बुधवार, 25 अगस्त 2010

मन पर दुख का लवलेश भी न हो


आप शक्तिमान आत्मा हैं । आत्मा , मन बुद्धि से अलग होती है , आत्मा शान्त सत्य चित्त आनँद स्वरूप होती है , इसीलिये उसे तनाव रहित रहना अच्छा लगता है , दुःख उसे भारी कर देते हैं । भावनाएँ मन का काम है और उनका नियंत्रण बुद्धि के जिम्मे है । सिर्फ बुद्धि से काम लें तो यान्त्रिक बन जायेंगे और सिर्फ मन से चलेंगे तो भी काम नहीं चलेगा , इसलिए मन बुद्धि का संतुलन बहुत आवश्यक है । विवेक और प्रेम से भरा मन आपको मर्यादा के साथ साथ आत्मा की राह पर चलना सिखाएगा , जिससे अंतर्मन तनाव रहित रहेगा ।

परिस्थितियों से मन हिलता है , जिसे हम गहरे आत्मा तक उतार लेते हैं , जबकि दुख तो बाहर है । शरीर को भी तकलीफ है तो बाहर है न कि आत्मा को है , समय के साथ ख़त्म हो जाने वाली है । सुख-दुख का संयोग वियोग मौसम की तरह है । फिर सर्वशक्तिमान की यही मर्जी है तो हम उसे सर आँखों पर लें , उसमें जरुर कोई भेद छुपा है ...परीक्षा , सबक या फिर कर्म कट रहे हैं । अब मन ये कैसे मान ले कि दुख अच्छा है ! स्वीकार तो करना ही पड़ेगा , हँस कर करेंगे तो उसे काटना आसान हो जाएगा । दुख को जैसे ही स्वीकार कर लिया जाता है , है तो है , ये सोचते ही दुख की तीव्रता कम हो जाती है । परिवर्तन तो आयेंगे ही , क्योंकि ये प्रकृति का नियम है , वरना जीवन नीरस हो जायेगा , उनसे डरना कैसा ! उनमें धैर्य , संतोष , विवेक बुद्धि , योग्यता की परीक्षा होगी और जीवनी शक्ति होगी आपका उपहार ।

दंभ और आत्मग्लानि दोनों से हटना होगा । आत्मग्लानि क्यों ? आत्मा तो नूर से भरी हुई है । अगर आप शुभ-शुभ सोचते हैं , चेहरा दमकने लगता है । हमारी अभी की सोच अगले पलों की किस्मत बन जाती है , वैसा ही हम महसूस करने लग जाते हैं , एक विचार एक श्रृंखला लेकर आता है कितने ही विचारों की । जब हमारे विचार इतना मायने रखते हैं तो आत्मा कितनी बलशाली हुई । दंभ से भी बचना है , अभिमान करना है तो सर्व होने का करें । इसे एक वृहद् रूप दें ...सर्वशक्तिमान से अलग होकर आई हुई मेरी आत्मा और सारी आत्माएँ , हमारा गहरा रिश्ता है , प्रेम का ...तो भय कैसा और फर्क कैसा !

