रविवार, 25 जुलाई 2010

ख्वाहिशों की ख्वाहिश


चलो आज अनर्गल अलाप करते हैं ...ब्लोगवाणी तो अटक गई ख्वाहिशें ब्लॉग की राम रावण पोस्ट पर ...राम रावण तो सबकी नस-नस में फैले हैं ...हम कितने प्रतिशत राम हैं और कितने प्रतिशत रावण ...ये खुद ही तय कर लें ..अपनी ख्वाहिशों के दम परबात ख्वाहिशों की चली तो हर ख्वाहिश पे दम निकले , बहुत निकले मेरे अरमाँ , लेकिन फिर भी कम निकले

आदमी की तुलना केकड़े से की जाती है , कहते हैं केकड़ों को किसी खुले बर्तन में भी डाल दें तो वो उससे बाहर निकल ही नहीं पाते , क्योंकि जो भी केकड़ा ऊपर उठने की कोशिश करता है ..बाकि सारे केकड़े उसकी टाँग पकड़ कर नीचे खींच लेते हैंतो क्या आदमी भी यही काम करता है ? खुद ऊपर उठ पाए या उठ पाए दूसरे को ऊपर नहीं उठने देताइतने खुशनसीब हम भी नहीं रहे कि किसी ने कोई सीढ़ी चढ़ने दी होघबरा कर ख्वाहिशों ने ही मुँह फेर लियाजानती हूँ ये जिन्दगी से पलायन होता है , मगर आज यही मेरी ताकत हैमैं ये बाट नहीं जोहती कि कोई मुझे मौका दे , यहाँ तक कि टिप्पणी की राह भी नहीं देखती , आने वाले का स्वागत है , कोई दो शब्द भी लिखे तो मन से लिखेइसी लिए ब्लॉग विजिट का गैजेट भी नहीं लगाया , उन दीवारों को कान क्यों लगाऊँ जो मुझे हिला कर जा सकतीं हैंहाँ , ये दुआ हमेशा करती हूँ कि अगर मैं किसी के काम पाऊँ तो ये मेरी खुशनसीबी हो

रचनाकार बहुत संवेदन-शील होता है , वो अपनी परिस्थितियाँ क्या दूसरे की परिस्थितियाँ भी जी लेता है , पर उसका लेखन तो उसके अपने व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता हैहम किसी को बिना मिले उसके लेखन से उसके जीवन के प्रति दृष्टिकोण के बारे में बहुत हद तक सटीक घोषणा कर सकते हैंजैसे ही व्यक्ति विशेष की सोच बदलती है वैसे ही उसकी रचनाएं बदल जाती हैं

दूसरों को पढ़ते पढ़ते खुद किताब हो गया हूँ मैं
मसला कोई भी हो बेहिसाब हो गया हूँ मैं

किसी को बात ने मारा किसी को रात ने मारा
गमे रात का चिराग बन कर सुरखाब हो गया हूँ मैं

गुजरा तो उसके साथ है शोर में जला हूँ मैं
खुद अपने लिए जाने क्यूँ अजाब हो गया हूँ मैं

ताकत भी है कमजोरी और चाहत भी है वही
परत-दर-परत खुलते खुलते , बेनकाब हो गया हूँ मैं

जिन्दगी तेरा देना , तेरा लेना
दिखा दिखा के कभी छुपा लेना
न मैं चूहा , न तू बिल्ली
तेरी आँख मिचौली है ये कैसी !

तूने लिक्खी होगी हार हमारी किस्मत में ,
जब मिलेंगे तुझसे तो पूछेंगे , है ये किस चिड़िया का नाम ।
तैरने की ख्वाहिश नहीं आसान समँदर में ,
ख्वाहिशों की ख्वाहिश है क्या जिन्दगी का नाम ....

