बुधवार, 23 मार्च 2011

विष्वास कहाँ खो आए



पहले ' ज़र , जोरू और जमीन ' इन तीनों को गुनाह के लिये जिम्मेदार ठहराया जाता था । मगर आज आन और शान और जुड़ गए हैं इन कारणों में । ज़र यानि धन , जोरू यानि पत्नी और जमीन यानि जायदाद ; अवैध सम्बंधों और इश्क को पत्नी से सम्बंधित कारणों में गिना जाएगा । कितने शातिराना ढंग से गुनाह को अन्जाम दिया जाता है । मुझे याद आ रहा है जब एक लड़की गाँव से दूर रेलवे स्टेशन छोड़ने आए अपने माता पिता के सामने तो ट्रेन में बैठ कर चली गई । मगर जब वो रात में ही गाँव वापिस जा रहे थे , अपने प्रेमी के साथ वापिस आई , रास्ते में ही उन्हें मार डाला और एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की । दूसरे या तीसरे स्टेशन पर जहाँ गाड़ी ज्यादा देर रूकती थी , मोटर साइकिल से अपने प्रेमी के साथ जाकर उसी ट्रेन में बैठ कर चली गई , अगली सुबह हॉस्टल पहुँच गई । कितनी भी होशियारी बरती जाए , गुनाह एक न एक निशान जरुर छोड़ता है ।
इसी तरह उत्तर प्रदेश का ही कोई क़स्बा था जहाँ शबनम नाम की लड़की रात को अपने परिवार के आठ
या नौ लोगों को रात के खाने में कुछ नशा खिला कर छत पर सोने चली गईआधी रात में छत से नीचे उतर कर आई , वो एक एक की गर्दन पर टॉर्च दिखाती थी और उसका प्रेमी एक एक का गला रेतता थामरने वालों में शबनम का छोटा भांजा भी थाटेलीविजन पर बताया गया था कि पहले तो उस पर शक नहीं गया था मगर जब कॉल डिटेल खंगाली गई तो छत्तीस कॉल्स प्रेमी को उन दो चार दिनों में की गईं थींसारा राज खुल गयाइश्क और मुश्क क्या छिपाए से छिपे ? इश्क आँखों से सारे राज खोल देता है और क़त्ल तो सौ पर्दों से भी बाहर आता हैकातिल कोई कोई भूल कर बैठता है , सालों बाद भी निशान बोल उठते हैंजिस इश्क के लिये इतने गुनाह किये वो तो क्षणिक उन्माद भर हैआँखों पर पड़ा पर्दा ये भुला देता है कि वो बचपन जिसे उम्र से अलग नहीं किया जा सकता , वो कैसे पीछा छोड़ेगावो माँ बाप , वो रिश्ते नाते जिनकी गोद में खेले , उन अपनों के बिना जिन्दगी की खुशियाँ बेमायने हैंअतीत कभी काट कर अलग नहीं किया जा सकता


आन और शान के लिये जान लेने वाले , समाज में (संकुचित सोच वाले ) खुद को हीरो समझ लेते हैं , ये झूठी शान हुईजब बच्चे बड़े हो रहे थे तो बड़े उनके साथी हमराज नहीं बन पातेबच्चों की कच्ची उम्र में विपरीत सैक्स के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण होता है , इसे समझ कर जब उन्हें उचित मार्गदर्शन दिया जाए , दबाया जाए तो वो खुद ही सही रास्ता पकड़ेंगे


मुहब्बत को तो इबादत से जोड़ा जाता है , क्योंकि इसमें दूसरा अपने से अलग नहीं नजर आताबस उसका मतलब गलत उठाया जाएमुहब्बत अगर गुनाह है तो क्या क़त्ल करना उस से भी बड़ा गुनाह नहीं हैखून सने हाथों से लोग सोते कैसे हैं ?