अब दूसरे के व्यवहार के पीछे कारण देख सकने वाली दृष्टि भी आप पा लेंगे । न किसी से नाराज होंगे न तनाव होगा । अपने आप को देखें कि आप क्या सोच रहे हैं ...मन को भारी करने वाले विचार , दूसरों के साथ द्वेष वाले विचार , कचरे से कम नहीं हैं , फ़ौरन अपने आप को समझाएं ..ये मेरा ही रूप है , कैसा विद्वेष ? उसको समझाने के लिये हमारी सीमाएँ हैं मगर हम अपनी नकेल तो अपने हाथ में रखें । हमारी भरसक कोशिश रहे कि जो उसके हित में है हम करें । कीर्ति की चाह भी न करें , क्योंकि ये चाह फिर दुख को जन्म दे सकती है । मन को मोड़-मोड़ कर सही रास्ते पर लायें । अब आप अपनी भावनाओं को टूट जाने की कगार पर ले कर ही नहीं जायेंगे तो अवसाद की क्या मजाल जो आपके पास भी फटक सके ।
जीवन तो प्रसाद रूप है , खुश रहें और खुशियाँ ही बाँटें । जब प्रकृति की मर्जी से लय मिला लेते हैं तभी इस गुण का अनुभव कर सकते हैं । जब हम जान बूझ कर कुछ गलत नहीं करेंगे , न ही सोचेंगे , अंतर्मन में ये विश्वास रखेंगे कि परम पिता हर हाल में हमारे साथ है तो न तो अकेलेपन का डर लगेगा और न ही किसी विषम परिस्थिति के नकारात्मक प्रभाव का ।
जब आप भाव बदल लेंगे तो कोई नकारात्मक भाव आप पर असर ही नहीं करेगा । आप पायेंगे कि जीवन आसान हो गया है । हर दिन नया दिन है , मुस्करा कर स्वागत कीजिये । अध्यात्म जीवन का मजबूत आधार स्तम्भ है । मन बुद्धि को नियंत्रित करते हुए कर्म के साथ जुड़िये । बेशक बाहरी आँखें आपको बार बार विचलित करेंगी , हर बार मन को मोड़-मोड़ कर अपने असली स्वरूप में लौट आयेंगे तो जीवन गुजरता हुआ नाटक सा दिखेगा । हमारे विचार ही तो हम हैं । अंतर्मन और कर्म का संतुलन ही तो है संतुलित व्यक्तित्व ।
खुद प्रेम का रूप हैं और बाहर तलाश रहे हैं , कितनों का मन हम उठा सकते हैं , जीवनी शक्ति से भर सकते हैं ; इसलिए प्रेम छलकाएं , तभी भरे होने का अहसास होगा । हाँ , याद रखें प्रेम करने में आपको एक जगह अटक कर नहीं रहना है , लें दें और आगे बढ़ चलें । आपका सफ़र , आपकी पटरी तय है , आपको तो सिर्फ मर्यादा सहित कुशलता से अपना काम करते चलना है ।

शनिवार, 7 अगस्त 2010

उँगली छुड़ा लें


' मेरे गीत लम्मे ने या गमाँ दी रात लम्मी ऐ
न मेरे गीत मुकदे ने न भैड़ी रात मुकदी ऐ '
मेरे गीत लम्बे हैं या ग़मों की रात लम्बी है
न मेरे गीत चुकते हैं न पगली रात चुकती है


रात ने जैसे गीतों का आधार ले लिया हो । कौन जाने ये ग़मों की रात कितनी लम्बी होती है । शिशु को चलने के लिए ऊँगली पकड़ चलना सिखाया जाता है पर जैसे ही उसके अपने क़दमों में दम आ जाता है फिर धीरे से उँगली छुड़ा ली जाती है यानि अब आधार उसके अपने दम का है । ऐसे ही हमने ये आधार पकड़ तो लिए हैं पर धीरे से हमें अपने स्वरूप में लौटना होगा । यही बात ब्लॉग लेखन पर भी लागू होती है , इसने हमें परिचय दिलाया , रचनात्मकता का सँसार दिखाया , अपने अस्तित्व की पहचान कराई ; मगर हर तरफ से मुँह मोड़ कर यही तो सब कुछ नहीं है । इतना सहारा लेंगे तो ये उँगली या बाँह छूटते ही चारों खाने चित्त जा गिरेंगे । टिप्पणियों की चाह , इकतरफा भ्रम , अनचाहे विवाद ...मायूस ही करेंगे । ताकत की बजाय ये तो कमजोरी हो गई ।


ब्लोगवाणी बन्द हो गई जैसे कितनी ही रचनाओं से मेल-जोल का रास्ता बन्द हो गया । परिवर्तन तो जीवन का नियम है , अब चिट्ठा-जगत ज़िन्दाबाद । एक ढर्रे पर चलते चलते अचानक रास्ता बदलना पड़े तो फर्क तो पड़ता है कैसे कहें कि फर्क नहीं पड़ता । तलब , तड़प , प्यास ...एड्किशन ...लत या फिर नशा ... एक ही ग्रुप के कितने ही शब्द हैं अन्दाज़े-बयाँ के लिए । इन्हें अदब में रखना आना चाहिए । कोई भी सहारा छूटता है तो लेखक लोग माहिर होते हैं मातम के बखान को शब्दों में ढालने के लिए । हमारा आधार तो बाहरी ही हुआ न ।