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

पीपल के पेड़ से लिपटे धागे

जब कभी देखती हूँ पीपल के पेड़ से लिपटे धागे ,आस्था और विश्वास की डोरियों सरीखे मन्दिरों में बंधीं अनगिनत चुन्नियाँ , सोचती हूँ , कि कितने ही लोगों की है ये चलने की डगर , सपने के सच होने का यकीन ... उँगलियों में पन्ने , माणिक , गोमेद , मोती …लिखी किस्मत को भी बदल पाने का यकीन ... किसने देखा वक़्त से पहले , टटोल किस्मत को …हर्ज़ कोई नहीं , गर जमीन मिले हौसले को …इन्सान जी जाये । डर ये लगता है , कहीं आँखें खुली न हों और ये आस्था जमीर को ही छल जाये ।

अँधविश्वास दुर्बल मन का मजहब है .......एडमण्ड बर्क

जब मन कमजोर होता है , सहारा तलाशता है , आस्थाओं में , कहीं से आराम जाये या कोई सपना यानि आशा हो तो चलने के लिए क़दमों में दम जायेऐसी आस्थाओं में बुद्धि के कान-आँख बंद हो जाते हैं , बस आस्था ही विश्वास का पानी पीती है , इन्सान भूल जाता है कि ऐसी स्थितियों का कोई दूसरा फायदा भी उठा सकता हैयाद रखें आप शिकार बन कर उसके जाल में फँस भी सकते हैंपैसा , कीर्ति या कोई और स्वार्थ उद्देश्य हो सकता हैये देखने के लिए भी अपनी आँख पर पड़े दुख सुख के परदे से बाहर आना पड़ेगा

ये भी सच है कि कई बार हम कोई अँगूठी पहनते हैं या कोई व्रत-पूजा करते हैं तो बड़ी सकारात्मक सी ऊर्जा महसूस करते हैं ! ये हमारे अन्दर का विश्वास ही जगमगा रहा होता हैयहाँ तक तो कोई हर्ज़ नहीं , जहाँ कुछ बुरा हुआ वहीं नकारात्मकता किस कगार पर ला कर छोड़ देती है ? इसीलिये कहा गया है कि अन्धविश्वास दुर्बल मन का मजहब हैयानि कमजोर मन जो अपनी ताकत को पहचानता ही नहीं है , मजहब का नाम देकर अँधविश्वासों की गली में भटकता रहता हैमकड़ी के जाले से बाहर नहीं आ पाता, हमेशा अपने दिल के साथ खिलवाड़ करता हुआ डोलता रहता है

विचार ही विचार की औषधि हैअपने विचारों को देखना सीखिएकौन से विचार रहे हैं और किधर ले कर जा रहे हैंनीचे लुढ़कना बहुत आसान होता है , मन को ढलान से ऊपर लाने में दम लगाना पड़ता हैतूफ़ान या मन में उठती लहरों के विरुद्ध ...तन और मन दोनों का दम लगाना पड़ता हैबस मन को ऊपर उठाने वाले विचार दो , अपनी नकेल अपने हाथ में रखोजिस गली जाना हो उसका विचार भी मत दो , यानि उस गली का पता भी मत पूछोउस गली जा कर हालत बद से बदतर हो सकती हैकिसी भी झाँसे में मत आओ । अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की कोशिश करें , शुभ विचार , मानव मात्र की भलाई के लिए किये हुए कर्म मन का तापमान नियन्त्रित रखेंगेशुभ भाव तो सुन्दर हैं कर्म , सुन्दर हैं कर्म तो जीवन सुन्दर ! और मन ठँडा ....

गुरुवार, 24 जून 2010

हवाओं से हवा देती है



कोई कितना ही इरेजर (रबर ) लेकर कोशिश करले , अपने अतीत को यादों से मिटा नहीं पाता है । जब तब खुद ही अपने नाखूनों से , भर आई हुई खरोंचों को कुरेदने लगता है और खुद को ही लहूलुहान कर लेता है । सोये हुए अतीत की मिट्टी पर हवा करता है , अतीत का भूत जिसे आदमी ने कस के पकड़ रक्खा है ...आगे चलने कब देता है , सारा व्यक्तित्व रुआँसा सा हो उठता है ।
बड़ा शौक है न , क्रमवार , ब्यौरेवार , सिलसिलेवार संग्रहालय बनाने का । टॉपिक छेड़ा नहीं कि किताब खुली नहीं । हम उलझे हैं तस्वीरों में , तकदीरों में , तदबीरों में । तो क्या तस्वीरें भी न देखें ? देखो देखो , एल्बम इसी लिए बनाई जाती है , मगर उस वक्त भी दुखी थे तो भी तस्वीरें देख कर दुखी ही होओगे ...और खुश थे तब भी दुखी ही होओगे ...देखो मगर दूसरे आदमी की तरह , वो दूसरा आदमी जो समय से परे ...जो चीजों को गुजरता हुआ ...घटता हुआ देख सके । जैसे कोई और ही होओ , वर्ना वो मैय्यत सूखने न पायेगी । कोई इरेजर दुखों के अहसास को रब नहीं कर सकता जब तक हम खुद ही , उससे सबक लेकर , उसे काँटे की तरह भूल न जाएँ ; थोड़ा यत्न , थोड़ा दर्द , थोड़ा मरहम और थोड़ा समय और हम वापिस तन्दुरुस्त ।


