुछ अपनी रूचि की किताबें मैंने अपने पास रख लीं , कुछ कबाड़ी को दीं और वो सारी किताबें जो यंत्र तंत्र या ऐसी ही कुछ विद्याओं की थीं , वो सब मैंने जला दीं | क्योंकि मेरे हिसाब से आधे-अधूरे ज्ञान से खतरा ज्यादा होता है ....दूसरे कोई भी ज्ञान या ताकत इंसानियत से बढ़ कर नहीं है| मैंने उन्हें खुद पढ़ा , ही कबाड़ी के हाथ लगने दिया | हमारे किरायेदारों का हाल हमारे सामने था , अर्श से फर्श पर पहुँच गए थे , फेक्टरी नुकसान में गई , हमारा किराया एक साल से दे पाए थे , आखिर सरकार लेनदारों से छुपकर पता नहीं किस कोने में गए | गलत दिशा पकड़ने में कितनी देर लगती है ! फिर एक बार इस मकड़जाल में उलझ कर किनारा शायद कभी मिलता हो , मन की शान्ति कभी मिल ही नहीं सकती |


आदमी जब अपराध करता है तो कहते हैं कि उसकी नींव कहीं कमजोर है यानि उस अपराध की प्रवृति का बीज बचपन में कहीं पड़ गया था जो गलत दिशा में पनप गया | और जब बच्चा गुनाह करता है , यानि बीज इंस्टेंट फल फूल गया ,....दोनों तरह से दोषी तो कहीं कहीं बड़ा आदमी ही है , उसने ऐसे दृश्य उस बच्चे को क्यों दिखाए कि वो ऐसी मनस्तिथि से गुजरा जिसने उसे गुनाह के लिए उकसाया |


आदमी जिस सुख को पाने के लिए नए नए तरीके ईजाद करता है , वही चाह एक दिन उसे ले डूबती है |सुख तो मन से भरपूर रहने में है , बाहर तो कभी मिल ही नहीं सकता | मृगमारिचिका की तरह आँखों पर पर्दा पड़ जाएगा , सुख की चाह दूरगामी प्रभाव को भी नजर-अंदाज़ कर देगी | लेखक बिरादरी से मेरा अनुरोध है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ऐसा कुछ भी रचें जिस से अपने देश के बच्चों पर कोई भी गलत असर पड़े |


न रचना कुछ भी ऐसा
कि हवाओं से दुर्गन्ध आए
पढने सुनने वालों में ,
वो तेरा नन्हा बच्चा भी हो सकता है
न दिखाना उसे वो दिन
कि मुँह छिपा कर शर्म आए
घर की मर्यादा न करना नीलाम
इसी राह से सुकून आए
जाने लगते हैं जब दुनिया से
खुद से नजरें चुरा कर , न कोई जाए
बस वही रचना कि जाने के बाद भी
हवाओं से सुगन्ध आए

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

सहज रह पाने का दायरा


श्री श्री रविशंकर जी ने कहा कि When comfort zone is increased , you feel comfortable in pain also. Emotion sways away as a line does not stay much longer on water , it fades away soon .इससे जो मैंने समझा , सबके साथ बाँटना चाहूँगी । जब हम अपने सहज रह पाने का दायरा बढ़ा लेते हैं यानि हालातों को साक्षी भाव से घटते हुए देखने की समझ विकसित कर लेते हैं , तब हम पर दर्द का असर बहुत थोड़ी देर के लिए होता है , हम जल्दी ही सहज हो जाते हैं । दर्द तो उतना ही है जितनी उसकी अनुभूति होती है । स्थाई अगर सुख नहीं था तो दुःख भी स्थाई नहीं होगा , एक परिस्थिति की तरह ये भी गुजर जाएगा , हम उसमे अटके तो कई गुना नुक्सान सहना पड़ेगा । सबसे बड़ा नुक्सान तो हमें मानसिक स्तर पर झेलना पड़ेगा , इसलिए अच्छा यही रहता है कि हम विवेक-पूर्ण निर्णय लेते हुए आगे बढ़ें । सचमुच यही तरीका है सहन-शक्ति बढ़ाने का , परिस्थिति में डाँवाँडोल नहीं होना है , अपनी ऊर्जा को हल ढूँढने में लगाएं । कोई व्यवस्था अच्छी चला सकता है , कोई सृजन कर सकता है , तो कोई क्रान्ति ही ला सकता है । अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दें ।
अब हम देखें कि हमारी तकलीफ में सहज रहने की क्षमता कितनी बढ़ी ? क्या वाकई गुस्सा ,द्वेष , चिन्ता अब हमारे मन पर उतनी ही देर असर करते हैं जितनी देर पानी पर एक लकीर को बनने और बिगड़ने में लगती है ? अब अगर हम हर नकारात्मक परिस्थिति को सकारात्मक में बदल लेते हैं तो हाँ ......किधर थी हमारी मँजिल और किधर जा रहे थे हम !