निरुद्देश्य लेखन दिशाहीनता का सूचक है । जो लेखन किसी के आँसू पोंछ सके , दर्द बाँट सके , दिल बाग-बाग कर सके , मूक परिस्थितियों को शब्द दे सके , असलियत से परिचय करा सके या हल निकाले ...वो ही सार्थक है । बिना कारण जगह घेरने से क्या फायदा । अच्छा हो कि हम अपनी अपनी सामर्थ्य भर औरों को भी सही दिशा देने की कोशिश करें । हर व्यक्ति के जीवन में ग़मों की रात यानि भारी वक्त आता तो जरुर है बस उस वक्त को कैसे संभालना है , बाहरी आधार लेते हुए जब जीवन चलने लग जाय तो अपनी हिम्मत को संरक्षित कर लो , यही तो प्राण-शक्ति है ... यूँ ही ज़ाया नहीं करते । एक न एक दिन मन कटघरे में खड़ा करके जिरह जरुर करेगा । सहारा तो सहारा होता है , जिसके बिना काम न चले , वो तो पंगु हो गए न ? आधार तो तो वो है जो हर हाल में जीवन से भरपूर रहना सिखाये ।


पानी दे , पानी दे
थोड़ी सी जिंदगानी दे
तपती हुई धरती है
कुछ बूँद जरुरी है
पतझड़ के मौसम में
तेरा फ़िक्र जरुरी है
नदिया का किनारों सँग
रहना भी जरुरी है
धरती पर चलने को
कुछ बात जरुरी है
प्यास की नदिया से
दूरी भी जरुरी है

रविवार, 25 जुलाई 2010

ख्वाहिशों की ख्वाहिश


चलो आज अनर्गल अलाप करते हैं ...ब्लोगवाणी तो अटक गई ख्वाहिशें ब्लॉग की राम रावण पोस्ट पर ...राम रावण तो सबकी नस-नस में फैले हैं ...हम कितने प्रतिशत राम हैं और कितने प्रतिशत रावण ...ये खुद ही तय कर लें ..अपनी ख्वाहिशों के दम पर । बात ख्वाहिशों की चली तो हर ख्वाहिश पे दम निकले , बहुत निकले मेरे अरमाँ , लेकिन फिर भी कम निकले ।

आदमी की तुलना केकड़े से की जाती है , कहते हैं केकड़ों को किसी खुले बर्तन में भी डाल दें तो वो उससे बाहर निकल ही नहीं पाते , क्योंकि जो भी केकड़ा ऊपर उठने की कोशिश करता है ..बाकि सारे केकड़े उसकी टाँग पकड़ कर नीचे खींच लेते हैं । तो क्या आदमी भी यही काम करता है ? खुद ऊपर उठ पाए या न उठ पाए दूसरे को ऊपर नहीं उठने देता । इतने खुशनसीब हम भी नहीं रहे कि किसी ने कोई सीढ़ी चढ़ने दी हो । घबरा कर ख्वाहिशों ने ही मुँह फेर लिया । जानती हूँ ये जिन्दगी से पलायन होता है , मगर आज यही मेरी ताकत है । मैं ये बाट नहीं जोहती कि कोई मुझे मौका दे , यहाँ तक कि टिप्पणी की राह भी नहीं देखती , आने वाले का स्वागत है , कोई दो शब्द भी लिखे तो मन से लिखे । इसी लिए ब्लॉग विजिट का गैजेट भी नहीं लगाया , उन दीवारों को कान क्यों लगाऊँ जो मुझे हिला कर जा सकतीं हैं । हाँ , ये दुआ हमेशा करती हूँ कि अगर मैं किसी के काम आ पाऊँ तो ये मेरी खुशनसीबी हो ।

रचनाकार बहुत संवेदन-शील होता है , वो अपनी परिस्थितियाँ क्या दूसरे की परिस्थितियाँ भी जी लेता है , पर उसका लेखन तो उसके अपने व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता है । हम किसी को बिना मिले उसके लेखन से उसके जीवन के प्रति दृष्टिकोण के बारे में बहुत हद तक सटीक घोषणा कर सकते हैं । जैसे ही व्यक्ति विशेष की सोच बदलती है वैसे ही उसकी रचनाएं बदल जाती हैं ।

दूसरों को पढ़ते पढ़ते खुद किताब हो गया हूँ मैं
मसला कोई भी हो बेहिसाब हो गया हूँ मैं