जिन्दगी रोज दवा देती है
दुखती रगों को हौले से हिला देती है

तन जाते हैं जब तार मन के
कैसी कैसी तानों को बजा देती है

जिन्दगी हो रूठी सजनी जैसे
तिरछी निगाहों से इम्तिहान लेती है

जगते बुझते हौसलों को
हवाओं से हवा देती है

कडवे घूँटों सी दवाई उसकी
माँ की घुट्टी , घुड़की सा असर देती है

शुक्रवार, 11 जून 2010

जो दर्द क़ज़ा से बाईस हो

जुत्ती कसूरी पैरी न पूरी , हाय रब्बा वे सानूँ टुरना पया
जिन्हाँ राहाँ दी मैं सार न जाणी , ओन्हीं राहीँ वे सानूँ टुरना पया

यानि कुसूरवार बेमेल जूती जो मेरे माप की नहीं , उसके साथ ही हमें चलना पड़ा ; जिन राहों का सार भी मैं नहीं जानती , उन्हीं राहों पर हमें चलना पड़ा । कभी ये गीत सुना था , सब कुछ अपने मन का कब होता है ? आशा के विपरीत जो कुछ भी होता है , यूँ ही तो लगेगा ...जैसे कसे जूते पहना कर चला दिया गया हो और वश चले तो जूते खोल नँगे पैर ही दौड़ जाएँ । अब न जूते पहन चला जाता है न नँगे पैर तपती धरती पर चला जाता है । हाल ऐसा हो तो कोई किधर जाए ! हाल कैसा भी हो , बात तो अहसास की है ...चाहे रोये या गीत बना डाले। कोई छालों पे मरहम रखता है , कोई सफ़र को ...कोई जूतों को दोष देता है , कोई घबरा के छालों पे हवा करता है , और फिर हिम्मत करके अगले सफ़र पे चल पड़ता है ।


जो दर्द क़ज़ा से बाईस हो , वो दर्द उठाना पड़ता है
हर नक़्शे-क़दम पर दिलबर के , इस सिर को झुकाना पड़ता है

जो दर्द कज़ा यानि मौत से उन्नीस-बीस क्या इक्कीस भी नहीं , बाईस हो , वो दर्द भी झेलना पड़ता है , और दिलबर के रास्ते पर चलते हुए इस सिर को झुकाना पड़ता है , यानि सजदे में सिर झुकाइये , ख़ुशी ख़ुशी ! दर्द की तीव्रता का अनुमान लगा सकते हैं । ऐसा तो तभी हो सकता है जब अपने जीवन मूल्यों की तस्वीर साफ़ हो । हमें पता हो कि क्या हमारे लिए जरुरी है ! हम अपने साथ ईमानदार हों ।

अवसादित आनन्द ( सैडिसटिव प्लेज़र ) , खुद को दुःख में रख कर कोई सहानुभूति नहीं पानी है , न ही किसी दूसरे को दुःख देकर आनन्द पाना है । बेचारगी में कोई भी सहज नहीं रह पाता है । जीवन तो सहज , शुद्ध बहाव में ही आनन्द देता है । जैसे नदी को जो रास्ता मिला होता है उसी में निर्मल धारा की तरह बहना होता है । दूर मंजिल तक सफ़र में जो भी मिला सर-माथे पर । दुःख सुख तो लगे ही रहेंगे । ये मायने नहीं रखता कि हमने कितनी लम्बी जिन्दगी जी , ये मायने रखता है कि हमने कैसी जिन्दगी जी !

