सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

मन का ताप



'दैहिक दैविक भौतिक तापा , राम राज काहू नहीं व्यापा '


देह की तकलीफों में तन से जुड़ी बीमारियाँ आ गईं , भौतिक परेशानियों में धन संपदा से जुड़ी तकलीफें आ गईं और दैविक तापों में आपकी मन से जुड़ी , आत्मा से सम्बंधित तकलीफें आ गईं | यानि जब रामायण रची गयी थी मन की तकलीफें उस से पहले से विद्यमान थीं | हर तरह की तकलीफ का इलाज है राम का नाम | जहाँ राम का राज्य है वहाँ किसी को भी ये तीनो ताप नहीं व्यापते |


सबसे बड़ा ताप तो मन का ही होता है | मन पर बोझा ( विचारों का , तनाव का ) होते ही आप वर्तमान में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते | जो ऊर्जा आप सृजन में लगा सकते थे वो ऋणात्मक होती चली जाती है | ये किसी भी सीमा तक जा सकती है | क्या आप जानते हैं कि बहुत सारी दैहिक बीमारियाँ भी हमें हमारी नकारात्मक सोच के कारण मिलती हैं | नकारात्मक विचारों के रहते हमारी प्राण-शक्ति कम होती चली जाती है , प्रतिरोधात्मक शक्ति कम काम करती है | कहा गया है कि ''स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क निवास करता है '' अगर हम ऐसे कहें कि " स्वस्थ्य मस्तिष्क ही स्वस्थ्य शरीर वहन कर सकता है " तो कैसा रहे ?


जहाँ तक भौतिक संपदा की बात है , इसका कोई अंत नहीं है , एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है | पूरी न हो पाये तो तनाव , यहाँ भी मन से जुड़ी परेशानी आ गई | इच्छाएं रखिये पर सब्र-संतोष भी रखिये | इच्छा पूरी हो जाए तो बढ़िया , न हो पाये तो भी बढ़िया | भौतिकता ही तो सब कुछ नहीं है | सबके ऊपर है मन का चैन | मन की खुशी हल्का-फुल्का रहने में है | जो सामने आए उसी काम को तन्मयता के साथ , शुभता के साथ करते चलो | चारों ओर उस प्रभु का राज्य है , उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी कहीं हिला है ! फ़िर हमारी क्या बिसात है | उसकी खुशी को अपनी खुशी मान लें | गम मिले या खुशी , वो हमारे ही कर्मों का फल है , उसे हमने ही भोगना है , रोकर भोगें या हंस कर | अच्छा है ग़मों को हँस कर प्रभु की इच्छा समझ कर बीत जाने दें , फ़िर वो हमें व्यापेंगे नहीं ; सूली का काँटा बन कर बीत जायेंगे |


हर रात के बाद सवेरा होता है , चाहे वो अमावस की काली रात ही क्यों न हो |

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