किसी को बात ने मारा किसी को रात ने मारा
गमे रात का चिराग बन कर सुरखाब हो गया हूँ मैं

गुजरा तो उसके साथ है शोर में जला हूँ मैं
खुद अपने लिए जाने क्यूँ अजाब हो गया हूँ मैं

ताकत भी है कमजोरी और चाहत भी है वही
परत-दर-परत खुलते खुलते , बेनकाब हो गया हूँ मैं

जिन्दगी तेरा देना , तेरा लेना
दिखा दिखा के कभी छुपा लेना
न मैं चूहा , न तू बिल्ली
तेरी आँख मिचौली है ये कैसी !

तूने लिक्खी होगी हार हमारी किस्मत में ,
जब मिलेंगे तुझसे तो पूछेंगे , है ये किस चिड़िया का नाम ।
तैरने की ख्वाहिश नहीं आसान समँदर में ,
ख्वाहिशों की ख्वाहिश है क्या जिन्दगी का नाम ....

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

पीपल के पेड़ से लिपटे धागे

जब कभी देखती हूँ पीपल के पेड़ से लिपटे धागे ,आस्था और विश्वास की डोरियों सरीखे मन्दिरों में बंधीं अनगिनत चुन्नियाँ , सोचती हूँ , कि कितने ही लोगों की है ये चलने की डगर , सपने के सच होने का यकीन ... उँगलियों में पन्ने , माणिक , गोमेद , मोती …लिखी किस्मत को भी बदल पाने का यकीन ... किसने देखा वक़्त से पहले , टटोल किस्मत को …हर्ज़ कोई नहीं , गर जमीन मिले हौसले को …इन्सान जी जाये । डर ये लगता है , कहीं आँखें खुली न हों और ये आस्था जमीर को ही छल जाये ।

अँधविश्वास दुर्बल मन का मजहब है .......एडमण्ड बर्क

जब मन कमजोर होता है , सहारा तलाशता है , आस्थाओं में , कहीं से आराम आ जाये या कोई सपना यानि आशा हो तो चलने के लिए क़दमों में दम आ जाये । ऐसी आस्थाओं में बुद्धि के कान-आँख बंद हो जाते हैं , बस आस्था ही विश्वास का पानी पीती है , इन्सान भूल जाता है कि ऐसी स्थितियों का कोई दूसरा फायदा भी उठा सकता है । याद रखें आप शिकार बन कर उसके जाल में फँस भी सकते हैं । पैसा , कीर्ति या कोई और स्वार्थ उद्देश्य हो सकता है । ये देखने के लिए भी अपनी आँख पर पड़े दुख सुख के परदे से बाहर आना पड़ेगा ।

ये भी सच है कि कई बार हम कोई अँगूठी पहनते हैं या कोई व्रत-पूजा करते हैं तो बड़ी सकारात्मक सी ऊर्जा महसूस करते हैं ! ये हमारे अन्दर का विश्वास ही जगमगा रहा होता है । यहाँ तक तो कोई हर्ज़ नहीं , जहाँ कुछ बुरा हुआ वहीं नकारात्मकता किस कगार पर ला कर छोड़ देती है ? इसीलिये कहा गया है कि अन्धविश्वास दुर्बल मन का मजहब है । यानि कमजोर मन जो अपनी ताकत को पहचानता ही नहीं है , मजहब का नाम देकर अँधविश्वासों की गली में भटकता रहता है । मकड़ी के जाले से बाहर नहीं आ पाता, हमेशा अपने दिल के साथ खिलवाड़ करता हुआ डोलता रहता है ।

विचार ही विचार की औषधि है । अपने विचारों को देखना सीखिए । कौन से विचार आ रहे हैं और किधर ले कर जा रहे हैं । नीचे लुढ़कना बहुत आसान होता है , मन को ढलान से ऊपर लाने में दम लगाना पड़ता है । तूफ़ान या मन में उठती लहरों के विरुद्ध ...तन और मन दोनों का दम लगाना पड़ता है । बस मन को ऊपर उठाने वाले विचार दो , अपनी नकेल अपने हाथ में रखो । जिस गली जाना न हो उसका विचार भी मत दो , यानि उस गली का पता भी मत पूछो । उस गली जा कर हालत बद से बदतर हो सकती है । किसी भी झाँसे में मत आओ । अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की कोशिश करें , शुभ विचार , मानव मात्र की भलाई के लिए किये हुए कर्म मन का तापमान नियन्त्रित रखेंगे । शुभ भाव तो सुन्दर हैं कर्म , सुन्दर हैं कर्म तो जीवन सुन्दर ! और मन ठँडा ....