डॉक्टर तलवार और उनकी पत्नी पर ये इल्जाम है कि उन्हों ने अपनी बेटी के क़त्ल के साक्ष्यों को मिटायाइस से सीधा सीधा इल्जाम उन पर ही लगता हैहाँ ये सवाल भी उठता है कि क्यों उनकी आँखों में वो तड़प नजर नहीं आती जो जानना चाहे कि उनकी बेटी का कातिल कौन है जाने कौन सा कारण निकल कर आए इस डबल मर्डर की मिस्ट्री का


इतनी बेरहमी की फसलें बो
कि तेरे चलने को पगडण्डी भी न बचे
तेरे सीने की गुपचुप , चौराहे पर नीलाम हो जाए
तू चला है किसको मजा चखाने , कि अपनी दुनिया ही उजाड़ हो जाए
उसने अपना न समझा , तो क्या तुम खुद को समझा पाए ?
अपना-पराया मिटा , पराई दुनिया में पहुँचा आए
साजिश बुनने में तू माहिर है , किस्मत की साजिश न पहचान पाये
अपने ही अतीत के हिस्से थे , खन्जर से जिनको अलग कर आए
न्यामतें संभालीं न गईं , ये क्या अन्जाम दे आए
ये क्या लिख डाला जिन्दा मुर्दा रूहों पर ,
रिश्ते जख्मीं हैं , विष्वास कहाँ खो आए

सोमवार, 7 मार्च 2011

ये दुआएँ हैं

बेटा दूर जाए तो माँ का दिल कुछ ऐसे धड़कता है ....

जा तो रहे हो लाडले
दूर तुम
पापा की आँखों के तारे
माँ के मन-प्राण
साथ खेले , बड़े हुए , अपनी बहनों की धड़कन
लाख चाहें जल्दी मिल पायेंगे तुम्हें
दूरियाँ इतनी !

पापा जब जब तुम से भिड़ जाते
" यहीं रहो , यहीं रहो " यही कहते
वो प्यार है , दुलार है , चिन्ता तुम्हारे स्वास्थ्य की
छाया में अपनी चाहते , तुम्हें रखना
उड़ जायेंगे ये दिन भी
थोड़ा धीरे धीरे हमारे लिये

फूलो फलो , आगे बढ़ो
आकाश सी ऊँचाइयों के गले लगो
जो पाओगे , वो लाख गुना तुम्हारी उम्मीदों से बढ़ कर हो


ये दुआएँ हैं
कह दो इन चाँद सितारों से
हर रात चमकना होगा इन्हें
परदेस में मेरे लाडले को हिफाज़त से रखना होगा इन्हें
कोई माँ बैठी है इबादत में
घड़ियाँ गिनती , कलियाँ चुनती

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

अशक्तता

क्या जब हम असहाय होते हैं , तब विषम परिस्थितियों से भी समझौता कर लेते हैं ? सही राह पर होने पर भी जीवन का ये मूल्य चुकाना भारी पड़ता है । सरकारी गैरसरकारी संगठन , सभी जगह ये कैसी संरचना है । जो सत्ता में है , जो प्रभुत्व दिखाता है , लोग एक टाँग पर खड़े हो कर भी उसके आगे पीछे घूमते हैं ; इसके विपरीत जो नर्म है , थोड़ा कम प्रभाव-शाली है , उसे दूसरे स्थान पर होने का अहसास दिलाने का ..यहाँ तक कि नजर अंदाज़ करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ा जाता । ये कैसा चलन है कि आदमी को काम से नहीं आँका जाता , उसके ओहदे को आँका जाता है , और मजबूरी का भरसक फायदा उठाया जाता है । पढ़े लिखे समझदार लोग ही नहीं , माली चपरासी आदि शारीरिक काम करने वाले भी इसी मानसिकता का शिकार हैं ।
सबको माफ़ करें तो जीवन में आगे कैसे बढ़ेंसबको सिखाया नहीं जा सकता , दूसरे को सबक़ सिखाने से पहले खुद को भी यातना झेलनी पड़ती है , मानसिक शांति खो जाती हैजब बहुत उम्मीद हो और किसी तरह भी वश चले ...ये कैसी मोहताजी होती हैप्रकृति हमें धूल में मिलाने पर आमादा कभी नहीं हो सकती , ये तो परीक्षाएं हैं , खुद से ये कहने के लिये जिगर रखना पड़ता हैजब तक सब सहज हो , बड़ा आसान है जीना , जहाँ विषमता हुई वहीँ खून खौलता नजर आता है


जीवन के डूबते पलों में हम खुद से वायदा करते हैं कि बस परम पिता उँगली पकड़ लें , किसी तरह चला लें हम चलते रहेंगेजिन्दगी मिलते ही हम अपने सारे अधिकार वापिस पा लेना चाहते हैंमन आसानी से समझौता नहीं करताये सवाल कई बार उठता है , ठुक पिट कर भी हम मरे तो नहीं हैं नाकई बार ध्यान आता है , बिन पंखों के उड़ान क्या होगीहमारी ऐसी संरचना हमें कदम कदम पर पंगु बनाने के लिये तुली होती है

सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगीकहीं कहीं कोई अशक्तता या रिक्तता का अहसास अभी ज़िंदा है , जिसने आज फिर सिर उठा लिया

सदियों से इंसान
धोता आया है ग़मों को
आंसुओं की नदी में
सदियों से सुनता आया मन
सैलाब की ये आहटें
उखड़े उखड़े से तो रहते हैं
किनारे काट-काट चलते हैं
गांठें रोक लेती हैं
वजूद को बहने से टोक देती हैं
न होते गम तो क्या करते
चलो ऐसे भी जिन्दगी गुजरान होती है
नहीं हुआ जो अपने मन का
चलो अच्छा है कि
बर्दाश्त करने की ताकत बढ़ी


सच के हक़ में बोलना तो बहुत आता है , मगर यूँ टकरा टकरा के मिट जाना अपनी नियति नहीं ....

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

पहली कविता , जैसे कोई सीख


हमेशा से बहुत संवेदन-शील थी , पचास साल की उम्र में अचानक कलम उठाई और लिखना शुरू कर दिया |
पहली कविता यही थी


रे मन तू क्यों भूल गया
हर ओर उसी की छाया है
हर ओर उसी का आनँद है


आशाओं ने हैं जाल बुने
निराशा के भँवर में फँसाया है
अन्धकार में मन भरमाया है
रे मन , तू क्यों भूल गया


सौगातें तुझे बिन माँगे मिलीं
उपलब्धियों से तेरी झोली भरी
पर तुझे सदा खाली ही दिखी
रे मन , तू क्यों भूल गया


सीमाओं को न आड़ बना
निर्मल मन से देना सीख जरा
इसमें भी मैं , उसमें भी मैं ,
इसमें भी वो , उसमें भी वो
रे मन , तू क्यों भूल गया

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

दूरियाँ किलोमीटर्स


दूरियाँ किलोमीटर्स
७-अप्रैल-०९
बड़ी बेटी को बेंगलोर छोड़ कर घर पहुँची , सब कुछ वैसा ही था , छोटी बेटी घर पर परीक्षा की तैयारी के लिए आई हुई थी , पतिदेव अपनी सेमिनार के लिए मुम्बई जाने के लिए तैयार थे , बाकी सब कुछ वैसा ही था , पर मन कहीं छूट गया था , बस बेचैनी थी । काश ...इस काश के आगे तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर मैनें अपने मन को बेलगाम चलने की आज्ञा नहीं दी हुई है .....और काश के आगे की सब बातें तभी सम्भव हैं जब ऊपर वाला उन्हें जायज और सहज बनाये । ऑन्लाइन बड़ी बेटी से बात की .....फोटो देखकर कहा कि " लग रहा है गेस्ट रूम के उसी कमरे में हो आई हूँ .....तुम्हारी आवाज सुनकर .....उबासी लेती हुई तुम ....तुमसे मिल आई हूँ । "
बेटी ने कहा ...


' कौन कहता है दूरियाँ किलोमीटर्स में होती हैं
हम तो नजदीकियाँ दिल से देखते हैं '

मैनें कहा " वाह वाह , लिखती तो तुम थीं पर शायरा कब से हो गईं ? "
उसने कहा " हेरिडिट्री प्रॉब्लम है " और हम दोनों हा हा कर हँस उठे ।
फिर उसने कहा " ममा रात को कभी उदास नहीं सोना चाहिए । "
और मैनें कहा " तो आज के लिए इतना काफी है .....तुम मुस्कुराती रहो मैं मीलों खुश चलूँगी । "
दोनों ने एक दूसरे को गुड नाईट कहा । अपने निजी पलों को लेखनी के साथ बाँट रही हूँ .....देखो मेरी लेखनी भी मुस्करा उठी । [:)]
प्रस्तुतकर्ता शारदा अरोरा पर
९:५० अपराह्न 5 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