सोमवार, 17 मई 2010

यूँ सबका खजाना एक हुआ

मेरे हिस्से के सुख-दुख कोई दूसरा न पा सकेगा , न एक पाई कम न एक पाई ज्यादा धन , न एक इँच कम न एक इँच ज्यादा सुख या दुख । ऐसा सोच कर शायद हम नियति पर विश्वासी हो जाते हैं । लोग कहते हैं कि फिर न कोई कर्म करने की जरुरत है न ही कोई उमँग ही बचती है । ऐसे विष्वास उस वक़्त काम आते हैं , जब हम घोर निराशा में होते हैं या जब अति अहम् सीमाएँ तोड़ने लगता है । क्या सब कुछ हमारे करने से हो रहा होता है ? कोई होता है जो अदृश्य होकर काम करता है !

मेरे लिए लिखे गए सुख दुख मुझे ही भोगने हैं । हँस कर , मन बाँट कर , सब्र करते हुए , युक्तियाँ लगा कर भोगने से दुख की तीव्रता कम हो जाती है । चिन्ता करने वाला नास्तिक है ये उक्ति कहती है चीजों को जैसे घटना है , वह तय है , हम चिन्ता करके अपना स्वास्थ्य चौपट करने के सिवा कुछ न कर सकेंगे । हमारे ऐसे कर्म हमारी मन-स्थिति की किस्मत के सूत्रधार जरुर हैं । प्रकृति पर , ऊपर वाले पर विष्वास रखना एक अजब से सँतुलन से अन्तर्मन को भर देता है । उसके न्याय का , उसके होने का अहसास आपको याद दिलाएगा कि कितना ही कुछ उपहार की तरह , प्रेरणा की तरह , मुश्किल वक़्त में सहारा बन कर आ खड़ा होता है । सचमुच अगर हम उस शक्ति के होने में विष्वास रखते हैं तो चिन्ता क्यों करें ? हम तो आस्तिक हैं । रातों की नीँद जो चिन्ता ने हर ली होती है , वो एक इस विचार से ही लौट आयेगी । ऐसे सारे विष्वास निराशा की दवा हैं , जैसे सन्जीवनी बूटी का रूप हैं । हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं । हम वही हैं जो हमारे विचार बिना बोले भी सब तक पहुँचा देते हैं । सुन्दर विचार तो कर्म सुन्दर ! सुन्दर कर्म तो जीवन सुन्दर ! निराशा कहाँ है !
दूर कहीं टिमटिमाता है
मेरी आस का दिया
तू देवदूत बन आता है
मुश्किल की घड़ी में , जाने जिया

उम्मीद पे दुनिया कायम है
यूँ सबका खजाना एक हुआ
जी चाहा जितना ले लेंगे
हम सबने एक ही जाम पिया

मैं हँस सकती हूँ खुद पर भी
दिल ऐसा मेरा तूने मौन किया
चलना है मीलों चल लूंगी
तेरी ऊँगली पकड़ कर , वाह पिया

शनिवार, 1 मई 2010

टिप्पणियों की चाह

जरुरी नहीं कि उत्कृष्ट लेखन पर भी आपको बहुत टिप्पणियाँ मिलें । टिप्पणियाँ पाने के लिए , ध्यान दिलाने के लिए अपनाए गए हथकण्डों से मन को क्षणिक तृप्ति मिल सकती हैइस सब में भटक कर क्या हम अपना असली मकसद भूल नहीं गए ! हमारा लिखा हो सकता है बहुत लोग पढ़ पाए हों , या हो सकता है पढ़ भी लिया हो तो टिप्पणी लिखने का वक्त बचा हो या कई बार नेट की , कम्प्यूटर की गड़बड़ भी सामने आती हैबिना किसी दबाव के पाई गयी टिप्पणियाँ ही सार्थक हैं

लेखन एक शौक की तरह उभर कर सामने आता है और धीरे से हमारी आवश्यकता बन जाता हैबिना लिखे रहा नहीं जाता , मगर लिखा अपने आप जाता हैयानि ख्याल ही हमारी ताकत बन जाता हैहमारे आस-पास जीते जागते लोग जो हमारी आज की स्थिति के लिए जिम्मेदार होते हैं यानि हमारे लेखन का बहुत कुछ दारोमदार परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उन पर भी होता है ; उन्हें हम अनदेखा कैसे कर सकते हैं ! ब्लॉग अपने कर्तव्यों से बढ़ कर नहीं है , रिश्तों की खटास के असर से लेखन अछूता नहीं रह सकेगाटिप्पणियों की प्रतिक्रिया स्वरूप हौसला अफजाई तो होती है , मगर टिप्पणियों को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए , इससे हम उलझ कर अपने उद्देश्य से भटक जायेंगेदमदार लेखन तो खुद ही बोल उठेगासराहना भी हो तो भी दिल छोटा नहीं करना चाहिए