गुरुवार, 24 जून 2010

हवाओं से हवा देती है



कोई कितना ही इरेजर (रबर ) लेकर कोशिश करले , अपने अतीत को यादों से मिटा नहीं पाता है । जब तब खुद ही अपने नाखूनों से , भर आई हुई खरोंचों को कुरेदने लगता है और खुद को ही लहूलुहान कर लेता है । सोये हुए अतीत की मिट्टी पर हवा करता है , अतीत का भूत जिसे आदमी ने कस के पकड़ रक्खा है ...आगे चलने कब देता है , सारा व्यक्तित्व रुआँसा सा हो उठता है ।
बड़ा शौक है न , क्रमवार , ब्यौरेवार , सिलसिलेवार संग्रहालय बनाने का । टॉपिक छेड़ा नहीं कि किताब खुली नहीं । हम उलझे हैं तस्वीरों में , तकदीरों में , तदबीरों में । तो क्या तस्वीरें भी न देखें ? देखो देखो , एल्बम इसी लिए बनाई जाती है , मगर उस वक्त भी दुखी थे तो भी तस्वीरें देख कर दुखी ही होओगे ...और खुश थे तब भी दुखी ही होओगे ...देखो मगर दूसरे आदमी की तरह , वो दूसरा आदमी जो समय से परे ...जो चीजों को गुजरता हुआ ...घटता हुआ देख सके । जैसे कोई और ही होओ , वर्ना वो मैय्यत सूखने न पायेगी । कोई इरेजर दुखों के अहसास को रब नहीं कर सकता जब तक हम खुद ही , उससे सबक लेकर , उसे काँटे की तरह भूल न जाएँ ; थोड़ा यत्न , थोड़ा दर्द , थोड़ा मरहम और थोड़ा समय और हम वापिस तन्दुरुस्त ।


जिन्दगी रोज दवा देती है
दुखती रगों को हौले से हिला देती है

तन जाते हैं जब तार मन के
कैसी कैसी तानों को बजा देती है

जिन्दगी हो रूठी सजनी जैसे
तिरछी निगाहों से इम्तिहान लेती है

जगते बुझते हौसलों को
हवाओं से हवा देती है

कडवे घूँटों सी दवाई उसकी
माँ की घुट्टी , घुड़की सा असर देती है

शुक्रवार, 11 जून 2010

जो दर्द क़ज़ा से बाईस हो

जुत्ती कसूरी पैरी न पूरी , हाय रब्बा वे सानूँ टुरना पया
जिन्हाँ राहाँ दी मैं सार न जाणी , ओन्हीं राहीँ वे सानूँ टुरना पया

यानि कुसूरवार बेमेल जूती जो मेरे माप की नहीं , उसके साथ ही हमें चलना पड़ा ; जिन राहों का सार भी मैं नहीं जानती , उन्हीं राहों पर हमें चलना पड़ा । कभी ये गीत सुना था , सब कुछ अपने मन का कब होता है ? आशा के विपरीत जो कुछ भी होता है , यूँ ही तो लगेगा ...जैसे कसे जूते पहना कर चला दिया गया हो और वश चले तो जूते खोल नँगे पैर ही दौड़ जाएँ । अब न जूते पहन चला जाता है न नँगे पैर तपती धरती पर चला जाता है । हाल ऐसा हो तो कोई किधर जाए ! हाल कैसा भी हो , बात तो अहसास की है ...चाहे रोये या गीत बना डाले। कोई छालों पे मरहम रखता है , कोई सफ़र को ...कोई जूतों को दोष देता है , कोई घबरा के छालों पे हवा करता है , और फिर हिम्मत करके अगले सफ़र पे चल पड़ता है ।


जो दर्द क़ज़ा से बाईस हो , वो दर्द उठाना पड़ता है
हर नक़्शे-क़दम पर दिलबर के , इस सिर को झुकाना पड़ता है