उस अजनबी शहर में


६ अप्रैल ०९
नारियल के ऊँचें-ऊँचें पेड़ , कॉपर युक्त मिट्टी के आयताकार खेत , आस पास छितराये से घर और कहीं कहीं पत्थर के पहाड़ .....सिलिकोन सिटी या आई टी सिटी के नाम से मशहूर ये शहर ... जैसे ही प्लेन के पहियों ने बेंगलोर की धरती छोड़ी .....दिल जो पक्का किया हुआ था अचानक बैठने लगा .....पौने तीन घंटे की उड़ान और हजारों मील पीछे छूट जायेगा मेरे जिगर का टुकड़ा ।
बेटी पहली बार इतनी दूर रहने नहीं आई थी , मगर पिछले सवा साल से वो इतनी पास आ गई थी कि हम कई बार मिले । कहते हैं हम दूसरे को नहीं अपने सुखों को रोते हैं ,तो इसे क्या कहूँ , अपने बच्चों को जल्दी जल्दी देख पाने के सुख से वंचित हो गई हूँ । तीनों बच्चे उड़े तो एक ही डाल पर बैठ गये ....बस कभी वो हमारी तरफ आते और कभी हम उनसे मिलने जाते पर अब ये बड़ी चिड़िया ने लम्बी उडारी भर ली ।


मैं क्यों अपनी संवेदनाओं की बेड़ियाँ बच्चों के पैरों में डालूँ । अकेले छोड़ आने का अहसास तो तीन दिन पहले दोनों को हो गया था ..जब बेंगलोर में मेरे छह दिन के प्रवास में आधे दिन बीत जाने पर उल्टी गिनती का अहसास हो गया था । लाख रोकने पर भी आँखें छल-छला आईं । जब मन चतुराई करे तो मन को आत्मा की राह दिखानी पड़ती है वरना मन नहीं मानेगा और जब मन हाथ पैर छोड़ दे तो उसे बाहर की राह यानि दुनिया की राह दिखानी पड़ती है , अब सोचना ये था कि सफलता की सीढियां ऐसे ही चढ़ी जाती हैं ....मैं कोई अकेली माँ नहीं हूँ जिसने अपने बच्चों को दूर भेजा है ..ये दुनिया का दस्तूर है ..वगैरह ....वगैरह ... आँख खोल कर आस पास देखा , एक लेडी अपनी छह महीने की पोती के साथ अकेले श्रीनगर तक की यात्रा के लिये मेरी साथ वाली सीट पर बैठी हैं । ये एक हौपिंग फ्लाईट थी .., शायद उन्हें मेरी मदद की जरुरत थी ....उन्हें बच्ची के लिये दूध बनाना था ....आगे बढ़ कर मैंने बच्ची को उठा लिया , इस तरह कुछ बात शुरू हो गई और उन्होंने बताया कि श्रीनगर में उनका घर और बिजनेस है और बहू वहीं इंजीनियरिंग की परीक्षा देने गई हुई है , और वो खुद पोती के साथ सर्दी भर अपने छोटे बेटे के पास बेंगलोर रहीं थीं , अब बच्चों को यानि बेटे बहू को अपनी बच्ची की याद सता रही है इसलिए वो उसे लेकर लौट रहीं हैं । बच्ची को उन्होंने सोने की चूड़ियाँ पहना रखीं थीं , यानि बच्ची चाँदी के चम्मच के साथ पैदा हुई थी । वो बता रहीं थीं कि जब वो पैदा हुई तो बहुत कमजोर थी , उन्होंने व् उसके डॉक्टर ने बहुत मेहनत करके उसे स्वस्थ्य बनाया है । नई और पुरानी संस्कृति का मेल कुछ इस तरह देखकर अच्छा लगा और मैंने देखा कि मेरा मन लग रहा है , सचमुच बाहर की दुनिया से तालमेल बैठाए बिना हम चल नहीं सकते , तो मन को बाहर की राह दिखा दे वरना मन अड़ जायेगा कुछ देर के लिये बच्ची सो गई फिर मैं अपनी बेटी की याद में डूब गई ये कुछ पंक्तियाँ तो मन पहले से ही गुनगुना रहा था .....
ऐ मेरे जिगर के टुकड़े
उस अजनबी शहर में
अकेला नहीं है तू
तेरे आस पास
मेरी दुआओं का घेरा है
जब जब अकेले होना
झुक के तू झाँकना दिल में
अन्दर कहीं हूँ मैं भी
मुड़ के तू देखना पीछे
तेरे साथ-साथ हूँ मैं
तेरे आगे आगे
उजाले की रोशनी है
बस वहीं वहीं
मेरा दिल धड़कता है
खुदा करे
कि तुझे झुक कर , मुड़ कर
न देखना पड़े
उजाले हों इतने बिखरे
एक तू और दूसरे उजाले
अकेला कहाँ है तू