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
तब जाकर कहीं होता है , चमन में दीदावर पैदा

वो आँख वाला तो किस्मत से पैदा होता हैहमें तो अपना अपना काम करते चलना हैये भी सच है ' लगती है एक उम्र , तेरी जुल्फ के सर होने तक ' । अचानक की उम्मीद नहीं कर सकते , तपने में वक़्त तो लगता है

टिप्पणियों के लिए तो ये ही कहा जा सकता है ....उलझ मत दिल बहारों में , सहारे टूट जाते हैं , सहारों का भरोसा क्या ........आधार तो अपने अन्दर है

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

जिन्दगी को एक साधक की तरह जिएँ


अब जो बात मैं कहने जा रही हूँ वो जिन्दगी में कभी अवसाद को आने ही नहीं देगी | आप सिर्फ ये शरीर नहीं हैं , बल्कि एक बड़ी शक्ति से अलग होकर आई हुई प्रकाश पुँज आत्मा हैं | जिस तरह हम प्रार्थना करके सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करते हैं , उसी तरह हम ऊर्जा को दूसरी आत्माओं को भी वितरित कर सकते हैं | मन के अन्दर इतनी ताकत है कि किसी भी गिरते हुए मन को सँभाल ले | बाहर जो गुजर रहें हैं वो हालात हैं , गुजर जायेंगे , आप अपने अन्दर उन्हें गहरा न उतारें , आपको तो सिर्फ ये देखना है कि ऐसे में आप कितने विवेक-पूर्ण निर्णय लेकर अपने आप को जीतते हैं |


कहते हैं कि प्रकृति न्याय करती है जो कभी-कभी इन खुली आँखों से नहीं भी नजर आता ; मगर आप ख्याल करें कि जब-जब आपने गुस्सा किया तो गुस्सा करने से पहले और बाद में आप कितना कुढ़े ? आपने कितनी ऊर्जा गँवाई , कितनी शांति खोई और कितने दिन दुश्मन सोते जागते आपकी आँखों के सामने रहा ? ये न्याय तो ' इस हाथ दे और इस हाथ ले ' वाला हो गया | सोचें तो जरा , कोई खोट तो होती है ऐसे विचारों और क्रियाओं में जो हमें शांति से दूर ले जाती है | अच्छा होता अगर हम शान्तिपूर्ण हल ढूँढ़ते | दूसरे को परिस्थिति वश जान कर अगर हम उसे तहे-दिल से माफ़ कर सकें तो उससे बड़ी करुणा नहीं है |


परेशानियों को हमेशा सबक की तरह लें , प्रकृति आपको सिखाना चाहती है , परीक्षा लेती है , कितने खरे उतरते हो , कितने अडोल हो ? इस रोल के लिए आपको चुना गया है | आप चाहें तो टूट कर बिखर जाएँ , आप चाहें तो निखर जाएँ |


अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें |जब आप इस अहसास से भरे होंगे कि आपके आस-पास इतने सारे लोग , सब उस सर्व-शक्तिमान के अंश हैं , सिर्फ शरीर रूपी आवरण की वजह से भटके हुए हैं ; तब आप किसी के साथ अन्याय नहीं कर पायेंगे | ' सकल ते मध्य सकल ते उदास ' जब आप अकेले हैं तब भी आपको अकेले नहीं लगेगा , दूर उसी शक्ति से लय जुड़ जायेगी ; और जब भीड़ में इतने लोगों के बीच में होंगे तब भी आप अकेले हैं क्योंकि मन की ये यात्रा तो आपको अकेले ही तय करनी है ना | अच्छा है इस यात्रा को हम सहज बनाएं , अपनी तरफ से जटिलताएं न जोड़ें | यदि हम सबको अपना समझते हुए किसी का दिल नहीं दुखाते हैं ( मजबूरी वश किसी के भले के लिए हमें कभी-कभी सख्त रवैय्या अपनाना पड़ता है , वो एक अलग बात है क्योंकि उसमें भी दूसरे की भलाई छिपी है ) , तो प्रकृति भी न्याय करती है , वो आपको शांति सब्र जैसे गुणों से भी बढ़ कर कैसे भी उपहार से नवाज सकती है | सबसे बड़ी अदालत है प्रकृति , जिस ऊर्जा को व्यर्थ गँवा रहे थे , हो सकता है उसका रुख मोड़ते ही , वही आपकी ताकत या पहचान बन कर उभरे | और हम सारी प्यासी आत्माएं अपना वजूद ही तो तलाश रहीं हैं | अब इस वजूद की तलाश में एक-दूसरे से टकराना नहीं है , सबको गले लगाना है | मैं रूहानी प्रेम की बात कर रही हूँ , साथ ही सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए हमें अपनी मर्यादाओं को नहीं भूलना है , बस यही कला सीखनी है कि मन पर दुःख का लवलेश भी न हो |


हाँ , तो अगर हम किसी का दिल नहीं दुखाते हैं ( आपका मन हर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बात समझता है कि कितने ही तरीकों से किसी को भी दुखाया जा सकता है ) , दुनिया की सबसे बड़ी अदालत जो आपके मन के अन्दर भी लगती है , कहिये कि आप कहाँ खड़े हैं , कटघरे में या मुस्कराते हुए इस गुजरते हुए मँच के साक्षी बन कर .....इसी का हिस्सा बने हुए ? इस अहसास के साथ ही आप जीवन जीने की कला सीख जायेंगे |


मन की नकेल अपने हाथ रखिये , चिंता और डर को हावी न होने दें | भाव और बुद्धि का सामंजस्य बिठाते हुए चलें | भाव के बिना सब नीरस है , बुद्धि के बिना सब आफत है | जो छूट गया है , जिसका आप दुख मना रहे हैं , चाहे वह महत्वाकांक्षाएं थीं या इच्छाएं , सुख-सुविधाएं या बड़े प्रिय अपने या मान-सम्मान या फिर सपने ; वो तो महज़ बैसाखियाँ थीं जो आप ने अपने जीने के लिए सहारे या कहिये बहाने की तरह खोज लिए थे , आप अपने सहारे या अपने नूर के साथ चले ही कहाँ ? आपने अपनी दुनिया भी इतनी सीमित कर ली थी , ज़रा अपनी दुनिया का दायरा बड़ा कीजिये , दूसरों का दुःख नजर आएगा तो अपना दुख छोटा नजर आएगा | सकारात्मक चिंतन ही सही दिशा दे सकता है |


दूर कहीं उस सर्व-शक्तिमान की मर्जी से लय मिला कर , मार्ग को सुगम बना कर , तकलीफों को प्रसाद समझ , कुछ कर दिखाने का अवसर समझ , हर दिन को उत्सव समझ चलना चाहिए , यही तो साधना है | आपने मस्त फ़कीर को देखा है , जब गाता है तो कायनात गाती है , जब छोड़ के चल देता है तो कुछ भी नहीं अपना | ऐसे ही हम दुखों को छोड़ दें , बोझ की तरह ढोएँ नहीं , और गायें तो ऐसे कि रोम-रोम गाये | जिन्दगी एक तपस्या है , जीवन को साध कर एक साधक की तरह जियें , बच्चे की तरह नहीं कह सकती क्योंकि हम सब बड़े हो गए हैं |


जब मन पर बोझ नहीं होगा तो ग्लानि भी नहीं होगी | पिछली गल्तियों को भूल जाइए , ' जब जागे तभी सबेरा चरितार्थ ' हो जायेगा | ये सफ़र , ये जीवन-यात्रा ही सब कुछ है , इसे सरल बना कर , इसी के सजदे में सिर झुकाइये |


उम्र के त्यौहार में रोना मना है
जाग , गले लग हँस कर कि सोना मना है
छूट गया जो , छोड़ो यारों , अपना नहीं था
सजदे में सफ़र के , आज को सँवारा नहीं था
पकड़ते हैं उँगली बड़े-बड़े सपने
हमने तो खुद को पुकारा नहीं था