जो दर्द कज़ा यानि मौत से उन्नीस-बीस क्या इक्कीस भी नहीं , बाईस हो , वो दर्द भी झेलना पड़ता है , और दिलबर के रास्ते पर चलते हुए इस सिर को झुकाना पड़ता है , यानि सजदे में सिर झुकाइये , ख़ुशी ख़ुशी ! दर्द की तीव्रता का अनुमान लगा सकते हैं । ऐसा तो तभी हो सकता है जब अपने जीवन मूल्यों की तस्वीर साफ़ हो । हमें पता हो कि क्या हमारे लिए जरुरी है ! हम अपने साथ ईमानदार हों ।

अवसादित आनन्द ( सैडिसटिव प्लेज़र ) , खुद को दुःख में रख कर कोई सहानुभूति नहीं पानी है , न ही किसी दूसरे को दुःख देकर आनन्द पाना है । बेचारगी में कोई भी सहज नहीं रह पाता है । जीवन तो सहज , शुद्ध बहाव में ही आनन्द देता है । जैसे नदी को जो रास्ता मिला होता है उसी में निर्मल धारा की तरह बहना होता है । दूर मंजिल तक सफ़र में जो भी मिला सर-माथे पर । दुःख सुख तो लगे ही रहेंगे । ये मायने नहीं रखता कि हमने कितनी लम्बी जिन्दगी जी , ये मायने रखता है कि हमने कैसी जिन्दगी जी !

सोमवार, 17 मई 2010

यूँ सबका खजाना एक हुआ

मेरे हिस्से के सुख-दुख कोई दूसरा न पा सकेगा , न एक पाई कम न एक पाई ज्यादा धन , न एक इँच कम न एक इँच ज्यादा सुख या दुख । ऐसा सोच कर शायद हम नियति पर विश्वासी हो जाते हैं । लोग कहते हैं कि फिर न कोई कर्म करने की जरुरत है न ही कोई उमँग ही बचती है । ऐसे विष्वास उस वक़्त काम आते हैं , जब हम घोर निराशा में होते हैं या जब अति अहम् सीमाएँ तोड़ने लगता है । क्या सब कुछ हमारे करने से हो रहा होता है ? कोई होता है जो अदृश्य होकर काम करता है !

मेरे लिए लिखे गए सुख दुख मुझे ही भोगने हैं । हँस कर , मन बाँट कर , सब्र करते हुए , युक्तियाँ लगा कर भोगने से दुख की तीव्रता कम हो जाती है । चिन्ता करने वाला नास्तिक है । ये उक्ति कहती है चीजों को जैसे घटना है , वह तय है , हम चिन्ता करके अपना स्वास्थ्य चौपट करने के सिवा कुछ न कर सकेंगे । हमारे ऐसे कर्म हमारी मन-स्थिति की किस्मत के सूत्रधार जरुर हैं । प्रकृति पर , ऊपर वाले पर विष्वास रखना एक अजब से सँतुलन से अन्तर्मन को भर देता है । उसके न्याय का , उसके होने का अहसास आपको याद दिलाएगा कि कितना ही कुछ उपहार की तरह , प्रेरणा की तरह , मुश्किल वक़्त में सहारा बन कर आ खड़ा होता है । सचमुच अगर हम उस शक्ति के होने में विष्वास रखते हैं तो चिन्ता क्यों करें ? हम तो आस्तिक हैं । रातों की नीँद जो चिन्ता ने हर ली होती है , वो एक इस विचार से ही लौट आयेगी । ऐसे सारे विष्वास निराशा की दवा हैं , जैसे सन्जीवनी बूटी का रूप हैं । हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं । हम वही हैं जो हमारे विचार बिना बोले भी सब तक पहुँचा देते हैं । सुन्दर विचार तो कर्म सुन्दर ! सुन्दर कर्म तो जीवन सुन्दर ! निराशा कहाँ है !
दूर कहीं टिमटिमाता है
मेरी आस का दिया
तू देवदूत बन आता है
मुश्किल की घड़ी में , जाने जिया

उम्मीद पे दुनिया कायम है
यूँ सबका खजाना एक हुआ
जी चाहा जितना ले लेंगे
हम सबने एक ही जाम पिया

मैं हँस सकती हूँ खुद पर भी
दिल ऐसा मेरा तूने मौन किया
चलना है मीलों चल लूंगी
तेरी ऊँगली पकड़ कर , वाह पिया