रविवार, 21 नवंबर 2010

चुभा-चुभा सा है कुछ


एक जोड़ी आँखें दूसरी मँजिल की खिड़की से देख रही हैंसामने एक घर का आँगन है , दरवाजा गली में खुलता है , सुबह का वक्त है , एक मेहमान परिवार बड़ी सी अटैची लिये हुए घर में दाखिल होता हैबच्चों के सिर थपथपा कर घर के बड़े लोग मेहमानों का स्वागत करते हैं


दो ही घंटे बाद दो निरीह जानवर प्लास्टिक की रस्सियों के साथ घर की बैठक की खिड़की से आँगन में बंधे नजर आते हैंएक तसले में हरी हरी घास डाल दी गई है , जिसमें वो मुहँ चला रहे हैंअगली सुबह जानवरों की अजीब अजीब सी आवाजें कानों में पडतीं हैं , नींद खुल जाती हैआँखें खिड़की पर नमूदार होतीं हैं , दोनों जानवर अपनी जगह पर नहीं हैंआँगन पूरा धुला हुआ गीला गीला सा है , दूसरे घर की छत से एक बिल्ली ऐसे बैठी देख रही है जैसे साँप सूँघ कर गया होएक पन्द्रह सोलह साल का लड़का कभी प्लास्टिक की रस्सी गली में ले जाता है ; कभी पानी का पाइप ले जाता हुआ नजर आता हैऊपर आसमान में कौए इक्का-दुक्का मँडराते हैं ; कभी बिजली के खंभों पर नजर आते हैंआँगन में धूप पसर आई है


थोड़ी देर बाद ही एक जानवर फिर आँगन में खिड़की से बँधा नजर आता है ; बार बार घर के प्रवेश द्वार पर लगे पर्दे से मुहँ मार मार बाहर निकल जाना चाहता हैबिल्ली अब तीसरे घर की छत पर जाकर बैठ गई है , सोई नहीं है , सिर पूरा तना हुआ है , लगता है आज बिल्ली छत से नीचे नहीं उतरेगीइतने में क्या देखा कि वही निरीह जानवर कमरों की आड़ में एक अमरुद के पेड़ के साथ बंधा खडा हैरस्सी से उसके दोनों अगले पैर बाँध दिए गए हैं ,और फिर पिछले दोनों पैर , अब वो जमीन पर गिरा है , अब मुँह को बाँधा जा रहा है ...अब आगे और देखना इन एक जोड़ी आँखों को गवारा न हुआ । खिड़की का पर्दा खिसका कर धम्म से सोफे पर बैठ गईंइन आँखों में उन हाथ वालों के दिल परिवर्तित करने का दम नहीं है


कोई आवाज नहीं ...आत्मा से परमात्मा का मिलन ...कोई ऐसे भी क्या दुनिया से जाता है , किसी की आँख में आँसू , कोई दिल है नम !... इन एक जोड़ी आँखों से कुछ आँसू ढुलक आते हैंकन्चों सी चमकती वो आँखें , रातों को पूछती हैं ...कुसूर क्या था मेरा ...बड़ी मछली छोटी को खा जाती है , समँदर का दिल बड़ा नहीं हो सकता क्या ?


मन भी एक बिल्ली सा
दूर की छत से निहारता है
चूहे को सामने लाओ
कैसे झपट्टा मारता है

मन भी तो एक तसला
हरी हरी सी घास के
बहकावे में आ के भूला
रीता रीता सा है सब कुछ
किस चुग्गे में मुँह मारता है

मन भी तो एक कौआ
बोटियों पे क्यूँ मँडराता है
वश चलता नहीं है कुछ भी
खम्भों तारों को ही झकझोरता है

मन भी तो निरीह जानवर
मुँह हाथ पैर हैं बंधे
डोरी है किसके हाथ में
खूँटा तुड़ा के भागता है

मन भी तो है धूप सा
अपने हिस्से की छाया ढूँढता है
चुभा-चुभा सा है कुछ
राहत का सामाँ ढूँढता है