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

धमक दूर तलक जायेगी


ाहिद साहब ,


आपने तारीफ की , अच्छा लगा , सबका लेखन मौलिक है , जैसा आप लिखते हैं वैसा मैं नहीं लिख सकती , इसलिए तुलना मत करिए , मैं जानती हूँ खुद को कमतर कह लेना आसान नहीं है | जो काम पीठ पर थपकियाँ करतीं हैं , सराहना करती है , वो काम आलोचना नहीं कर सकती ; हालाँकि स्वस्थ्य आलोचना चमकाने का काम करती है अगर हम स्वस्थ्य मानसिकता रखते हैं तो | खलिश माने चुभन ही होता है ? ' वो खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ' , अगर खलिश हमें सृजन , सकारात्मकता या बेहतरी की ओर ले जाए तो वो चुभन बनाये रखनी चाहिए , सार्थक है | हम सब जानते हैं कि हमारे बचपन की मामूली से मामूली घटना भी जिसने हमें भाव-विह्वल किया , हमारे ज़हन में आज भी जिन्दा है , उसका हम पर कितना असर है ! इसी तरह हमारी वाणी , हमारे शब्द , यहाँ तक कि हमारे दिल में पैदा होने वाले भाव , सबका असर होता है | वो टूटन , वो बिखरन, वो धमक दूर तलक जायेगी | इसलिए क्यों पहले अपने मन के भाव को ही सँभाल लें ; जो कुछ ऐसा रचे , कहे जो अपने लिए या समाज के लिए अहितकर हो |
आपने ग़ज़ल लिखी , मैंने इक नज्म लिखी , आपने टिप्पणी दी , मैंने बदले में इक लेख लिखा | देखिये , शब्दों की गूँज कितनी होती है | चुप भी जब गूँजा करती है तो शब्दों से परे होती है | आपका हमारा काम तो उसे बेनकाब करना है |
गम किया , गुमान किया
यही तरीका है जीने का , जिसने आराम दिया
आपकी टिप्पणी ने दो मुठ्ठी खून तो मेरी रगों में भी उँडेला ही !
आपकी टिप्पणी के उत्तरमें मैंने एक लेख ही लिख डाला है |



शारदा अरोरा

शनिवार, 16 जनवरी 2010

पहुँचता कोई कहीं नहीं


अमर उजाला के एक ' रूपायन ' अँक में एक लेख छपा था ' दुनिया एक बाजार , ऐसे चुने राजकुमार ' , जिसमें इस मुश्किल को हल करने में शापिंग के फार्मूले को इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया था | सचमुच बाजार इतना छा गया है कि आदमी एक ' उत्पाद ' ही बन कर रह गया है | यह बात तो ठीक है कि वर चुनते समय आपको अपनी प्राथमिकताएँ पहले तय करनी पड़ती हैं ; उनमें किस बात पर कितना फेर-बदल किया जा सकता है , ये भी खुद पर ही निर्भर करता है | आजकल कितनी ही वेब साइट्स व अखबार इस मदद के लिए उपलब्ध हैं या कहिये कि पैसा कमाने का जरिया भी बन गयी हैं | हर बात का बाजारीकरण होता जा रहा है |
जीवन साथी चुनने जैसे नाजुक ख्याल को शापिंग से जोड़ कर देखना ! , सचमुच क्या पुरुष वर्ग नाराज नहीं हुआ ? क्या इतना आसान है , कइयों से मिलना , मशीनी ढँग से खुद को भी एक वस्तु समझ लेना ? जाने अन्जाने कितने ही दिल टूटते होंगे , क्योंकि शादी तो एक से ही होगी | विज्ञापन और पँच लाइंस बेशक मदद कर रही हैं , पर आप पायेंगे कि बार-बार वही वही विज्ञापन आ रहे हैं , क्योंकि जहाँ रिश्तों के बहुत सारे ऑप्शन आ जाते हैं , वहीं आदमी एक जगह भी सैटल नहीं कर पाता | सबसे बड़ा कारण होता है भावनात्मक जुड़ाव ( इमोशनल बोन्डिंग ) का अभाव | न तो कोई मध्यस्तता कर रहा होता है जो आपको दूसरे पक्ष की विशेषताएँ बता सके और न ही आप किसी बात में पहल करना चाहते हैं | शुरुआती दौर चलता है फिर सब टायं-टायं फिस्स | बात उम्र भर की है , विशवास जीतना कठिन | सभी की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं , कोई भी अपेक्षा से कम पर समझौता नहीं करना चाहता | और हम पाते हैं कि जहाँ से चले थे , खड़े वहीं पर हैं |
हर नजर है तूफ़ान समेटे हुए
हर दिल है आसमान लपेटे हुए
चलते हैं सब मगर
पहुँचता कोई कहीं नहीं
विष्वास है खोया हुआ
रिश्तों में अब नमी नहीं बोल्ड
नजर तो उठती हर तरफ़
भीड़ में चेहरों की कमी नहीं
हाथ तो बढ़ाते हैं
विष्वास साथ लाते नहीं
हर नजर है तूफ़ान समेटे हुए
हर दिल है आसमान लपेटे हुए
अगली बार जब कोई भा जाए तो अगर मगर किये बिना वक़्त को थाम लेना , जो हो सके तो कम से कम दिल तोड़ना , उम्र को यूँ ही गलाना अच्छा नहीं |